मेकिंग इंडिया साप्ताहिकी

जीवन के सप्त रंग, मेकिंग इंडिया के संग
यात्रा : अहिल्या की नगरी इंदौर

शहरों में एक शहर सुना है, शहर सुना है दिल्ली, दिल्ली शहर में चांदनी नाम की लड़की मुझसे मिल ली… अब आप सोच रहे होंगे इंदौर शहर की बात शुरू करने के लिए मैं दिल्ली पर गाना क्यों गा रही हूँ क्योंकि जब भी मैं इंदौर जाती हूँ तो मैं खुद चांदनी जैसा अनुभव करने लगती हूँ… कि शहरों में कोई सबसे प्यारा शहर है तो वह है मेरा इंदौर और उसके पीछे सबसे महत्वपूर्ण कारण है कि वह मेरी जन्मस्थली है. तो जब भी कोई इंदौर की बात करता है तो मेरी ऑंखें ही नहीं चमक जाती, मेरा दिल भी जगमग करने लगता है…

यूं तो आप सब कई शहर घूमे होंगे या कई शहरों के बारे में पढ़ा सुना होगा. लेकिन बात जब अपनी जन्म स्थली की आती है तो वहां का नाम आते ही हम बहुत भावुक हो जाते हैं. खासकर तब जब किसी भी कारणवश आपको अपनी जन्मस्थली छोड़ना पड़ी हो.

तो आज मैं अपनी जन्मस्थली की बात करूंगी … अहिल्या की नगरी इंदौर… जिसकी एक-एक जगह के नाम की अपनी कहानी है, और कहते हैं जिसकी जिह्वा ने इंदौर के भोजन का स्वाद चख लिया उसे भारत का कोई भोजन उससे बेहतर नहीं लगेगा.

चाहे इंदौर का आड़ा बाज़ार हो, राजबाड़ा हो, अन्नपूर्णा मंदिर हो, खजराना मंदिर हो, मेघदूत उपवन हो, सराफा हो या सराफा की तंग गलियों में रात को लगने वाले खाने के स्टाल हो… हर एक की अपनी कहानी और अपनी विशेषता है.

और इंदौर के पोहे जलेबी और सेंव तो इतनी प्रसिद्ध है कि कहा जाता है इन्दौरी सपने में अपनी प्रेमिका नहीं पोहे और जलेबी देखते हैं. यहाँ के लोग पोहे के साथ भी बहुत सारी चीज़ें मिलाकर खाते हैं. पोहा और जलेबी की जुगलबंदी के अलावा यहाँ उसल पोहा भी बहुत प्रसिद्ध है. सुबह पोहों से उठती भाप और उस पर छिड़के अनारदाना और जीरावन और प्याज़, हरा धनिया जिह्वा पर जाते ही आपको स्वाद की दूसरी दुनिया में पहुंचा देता है.

पोहे के अलावा यहाँ की कचौड़ी और समोसे जब कड़ाही से गर्मागर्म निकलते हैं तो आपका दिल उसे खाए बिना नहीं मानता. कचौड़ी की दुकान तो आपको इंदौर की हर गली में मिल जाएगी.

यहाँ की कुछ कचौड़ी और कचौड़ी की दुकाने तो शहर भर में प्रसिद्ध है –

सबसे पहले है लाल बाल्टी की कचौड़ी इसकी खासियत है – आलू कचौड़ी, चटपटी मसालेदार हरी चटनी. Lal balti means Red Bucket, if Bulb is on then you are lucky and will get Awesome Kachori.

दूसरी है इंजीनीयर की कचौड़ी – यहाँ भी आलू कचौड़ी, पुदीने की हरी चटनी, तली हुई तीखी मिर्च और चाय के साथ मिलती है.

तीसरी है सुरेश की कचौड़ी – यहाँ दाल, हिंग, प्याज, आलू की सब तरह की कचौड़ी लाल हरी चटनी के साथ मिलती है.

