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जापान लव इन टोक्यो : हिंदुस्तानी दिल का जापान भ्रमण

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मार्च 2015 की एक रात 9 बजे प्लेन टोक्यो के नरिटा एयरपोर्ट पे लैंड किया. 20 मिनट में इम्मीग्रेशन, बैगेज और कस्टम्स से बाहर. इम्मीग्रेशन अफसर ने वीज़ा पे एक मोहर लगाई और एक बड़ा सा स्टैम्प चिपकाया. थोड़ा आश्चर्य हुआ क्योंकि विकसित देशों में सिर्फ आगमन की मोहर लगाई जाती है.

टोक्यो के लिए स्काई ट्रैन का टिकट और मेट्रो का तीन दिन का पास तीन व्यक्तियों के लिए लगभग 100 डॉलर का था. पूरा पैसा कॅश देना पड़ा क्योकि वे क्रेडिट कार्ड नहीं स्वीकार करते. यह था दूसरा आश्चर्य क्योंकि अमेरिका और यूरोप में तो एक डॉलर या यूरो भी क्रेडिट कार्ड से पे कर सकते है.

खैर 80 मिनट बाद होटल पहुँच गए. रूम में जब टॉयलेट गए तो तीसरा आश्चर्य. टॉयलेट पूरी तरह से स्वचालित.

अब मैं थोड़ी सी टॉयलेट की बात करूँगा; इसके लिए क्षमायाचना.

टॉयलेट यानी कि सिंहासन का कवर गिरा हुआ था. लेकिन मेरे प्रवेश करते ही महाराजा के स्वागत में कवर अपने-आप ही उठ गया. यद्यपि सिंहासन के बगल में एक छोटा सा पैनल लगा था जिसका बटन दबाकर टॉयलेट का कवर उठा या गिरा सकते है.

जब सिंहासन पे बैठे तो सीट गरम थी. 15 घंटे के सफर के बाद सिकाई से – आप समझ सकते है कि कहाँ की – काफी आराम मिला. खैर, जब महाराजाओ वाला “राज काज” हो गया तो समय था उस “शाही कार्य” के नामोनिशां को मिटाने का. अब उस पैनल पे तीन मसाज के बटन थे तरह-तरह के गरम पानी की फुहार के.

पहला बटन तेज, संकरी धार ऊपर की तरफ मारेगा, दूसरा थोड़ी चौड़ी धार, और तीसरा बिलकुल बरसात की तरह. और तो और, आप तीनो धार की दिशा को एक अन्य बटन दबा कर “जहाँ” चाहें फोकस कर सकते है और उसकी तीव्रता को भी निर्धारित कर सकते है.

काफी देर तक, सिर्फ एक ऊँगली की मदद से – जैसे कि आप एक सेल फ़ोन यूज़ कर रहे हो – ना केवल सफाई, बल्कि सिकाई भी हो गयी. इसके बाद एक अन्य बटन दबाया तो गर्म हवा ने “सब” सुखा दिया. ऊपर से तुर्रा ये कि हाथ भी गन्दा नहीं हुआ.

एक और बटन दबाया तो सब कम शोर के साथ फ्लश हो गया और सिंहासन की सीट बंद हो गयी. इसी पैनल से आप सिंहासन की सीट को कीटाणु-विहीन एवं साफ़ भी कर सकते है.

अब ऐसा ही एक टॉयलेट मेरे घर की शोभा बढ़ा रहा है. वह रिमोट कंट्रोल से संचालित होता है जो दीवार में लगे चुम्बक से फंसा रहता है.

मेरी समझ में नहीं आता कि इस टॉयलेट के बिना पश्चिमी लोग अपनी सभ्यता को विकसित कैसे कहते है?

क्या आप अनुमान लगा सकते है मैंने जापान में क्या खरीदा?

जब टोकियो में अपने होटल पहुंचे तो देखा कि उसके बगल में एफिल टावर की एक प्रतिकृति बनी हुई थी. यह भी एक आश्चर्य था.

खैर अगले 3 दिन टोकियो घूमने का अवसर मिला. टोकियो के सबसे भव्य शिंटो मंदिर Meiji-jingu देखा. यह मंदिर जापान की सबसे भव्य शॉपिंग स्ट्रीट के पास स्थित है. लेकिन उन्हीं दुकानों के पास एक गली है जिसका नाम ताकेशिता दोरी है. यह गली जापान की किशोरियों का मंदिर है.


कहां एक पारंपरिक मंदिर, एक पारंपरिक राष्ट्र और कहां आधुनिकता से भरपूर एक गली जिसमें रखे कपड़े, जूते, गहने पूरे विश्व में मैंने कहीं और नहीं देखे. जापान के जेन बुद्ध धर्म के शांतिपूर्ण और आध्यात्मिक माहौल और पारम्परिक समाज में किशोरों के फैशन की दुनिया देखकर किसी अन्य ग्रह में होने का अनुभव हुआ.

