मेकिंग इंडिया साप्ताहिकी

जीवन के सप्त रंग, मेकिंग इंडिया के संग

इतिहास के पन्नों से : उमर ख़य्याम, एक आशिक़ की कहानी ऐसी भी!

ये ग्यारहवीं सदी की बात है। उनदिनों इस्लाम पर “अब्बासी” वंश की ख़लीफ़ाई थी। एक रोज़, ख़लीफ़ा के दरबार की चर्चाओं में सामने आया, हुज़ूर, एक नामुराद ने अपनी आशिक़ी

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तरानों से झांकते प्रेमप्रश्न

तरानों का संसार प्रेमियों का प्रकाश-लोक है. एक ऐसा लोक, जहाँ उनके सभी प्रश्नों के काव्यात्मक उत्तर रहते हैं. मसलन, प्रेमिका को पूछना हो कि जब हमारा साहचर्य नहीं होता

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रुद्राक्ष

“रुद्राक्ष” के विषय में प्रसिद्ध उक्ति है : “रुद्राक्ष धारयेद्बुध:”। [ अर्थात् ज्ञानीजनों को रुद्राक्ष धारण करना चाहिए। ] जहाँ “रुद्राक्ष” की चर्चा होती है, वहां धर्म और विज्ञान एक

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द क्वीन ऑफ़ चैस!

उसका नाम रहने ही दीजिए, “क्वीन” काफ़ी नहीं? बहरहाल, उसका नाम था : गुंजन। बड़ी बड़ी काली सफ़ेद गोटियों-सी आखें, चौकोर सा कोमल मुख, आक्रामक भाव-भंगिमाएँ और ढेर सारी बातें।

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तुम आयीं जैसे छीमियों में धीरे-धीरे आता है रस!

“तुम आयीं जैसे छीमियों में धीरे-धीरे आता है रस!” ये श्री केदारनाथ सिंह हैं, और बड़े दिनों से इस कविता को गुनगुनाते हुए मेरे हृदय में बह रहे हैं। वही

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