चौथी है बम की कचौड़ी – छोटे साइज़ में मूंग दाल कचौड़ी हिंग की खुशबू के साथ जिसने एक बार खा ली तो वह बार बार खाने आएगा.

पांचवी है विजय चाट की कचौड़ी – यहाँ की खासियत न सिर्फ दाल मटर की कचौड़ी है बल्कि यहाँ की आलू की कचौड़ी भी बहुत प्रसिद्ध है और साथ में खजूर की लाल चटनी, हरी चटनी और सेंव का संयोजन, आपको लगेगा स्वर्ग कहीं है तो बस यहीं है, यहीं है, यहीं है.

इसके अलावा अनंतानंद उपहार गृह की मसालेदार झन्नाट उसल कचौड़ी ऐसी है कि कमज़ोर पेट वाले, खा ही नहीं सकते, इसे खाने के लिए वाकई में कलेजा चाहिए.

यहाँ एक जगह है सराफा जहाँ दिन में तो सुनार सोने चांदी की दुकाने खोलकर बैठ जाते हैं लेकिन शाम होते ही वहां खाने पीने के ऐसे स्टाल उन दुकानों के बाहर लगने लगते हैं कि आप उन स्वादिष्ट व्यंजनों के आगे सोना चांदी भूल जाएंगे, लगेगा असली खज़ाना तो बस यही खाना खज़ाना है.

सराफा की साबूदाने की खिचडी, भुट्टे का किस, दही बड़े, गोलगप्पों के साथ मावे की जलेबी, बासुंदी, रबड़ी, गुलाबजामुन, मालपुआ यानी तीखे के चटखारे के साथ मीठे का प्यार…

और यहाँ शिकंजी नाम से एक पेय मिलता है, जब आप मिठाई के दुकान पर जाओगे तो यह शिकंजी दूध और ड्राई फ्रूट्स की पौष्टिक शिकंजी मिलेगी लेकिन बीच शहर में गर्मियों के दिनों में घूमने निकलेंगे तो शिकंजी नाम की ही नीबू मसाले वाली चटपटी पानी और सोडा वाली शिकंजी मिलेगी.

सराफा के अलावा यहाँ की छप्पन दुकान भी खाने के मामले में बहुत आगे है, यहाँ पाव के बीच ऑमलेट रखकर बनाया जाने वाला बैंजो तो पूरे देशभर के स्ट्रीट फ़ूड में फेमस है. कई टीवी कार्यक्रमों में छप्पन दुकान और सराफा के स्वादिष्ट व्यंजनों को दिखाया गया है.

खाने की बात निकली है तो यहाँ पर इन स्ट्रीट फ़ूड के अलावा बड़ी होटल्स भी बहुत फेमस है लेकिन, यहाँ के बस स्टैंड के पास बना गुरु कृपा होटल पर तो सच में गुरु की कृपा है. वहां आज भी खाने के लिए लम्बी लाइन लगती है और आपको सीट पाने के लिए टोकन लेना पड़ता है.

होटल्स के अलावा शहर के किनारों पर बने ढाबे भी उतने ही प्रसिद्ध हैं, जहाँ की सेंव की सब्जी तक लोग ऊँगलियाँ चाट चाट कर खाते हैं. फिर चाहे वह कृष्णा ढाबा हो या चौधरी का ढाबा. इन सबके अलावा यहाँ के सेंडविच और छोले के साथ मिलने वाला हॉट डॉग भी यहाँ की विशेषता है.

वैसे मैंने बहुत यात्राएं तो नहीं की है लेकिन जितनी जगह भी गयी हूँ, वहां मुझ जैसे रेसिपी खोजते प्राणी के लिए नई चीज़ों को चखने के परिणाम बहुत सुखद नहीं रहे.

हो सकता है ये मामला मेरी रूचि और स्वाद कलिकाओं को पड़ी आदत का हो. लेकिन फिर भी मैं कुछ व्यंजनों के लिए तो दावे के साथ कह सकती हूँ कि वो आपको इंदौर के अलावा कहीं नहीं मिलेंगे. उनमें से साबूदाने की खिचड़ी और गाठिया चाट प्रमुख है.