यहां की दुकानों को निहारते हुए कुछ देर बाद हम शिबुया क्रॉसिंग पर पहुंच गए. यह माना जाता है कि विश्व में पैदल सड़क पार करने वाली यह व्यस्तम क्रॉसिंग है. जैसे ही पैदल यात्रियों के लिए बत्ती हरी होती है सभी दिशाओं से एक ही समय में एक हज़ार से अधिक लोग सड़क पार करते हैं.

यह चौराहा एक प्रोफेसर के कुत्ते, हाचिक, की प्रतिमा के लिए भी प्रसिद्ध है. ऐसा माना जाता है कि 1952 में प्रोफेसर की मृत्यु के बाद हाचिक अपने मालिक की वापसी की उम्मीद में 10 साल तक इस स्टेशन पे प्रोफेसर को ढूँढने आता था और ट्रेन के आने का इंतजार करता था.

हमने जापान के पारंपरिक नाटक काबुकी को भी देखा जिसमें कलाकार अपने चेहरे को रंगकर ड्रामा करते हैं. काबुकी देखते समय एक भी शब्द समझ में नहीं आता यद्यपि थिएटर वालों ने उसकी स्टोरी लाइन अंग्रेजी में प्रदान कर रखी थी. ऐसा लगता था जैसे किसी और ही दुनिया में बैठे हैं.

टोकियो के सबसे मशहूर मंदिर सेनसो-जी को देखने के बाद दोपहर के भोजन का समय था. इस बार हम हाथ से बने उत्कृष्ट सोबा नूडल्स के लिए मशहूर रेस्टोरेंट, नामिकी याबू सोबा, गए. वहां के नूडल्स इतने स्वादिष्ट थे कि हम उनके लिए आप जान भी दे सकते है. लेकिन जिस चीज को हम कभी नहीं भूलेंगे, वह था रेस्तरां में प्रवेश करते समय वहां काम करने वाली एक बुजुर्ग महिला ने हमारे चेहरे पे दरवाजा बंद कर दिया. ऐसा व्यवहार हमें थोड़ा परेशान कर गया क्योंकि अभी तक हमने जापानी लोगों को पृथ्वी पर सबसे विनम्र और शिष्ट आत्माओं के रूप में पाया था. हमारा विश्वास जल्द ही बहाल कर दिया गया क्योंकि एक स्थानीय व्यक्ति ने समझाया कि यह एक व्यस्त जगह है और वह हमें इंतजार करने को कह रही थी.

न्यू यॉर्क से निकलते समय मैंने प्लास्टिक के छुरी-कांटे रख लिए थे. मैं चॉपस्टिक बहुत अच्छी तरह से प्रयोग नहीं कर पाता था. पहली बार जब खाना खाने बैठे तो बैग में छुरी-कांटे ढूढ़ना शुरू किया और तब पता चला कि वह तो मैं सूटकेस से निकालकर बैग में रखना ही भूल गया था. वहां के रेस्तरां या ढाबे टाइप की दुकानों में कोई छुरी-कांटे नहीं मिलते थे. अब मरता क्या न करता. चॉपस्टिक से खाना खाना ही था. और जो मैंने चॉपस्टिक हाथों में पकड़ी तो ऐसा लगा जैसे बचपन से मैं चॉपस्टिक प्रयोग करता आ रहा हूं. वह दिन है और आज का दिन है कभी भी चॉपस्टिक से खाना खाने में झिझक नहीं महसूस होती.

जापान के कई छोटे रेस्त्रां में घुसते ही एक बड़ी सी मशीन मिलती है जिसमें जापानी भाषा में कम से कम 25 से 50 बटन होते हैं. उस बटन को दबाइए, पैसा डालिए और मशीन से कूपन बाहर आ जाता है, उस कूपन को रेस्त्रां के काउंटर पर दीजिए और कुछ समय में गरमा गरम खाना आ जाता था. वहां पर भोजन न्यूयॉर्क से सस्ता पड़ता था. शाकाहारियों के लिए दिक्कत थी लेकिन फिर भी गूगल गुरु की मदद से हम रेस्त्रां में लोगों को समझाने में सफल हो जाते थे कि कोई भी मीट या मछली भोजन में नहीं होनी चाहिए. वे बेचारे हमारे लिए किसी भी तरह से शाकाहारी भोजन की व्यवस्था कर देते थे, हालांकि दाशी या सूप में मछली के कुछ अंश हो सकते थे.

कुछ जगहों पर भोजन करने, ट्रैन में यात्रा करने आदि के बाद समझ में आ गया कि पूरा जापान ही छोटे-छोटे कूपनों और टिकट से चलता है.

