मेकिंग इंडिया साप्ताहिकी

जीवन के सप्त रंग, मेकिंग इंडिया के संग
दिखाऊपन से उबाऊपन की ओर बढ़ता आज का युवा

हम दिखाऊपन में बुरी तरह कैद हो चुके हैं, प्रिया प्रकाश की आंख पर शहीद हो जाने वाले करोड़ों युवा इस बात का साक्षात्कार देते हैं, कि दुनिया भर में अगर ठरक के अग्रणी उत्पादक कहीं हैं तो हम ही हैं।

देश में मिस वर्ल्ड का खिताब लाने वाली लड़की से ज्यादा आंख मारने वाली लड़की ज़ुबान पर चढ़ी होती हैं। आंख मारने पर जाने क्यूं हम इतना मोहित हो जाते हैं, एक लड़की आंख मारती है तो हम रातों रात उसके नाम इमरजिंग नायिका का रिकॉर्ड गिफ्ट कर देते हैं, एक लड़का आंख मारता है तो उसे 5 राज्य भेंट कर देते हैं। ये आंख जाने क्यूं हमें इतना भाती है।

रिंकिया के पापा, पियवा से पहिले हमार रहिलू पर हमारा इतना समर्पण हो गया है कि पाठशाला में भोजनमन्त्र के रूप में इन्हें लागू कर देना चाहिए।

हम ओरछा, आगरा जैसे पर्यटन स्थलों पर विदेशी महिला के साथ फोटो खिंचाकर फेसबुक पर पटक देते हैं लंबे कैप्शन के साथ पगली तुम हमारी रिक्वेस्ट एक्सेप्ट नि करती, हम पर तो विदेश से आने वाली भी मरती हैं। अद्भुत जज़्बा है।

हम भले घर के सबसे करीब के मंदिर कभी न जाते हों लेकिन फेसबुक व्हाट्सप्प पर “मन्दिर वहीं बनाएंगें” के स्टेटस चस्पा कर शक्ति प्रदर्शन ज़रूर करेंगे, जैसे आस्था के नाम का अंकुर अगर फूटा होगा तो यहीं फूटा होगा।

केजी से लेकर दसवीं तक हमें पेंटिंग, सिंगिंग, डांसिंग जैसे “स्किल डेवलपमेंट” के नाम पर पढ़ाये जाने वाले विषय बारहवीं तक आते आते ओझल कर के हमें बोध करा दिया जाता हैं कि गणित में बेहतर प्रदर्शन से ही तुम्हारा भविष्य निर्माण होगा।

दरअसल हमें अपनी स्किल को उजागर करने का मौका ही नहीं दिया जाता, बारहवीं करने के बाद चार फ्लेवर की नोकरियाँ आपके सामने पटक दी जाती हैं, या तो पुलिस करिए, या दिरोगा बाबू, बैंक की करिए, या पीएससी कर आओ। इसके अलावा तैयारियां भी वो करते हैं जो चार लोगों में कहने में अच्छी लगे। ये दिखाऊपन का एहसास हमें तब होता है, जब समय की दुलत्ती हमारे नितम्ब पर पड़ती है और तब सिवाय कराहने के कुछ शेष नहीं रह जाता।

हमारे यहां इन तैयारियों से हटके अपनी स्किल उभारने वाले युवाओं का ये कहकर उपहास किया जाता है कि भाई अब शाहरुख खान बनेंगे, भाई सोनू निगम बनेंगे, भाई रेमो डि सूजा के पूर्वज हैं या भाई अपने आप को प्रेमचंद समझता है। और समाज में चारों दिशा से आ रही अनगिनत आलोचनाओं और निःशुल्क खिल्ली को स्वीकार कर वो हतोत्साहित हो जाते हैं, और यही वजह है कि देश में 70 साल से दूसरा प्रेमचन्द्र नहीं हो पा रहा, सोनू निगम, उदित नारायण जैसी गायिकी नहीं मिल पा रही।

गांव में घर पर शौचालय भले न हो लेकिन स्कोर्पिओ ज़रूर खड़ी होगी, जिस पर रेडियम वाली लाल पट्टी से लिखा होगा, “फलाने ठाकुर मिहोना वारे’

और यही दिखाऊपन हमारे पिछड़ेपन का कारण है, और हमेशा रहेगा।

हम पतन और दमन की इस कड़ी में द्वीप हो गए हैं, हमारे चारों तरफ़ अब केवल पानी पानी बचा है।

इस संक्रामक दिखाऊपन से निदान पाना बड़ा हल्का है, इस का एक ही मूलमंत्र हैं बस दूसरों के सामने खुद को, दूसरों के लिये नहीं बल्कि खुद के लिये पेश कीजिये, जिस दिन आपकी ये पेशकश हो जाएगी उस दिन समय और खपत को बीच से चीरते स्वर्णिम भविष्य पर केवल और केवल आपका अधिकार होगा।

– देवेंन्द्र दांगी

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