मेकिंग इंडिया साप्ताहिकी

जीवन के सप्त रंग, मेकिंग इंडिया के संग

तरानों से झांकते प्रेमप्रश्न

तरानों का संसार प्रेमियों का प्रकाश-लोक है. एक ऐसा लोक, जहाँ उनके सभी प्रश्नों के काव्यात्मक उत्तर रहते हैं. मसलन, प्रेमिका को पूछना हो कि जब हमारा साहचर्य नहीं होता

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ओ साथी रे दिन डूबे ना : प्रणय का मनुहार गीत

जब भी तुझे आँख भर देखता हूँ एक बात भेजे में कौंधती है… क्या? ये के या तो तू बहुत बड़ी लुल्ल है या बहुत बड़ी चुड़ैल…. उत्तर प्रदेश की

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मनमोहना… कान्हा सुनो ना…

प्रेम, प्रतीक्षा, प्रारब्ध और पीड़ा यात्रा है… और मिलन एक चमत्कार जो सिर्फ चयनित लोगों के लिए सुरक्षित स्थान है… एक ऐसा स्थान जो इस धरती पर नहीं, ब्रह्माण्ड में

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मोहब्बत और अदा का संगम : प्यार ये जाने कैसा है

पहाड़ से नदी का उतरना, अटखेलियों के दस्तावेज पर स्पर्श की मोहर और मोहब्बत से अदा का संगम बस यही भाव उपजते हैं, जब भी मैं इस गीत में जैकी

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अनोखी रात : क्या होगा कौन से पल में, कोई जाने ना

मैं तुम्हारे लिखे एक-एक अक्षर पर पाँव धर पार कर लेती हूँ हर वो कविता जो तुम विरह की रात में लिखकर बहा देते हो बनारस के घाट पर… ताकि

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जीवन का पूर्ण सत्य : आधा है चंद्रमा रात आधी

आसमान का नीला रंग चुराकर, प्रेम की नदी में घोल आने से नदी आसमानी हो जाती है. कामनाएं दुनियावी पैरहन उतारकर नीले रंग को देह पर मलती हैं, और जलपरियों

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हे री सखी मंगल गावो री, धरती अम्बर सजावो री, आज उतरेगी पी की सवारी

व्यवस्था चाहे आध्यात्मिक हो या सामाजिक… जब जब व्यवस्था और प्रेम में से किसी एक को चुनने का मौका आया मैंने सारी व्यवस्थाओं को ताक पर रखकर प्रेम को चुना….

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कुछ दिल ने कहा… कुछ भी नहीं…

संवाद की उत्कंठा की पराकाष्ठा पर ही प्रस्फुटित होता है मौन. मौन, जो उस कल्पवृक्ष का बीज है, जो प्रार्थनाओं के पानी से पाता है अपना सम्पूर्ण स्वरूप…. प्रेम-यात्रा की

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कितनी फीकी थी मैं, सिन्दूरी हो जाऊं… ओ सैंया…

जिनके घर कॉलोनी के नहीं, मोहल्लों और गली के नामों से पहचाने जाते हैं वही जान सकते हैं मुम्बई की चाल में रहने वालों का इश्क. इसे पहली बार फिल्म

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