आपने तरह-तरह की चाट खाई होगी और प्रयोग के रूप में बनाई भी होगी, उसमें अमूमन एक जैसी सामग्री होती है जिसमें वही इमली की मीठी चटनी और दही का कॉम्बिनेशन होता है. लेकिन इन्दौर का गाठिया चाट आपकी स्वाद कलिकाओं को एक नए स्वाद से परिचय करवाएगा.

इंदौर नमकीन, पोहा और जलेबी, चाट, कचौड़ी और समोसे के लिए ही नहीं बल्कि दाल बाफलों के लिए भी प्रसिद्ध हैं. यह बिहार के लिट्टी चोखा का ही एक रूप है, लेकिन बाफले बाटी से थोड़े अलग होते हैं, इसे बाटी को उबालकर और फिर सेंक कर या ताल कर दाल और बेसन गट्टे और लहसुन की तीखे छाती के साथ खाए जाते हैं.

और पारंपरिक व्यंजनों के अलावा मैकडोनल्ड, डोमिनोज़, पिज्जा हट, केएफसी, सबवे, बरिस्ता लवाज़ा और कैफे कॉफी डे जैसी बहुत सारी राष्ट्रीय कंपनियों ने इंदौर में मॉडर्न यूथ के लिए भी अपनी शाखाएं खोल दी है.

मुझे पता है खाने की इतनी सारी चीज़ों के नाम देखकर ही आपके मुंह में पानी आ गया होगा लेकिन मैं आपको बता दूं यह तो सिर्फ आधी ही लिस्ट है पूरी करने जाएंगे तो यहीं रह जाएंगे. इसलिए हम कुछ जगहों का भ्रमण भी कर लें.

तो अहिल्या की नगरी कहे जाने वाले इंदौर में राजबाड़ा है तो आड़ा बाज़ार भी है, आप सोच रहे होंगे यह बाज़ार आड़ा होगा तभी इसका नाम आड़ा बार पड़ा, लेकिन नहीं इसके पीछे एक बहुत दिलचस्प कहानी है.

कहानी सुनाने से पहले हम इंदौर का थोड़ा सा इतिहास जान लेते हैं. उज्जैन पर विजय पाने की राह में, राजा इंद्र सिंह ने काह्न नदी (आधुनिक नाम कान (Kahn) और विकृत नाम खान) के निकट एक शिविर रखा और वे इस जगह की प्राकृतिक हरियाली से बहुत प्रभावित हुए. और उन्होंने काह्न और सरस्वती के संगम पर एक शिवलिंग रखा और इंद्रेश्वर मंदिर का निर्माण प्रारंभ किया. साथ ही इंद्रपुर की स्थापना की गई. कई वर्षों बाद जब पेशवा बाजीराव-1 द्वारा, मराठा शासन के तहत, इसे मराठा सूबेदार ‘मल्हार राव होलकर’ को दिया गया था तब से इसका नाम इंदूर पड़ा. ब्रिटिश राज के दौरान यह नाम इंदूर से इंदौर में बदल गया, तब से वह इंदौर ही है.

तो जिस दौर में इंदौर, होल्कर मराठा शासकों की राजधानी हुआ करता था और राजमाता अहिल्याबाई होल्कर वहां रहती थीं. एक बार उनके पुत्र मालोजी राव का रथ इस रास्ते से निकल रहा था और एक गाय का बछड़ा उनके रथ के आगे आ जाता है. रथ से टक्कर लगने के कारण बछड़े की मृत्यु हो जाती है. गाय वहीं मृत बछड़े के पास बैठी थी कि वहां से राजमाता अहिल्याबाई का रथ गुजरा. उन्होंने रथ रोककर पूछा कि क्या हुआ है? पूरी बात मालूम करके वे दरबार में पहुंचती हैं और मालोजी राव की पत्नी मेनाबाई से पूछती हैं कि माँ के सामने ही बेटे को मार देने वाले की क्या सजा होनी चाहिए?

