मेकिंग इंडिया

जीवन के सप्त रंग, मेकिंग इंडिया के संग
जीवन को जो दिशा दे, ऐसा शिक्षक आना चाहिए हर छात्र के जीवन में

रात के डेढ़ बजे हों… मैं होऊं… मेरी साइकिल हो… दस-बारह फ़ीट चौड़ी सड़क हो… आगे-पीछे से कोई आता जाता न हो… मैं चलते-चलते ही ऊँघकर सो जाऊं… आगे बढ़ते हुए सो न भी पाऊँ तो कम से कम इस असम्भव सी कल्पना में खो जाऊं…

मेरी कल्पना में 2007 की वो फ़िल्म ‘तारे जमीं पर’ हो… मेरे शिक्षक हों… वो शिक्षक जो थोड़े-थोड़े कर के मुझ में पूरे बसे हैं. वो शिक्षक जो अब मुश्किल ही मिलते हैं… मेरे आदर्श शिक्षक.

शायद उस फिल्म के आमिर खान जैसे शिक्षक जो सृजन के पोषक हों… जो अपनी कक्षा में अलग-थलग बैठे बच्चे की समस्या पूछ सके. मैं जब बीमार होने के बाद वापस स्कूल लौटूँ तो वो मुझ से बैठ के बात कर सके… जब पढ़ते-पढ़ते मेरा मन उचाट हो जाए तो वो मुझमें डूबकर समाधान ढूंढ लाएँ…

आज जब अपने आस-पास वैसे शिक्षकों की कमी पाता हूँ, जो अपने छात्रों से सीधे जुड़ सके तो दो कारण दिखते हैं. मूल्यों के ह्रास के कारण हर तरफ समस्या बढ़ी है और वक़्त के साथ हम भी समझदार होने के भ्रम के शिकार होते चले जा रहे हैं.

हम निश्चित ही अपने युवाओं में संक्रमण का रूप ले रहे हताशा से निबटने के उपायों को तलाशने में लगे हैं. आज पंद्रह वर्ष का बच्चा डिप्रेशन और ऐंगज़ाइटी का शिकार हो जा रहा तब ऐसी सोच लाजिमी भी है.

मगर हम उस समस्या के जड़ तक शायद ही पहुंचते नजर आते हैं. उनके हतोत्साहन के कारक उनके शिक्षक हैं. जो शिक्षक उनके प्रेरणा के पुंज होने चाहिए थे, उन्होंने अपने बच्चों को ही अपना भावात्मक कूड़ेदान समझ लिया है. अपने पूर्वाग्रहों, धारणाओं, असफलताओं और वंचित भावनाओं के चश्मे से वो उन बच्चों में इन्ही मूल्यों का संचार करने में लगे हैं.

समाज में आदर्शों के नए प्रतिमान गढ़ते रहना इसलिए भी आवश्यक है, वो हमारे लिए ध्रुव का काम करते हैं. फिल्मों के बात से मुझे ‘बागवान’ का वो दृश्य भी याद आ रहा जिसमें सलमान से अपनी प्रशंसा सुन अमिताभ कहते हैं, ‘वो खुद एक अच्छा इंसान है, इसलिए उसे मैं अच्छा लगा’. सलमान भी अमिताभ के बाकी बेटों की तरह ही थे. लेकिन वहाँ उनके जीवन मूल्यों का चुनाव था जो उन्हें बाकियों से अलग करती थी. ये चुनाव शिक्षक ही करा सकते हैं.

शिक्षकों पर फिल्में बनती रहनी चाहिए, उनपर बात होती रहनी चाहिए… कम से कम सकारात्मकता के संचार के लिए ही सही…

महिला किरदारों में मुझे ‘मैं हूँ ना’ की सुष्मिता सेन याद आती हैं जिन्होंने शिक्षक के एक बिल्कुल अलग अवतार से हमारा परिचय करवाया था, और आखिर में आज रानी मुखर्जी याद आती हैं… उनकी नई फिल्म ‘हिचकी’ सभी शिक्षकों और छात्रों को देखनी चाहिए…

आमिर ने हमें बताया था कि हम कैसे असामान्य छात्र को भी सामान्य और विशिष्ट होने का अहसास करा सकते हैं. लेकिन आज रानी ने हमें बताया है कि शारीरिक समस्याएं अपनी जगह, मानसिक समस्याएं उनसे कहीं गंभीर हैं… वो हमें कहीं गहरे खोखला करेंगी…

हर छात्र के जीवन में कम से कम एक ऐसा शिक्षक तक आना ही चाहिए जो उसके जीवन को दिशा दे दे. ऐसी फिल्में सचमुच दशकों में एकाध बार ही बनती हैं!

मैं खुद को इस मामले में भाग्यशाली मानता हूं, कुछेक मौकों को छोड़ दें तो अबतक जीवन के हर दौर में मुझे ऐसे शिक्षक मिले हैं जो मेरे मन के सफर के सहचर हो गए हैं. शायद इसलिए भी मैं राह चलते ऐसी कल्पनाओं में डूब जाता हूँ! काश…

– कुमार अभिषेक

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