टोकियो स्काई ट्री टावर के लिए भी प्रसिद्ध है, जिसे 634 मीटर की ऊंचाई पर दुनिया का सबसे लंबा “फ्री स्टैंडिंग कम्युनिकेशन टावर” माना जाता है. इस परिसर में कुछ सुरुचिपूर्ण दुकाने हैं.
क्या आप अनुमान लगा सकते है मैंने वहां क्या खरीदा?

जापान में बना जापानी जूता…! उस जूते की दुकान में मेरी यही एक शर्त थी कि जूता जापान में बना होना चाहिए. सेल्सगर्ल ने मेरे पैरो की बारीकी से नपाई की और फिर जो जूता वह लाई, उसके जैसी फिटिंग अभी तक मुझे नहीं मिली. पासपोर्ट में लगे वीज़ा को देखकर जूता टैक्स फ्री कर दिया.
आखिरकार मेरे पास पतलून इंग्लिस्तानी है, लाल टोपी रुसी है. सिर्फ एक जूता जापानी की कमी थी. वह भी पूरी हो गयी.

और दिल तो हिंदुस्तानी है ही.

गाँधी जी के तीन बंदरो से भेंट हो गयी

टोकियो से 2 घंटे ट्रेन की दूरी पर प्राचीन शहर, निक्को, है. एक गहरी घाटी में फैला हुआ यह शहर एक ही समय में घनिष्ठ और आध्यात्मिक सा लगता है. काई से ढंकी पत्थर की दीवारें और सिन्दूरी गेट जहाँ अपनत्व का अहसास कराती है, वही विश्व धरोहर में सम्मिलित प्राचीन मंदिरो का समूह और बौद्ध भिक्षुक ईश्वर की उपस्थिति का अनुभव देती है.

वहां स्थित तोशोगु मंदिर की दीवारों पे उकेरे हुए चित्रों के एक श्रृंखला है जिसमें बंदरो के द्वारा जन्म से लेकर गर्भावस्था तक का जीवन दिखाया गया है. इनमें एक, “तीन बंदर”, दुनिया भर में प्रसिद्ध है: “बुरा ना देखो, बुरा ना सुनो और बुरा ना बोलो”. आंख, कान और मुंह को ढंकने वाले नक्काशीदार बंदर बौद्ध अध्यात्म से प्रेरित थे कि अगर हम बुराई नहीं सुनते, देखते या बोलते हैं, तो हम स्वयं को बुराई से बचाये रखेंगे.

इसी तरह एक दीवार पर हाथी की प्रतिमा उकेरी गई है वह भी उन कलाकारों के द्वारा जिन्होंने अपने जीवन में कभी भी हाथी नहीं देखा था.

उसके बाद रिन्नो-जी मंदिर और तैयुइन-ब्यो मंदिर भी देखा. तैयुइन-ब्यो की रक्षा दो देवता करते है. पवित्र आत्मा वाले भक्तो को मंदिर में प्रवेश करने के लिए एक का हाथ ऊपर उठा है; जबकि दूसरे देवता का हाथ नीचे है जो दुष्ट विचार वाले व्यक्तियों को रुकने का इशारा है. मंदिर की छत और दीवारों पे 140 ड्रैगन बने है. जिनके पास मोती है वे ईश्वर के पास हमारी प्रार्थना ले जा रहे है, जबकि बिना मोती वाले ड्रैगन ईश्वर के पास प्रार्थना पंहुचा कर लौट रहे है.

इसके बाद हम पैदल कनमन-गा-फूची घाटी गए जहाँ एक लाइन में बुद्ध की दर्जनों जीजो या मूर्तियाँ हैं जो यात्रियों और बच्चों की सुरक्षा करती है. सभी मूर्तियों के गले में लाल शाल और सर पे लाल टोपी एक रमणीय दृश्य है. यह माना जाता है कि घाटी में घुसते समय और वापस लौटते समय इन मूर्तियों की गिनती में कभी भी एक संख्या नहीं मिलती. इसीलिये इन मूर्तियों को बाके-जीजो या भुतही मूर्तियां भी कहा जाता है.

निक्को से लौट कर टोकियो के अकीबारा क्षेत्र घूमने गए. अकीबारा की नियोन लाइट देख कर आंखें चौंधियां जाती हैं. यह क्षेत्र इलेक्ट्रॉनिक गुड्स, जापानी मंगा कार्टून और कॉमिक्स के लिए जाना जाता है.

आश्चर्य, इस आधुनिकता के मंदिर में एकाएक ढोल, मंजीरे के साथ हरे रामा, हरे कृष्णा की धुन कानो में पड़ी. देखा तो जापानियों का एक समूह धोती-कुर्ते में सनातन की भक्ति में रमा हुआ था.

– अमित सिंघल

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