मेनाबाई जवाब देती है, उसे तो प्राण दंड मिलना चाहिए. राजमाता अहिल्याबाई मालोजीराव के हाथ पैर बांधकर, जहाँ बछड़ा मरा था वहीं डालने का आदेश दे देती है और कहती है कि इसपर रथ चढ़ा दो! अब राजमाता ने रथ की टक्कर से मारने का दंड तो दे दिया लेकिन कोई सारथी रथ चलाने को तैयार हुआ. आख़िरकार राजमाता खुद ही रथ चलाने रथ में सवार हो गयी.

राजमाता को रथ बढ़ाते ही रोकना पड़ गया, क्योंकि मालोजी को बचाने एक गाय बीच में आ गयी थी. राजमाता रथ बढ़ाती कि वही गाय फिर रथ के सामने आकर खड़ी हो जाती जिसका बछड़ा मालोजीराव के रथ से मारा गया था. बार-बार हटाये जाने पर भी गाय ने अड़कर मालोजीराव को बचा लिया.

अपना बछड़ा खोकर भी उसे मारने वाले की जान बचाने पर अड़ जाने वाली इस गाय की वजह से इंदौर के इस बाज़ार का नाम “आड़ा बाज़ार” है.

इसलिए शायद यहाँ पर महिलाओं के उपयोग में आनेवाली ही सामग्री ही मिलती है. और क्या दिन क्या रात महिलाओं का झुण्ड आपको वहां विचरता हुआ और खरीददारी करता हुआ मिल जाएगा. सिर्फ कपड़े गहने ही नहीं, यहाँ इत्र की भी दुकाने मिल जाएंगी, और इस आड़ा बाज़ार का एक सिरा राजबाड़ा में ही खुलता है.

इसी राजबाड़े से आप खजूरी बाज़ार जा सकते हैं, नहीं नहीं यहाँ खजूर नहीं मिलते यहाँ आपको सिर्फ और सिर्फ स्कूल कॉलेज में पढ़ाई जाने वाली कोर्स की किताबें ही मिलेंगी.

यहीं से एक रास्ता बर्तन बाज़ार की तरफ जाता है, तो एक किराना बेचने वली दुकानों वाला बाज़ार यानी मारोठिया को जाता है, और एक रास्ता कृष्णपुरा पुल से होता हुआ रीगल टॉकीज़ की तरफ जाता है.

कहने का तात्पर्य यह कि यदि आप इंदौर पहली बार जा रहे हैं तो बस सीधे राजबाड़ा पहुँच जाइये वहां से आपको अपनी पसंद का सामान खरीदने के लिए कोई न कोई रास्ता अवश्य मिल जाएगा. इसलिए किसी ज़माने में वहां तांगे वालों का स्टैंड हुआ करता था, जब वहां तांगे वाले चला करते थे… तांगों का ज़माना गया तो फिर वहां टेम्पो स्टैंड बन गया. मतलब शहर के बीचोबीच होने के कारण वहां से आपको शहर के किसी भी कोने में जाने के लिए कोई न कोई वाहन अवश्य मिल जाता है.

खैर अब तो मेट्रो बस का ज़माना है जिसके स्टैंड आपको हर एरिया में मिल जाएंगे. और वहां के लोग भी इतने मिलनसार है कि किसी से भी ‘ओ भिया’ कहकर कहीं का भी रास्ता पूछ लीजिये वह खुशी खुशी बता देगा.

यहाँ के पुराने इलाकों के नाम बहुत प्यारे हैं जैसे मोती तबेला, जूना रिसाला, पागनिसपागा, नन्दालपुरा, नंदा नगर, परदेसीपुरा, राम बाग… आदि

न सिर्फ खाने पीने के शौकीन है बल्कि यहाँ के लोग आस्थावान भी बहुत है, हर मोहल्ले में एक न एक मंदिर अवश्य मिल जाएगा और वह मंदिर अपनी किसी n किसी विशेषता के कारण पूरे शहर भर में प्रसिद्ध होगा. चाहे हरसिद्धि मंदिर हो, पंढरीनाथ हो, गोपाल मंदिर, खजराना हो, जैनों का कांच मंदिर हो, अन्नपूर्णा या बड़े हनुमान. यहाँ का खजराना यानी गणेश मंदिर मुम्बई के सिद्धि विनायक की तरह मनोकामनापूर्ति का मंदिर माना जाता है. यहाँ यदि किसी के परिवार में विवाह या कोई शुभ कार्यक्रम है तो पहला निमंत्रण पत्र सबसे पहले यहीं दिया जाता है.
कांच मंदिर तो अन्दर से पूरा कांच का बना हुआ है. आप अन्नपूर्णा मंदिर जाएंगे तो ऐसा लगेगा जैसे तैंतीस कोटि देवता वहां विराजमान है, इतनी मूर्तियाँ स्थापित की गयी हैं, वैसा ही गीता भवन है जहाँ आपको सारे भगवान् के दर्शन एक ही जगह पर हो जाएंगे.

इंदौर का राजबाड़ा 1984 के दंगों के समय आग लगा दिया गया था तब इसको बहुत क्षति पहुँची थी. उसके बाद इसको कुछ सीमा तक पुनर्निर्मित करने का प्रयत्न किया गया.

इसके अलावा इन्दौर में एक नदी भी बहती है जिसका पुराना नाम कृष्णा या ‘कान्ह नदी’ है, जो बाद में खान नदी कही जाने लगी थी इसलिए दोबारा इसका नाम बदलकर काह्न रख दिया गया है. इसी के किनारे छतरियां हैं, जिसे कृष्णपुरा की छतरियाँ कहते हैं. यह स्थान भी राजबाड़े से लगभग 100 मीटर की दूरी पर है.

इसके अलावा यहाँ देवगुराडिया, गेन्देश्वर महादेव मन्दिर, गोपेश्वर महादेव मन्दिर, गान्धी हॉल परिसर, जबरेश्वर महादेव मन्दिर, श्री रिद्धी सिद्धी चिन्तामन गणेश मंदिर, शनि मन्दिर, और वहां का सबसे अधिक महत्वपूर्ण साईं बाबा मंदिर है जहाँ हिन्दू मुस्लिम सभी लोग दर्शन करने आते हैं.

यहाँ बच्चों के लिए मेघदूत उपवन के अलावा कमला नेहरू प्राणी संग्रहालय भी है जिसे चिड़ियाघर कहा जाता है और यह 4,000 वर्ग मीटर के क्षेत्र में फैला हुआ इंदौर का सबसे पुराना प्राणी उद्यानों में से एक है.

सफ़ेद बाघ, हिमालयी भालू और सफेद मोर, इसकी प्रजातियों के लिए जाना जाता है, इंदौर चिड़ियाघर भी प्रजनन, संरक्षण और जानवरों, पौधों और उनके निवास की प्रदर्शनी के लिए एक केंद्र है.

इंदौर सिर्फ मंदिरों और उपवनों के लिए ही नहीं आजकल के आधुनिक मॉल के लिए भी जाना जाता है. जिनमें ट्रेज़र आईलैंड, मंगल सिटी मॉल, इंदौर सेंट्रल मॉल, C21 मॉल, मल्हार मेगा मॉल, ऑर्बिट मॉल बहुत अच्छी तरह से जाना जाता है.2011 में, वॉलमार्ट की एक शाखा, नामित बेस्ट प्राइस भी दुकानदारों छूट माल खरीदने के लिए खोला गया। इंदौर मध्य भारत में सबसे अधिक मॉल होने का रिकार्ड बना रही है 2011 के बाद से विकसित किया गया है.

युवाओं के लिए भी इस शहर ने विशेष व्यवस्था कर रखी है. इंदौर में इनडोर बास्केटबॉल स्टेडियम के साथ भारत का पहला नेशनल बास्केटबॉल एकेडमी का घर है. इंदौर में सफलतापूर्वक विभिन्न नेशनल बास्केटबॉल चैंपियनशिप का आयोजन किया गया है. इसके अलावा और भी प्रमुख खेल स्टेडियम यहाँ हैं – होल्कर क्रिकेट स्टेडियम, जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम, इंदौर, खालसा स्कूल स्टेडियम, महाराजा स्कूल स्टेडियम
इंदौर टेनिस क्लब, इंदौर रेसीडेंसी क्लब
टेबल टेनिस नेहरू स्टेडियम टीटी हॉल, अभय खेल प्रशाल
कबड्डी के लिए लकी वंडरर्स
शतरंज के लिए एसकेएम शतरंज अकादमी, iLEAD शतरंज अकादमी
डाइविंग के लिए नेहरू पार्क

और चलते चले इंदौर के बारे में कुछ दिलचस्प बातें जान लीजिये –
इंदौर में दो गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स दर्ज है. दुनिया में सबसे बड़ी चाय पार्टी के लिए और दुनिया के सबसे बड़े बर्गर बनाने के लिए शामिल किया गया था.
क्या आप जानते हैं 2017 का स्वच्छता अभियान का सबसे स्वच्छ शहर का अवार्ड भी इंदौर को ही मिला था.
आजकल जो सोया चंक्स की तरह तरह की रेसिपी बनाकर खाई जाती है, उसका अविष्कार भी इंदौर में ही हुआ था और मच्छर भगाने वाली जेट मेट भी इसी शहर से शुरू हुई थी.
इंदौर भारत का एकमात्र शहर है, जहाँ भारतीय प्रबन्धन संस्थान (IIM इंदौर) व भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT इंदौर) दोनों स्थापित हैं.

इंदौर के बारे में मैं बोलते बोलते थक जाऊंगी लेकिन मेरी बातें ख़त्म नहीं होगी क्योंकि यह तो सिर्फ इंदौर के अन्दर की बात बताई, अभी तो इंदौर के आउट स्कर्ट पर स्थित बहुत सारी जगहों के बारे में बताना रह गया है, लेकिन वह फिर कभी.

जाते जाते एक शेर आप सबके लिए कि

बड़े हादसे होने लगे आज कल तेरे शहर में
कोई दिल चुरा ले गया और पता न चला
छू कर निकली जो हवाएँ तेरे चेहरे को,
शहर का मौसम क्यों गुलाबी हुआ पता न चला

– माँ जीवन शैफाली

(वैद्य राजेश कपूर से जानिये आधुनिक जीवन शैली और साबुन, शैम्पू, टूथ पेस्ट के उपयोग से ऊर्जा के क्षरण का साक्षात प्रमाण, लोहे ताम्बे, पीतल, मिट्टी के बर्तनों के उपयोग से बीमारियों से छुटकारा और प्राचीन भारतीय जीवन शैली की ओर लौट आने के लिए लोगों को जागरूक करने का संकल्प… इसके अलावा धूप बत्ती, मोबाइल टीवी रेडिएशन से बचने के लिए “देसी” गाय के गोबर से बनने वाली चिप बनाना सिखाया जिसको मोबाइल पर चिपकाने से उसकी तरंगों के दुष्प्रभाव से बचाव के साक्षात प्रमाण. इसके अलावा घर की सब्जियों के छिलकों और मुरझा चुके फूलों से पानी को शुद्ध करने के लिए बनाया जाने वाले एंजाइम की विधि और उनके आध्यात्मिक प्रवचनों का आशीर्वाद…. इस विषय पर विस्तृत जानकारी और विधियाँ आप इस लिंक पर क्लिक करके प्राप्त कर सकते हैं – http://bit.ly/2EPpJGU)

यात्रा : पाटलिग्राम, पाटलिपुत्र, पुष्पपुर, कुसुमपुर, अज़ीमाबाद से पटना तक की कहानी

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