मेकिंग इंडिया साप्ताहिकी

जीवन के सप्त रंग, मेकिंग इंडिया के संग
मन का मनका

मित्रों, हमारा सबसे पक्का साथी कौन है? वह कौन है जो सुख-दुख में, स्वर्ग-नर्क में हमारा साथ नहीं छोड़ता।

जीव के दो नित्य मित्र है ऊपर ब्रम्ह और नीचे मन है। ब्रम्ह पालक सखा और जीव बालक सखा है, इसी प्रकार मन बालक सखा और जीव पालक सखा है।

माँ, बाप, भाई, बहन, पत्नी, पुत्र जैसे निकटतम सम्बन्धियों से भी मृत्यु होने पर हमारा साथ छूट जाता है, किन्तु हमारा मन और ईश्वर तब भी हमारे साथ ही रहता है।

हमारा और हमारे मन का साथ तब से है जब प्रथम बार सृष्टि हुई थी और तब तक साथ रहेगा जब तक हम कैवल्य मोक्ष न प्राप्त कर लें। और ईश्वर में तो मोक्षावस्था में विलीन होना ही है।

सृष्टि के प्रारम्भ से हमारे कैवल्य मोक्ष प्राप्त करने के मध्य हमें जो करोड़ों योनियों में करोड़ों शरीर प्राप्त होंगे उन सब में एक ही मन हमारे साथ रहेगा।

मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार हमारे अंतः करण के ही सूक्ष्म अवयव है। मन का कार्य संकल्प-विकल्प करना है। पूर्व पूर्व जन्मों के संस्कार से उत्तर उत्तर जन्मों में हमारा मन हमें सांसारिक विषयों की ओर धकेलता रहता है।

हम पालक सखा है इस नाते हमारी जिम्मेदारी है कि मन जो हमारा सनातन और नित्य मित्र है उसे भटकने न दें, यदि हम मन पर नियंत्रण करने में असफल रहे तब हमें चाहिए कि मन की बाग़डोर हमारे पालक सखा ईश्वर के हाथों में सौंप दे।

तदात्मपत्ति मन का एक बहुत बड़ा गुण है। अर्थात मन अपनी रूचि के विषय के अनुकूल हो जाता है, अतः बुद्धि जिसका कार्य निश्चय करना होता है उसके प्रयोग से भी हम मन को बलपूर्वक भजनानन्दी बना सकते हैं।

नायं जनो मे सुखदुख-हेतुर्
न देवताऽऽत्मा ग्रह-कर्म-कालाः।
मनः परं कारणमामनन्ति
संसार-चक्रं परिवर्तयेद् यत्॥ (भिक्षु गीता )

मेरे सुख-दुख का कारण न ये मनुष्य हैं, न देवता, न यह शरीर और न ग्रह। कर्म और काल आदि भी कारण नहीं। महात्मा लोग (सुख-दुखात्मक) संसाररूप चक्र घुमाने वाले मन को ही इनका कारण बताते हैं।

मित्रों, सुख-दुख की पहुंच कूटस्थ आत्मा तक नहीं होती वह तो नित्य सच्चिदानन्द घन रूप है।

मन का भोजन ज्ञान है।
अतः जब हमें विषयजन्य सुख या दुःख प्राप्त होता है तब उस वस्तु या विषय की पहुंच भी मन तक नहीं होती।
जैसे जब हम मिठाई का सेवन करते है तब मिठाई तो स्थूल शरीर में ही समाहित हो जाती है, मन तक तो नहीं पहुंचती। वस्तुतः मन तक तो सिर्फ मिठाई ग्रहण करने का ज्ञान ही पहुंचता है। इसीलिए ज्ञान को मन का भोजन या अन्न कहा गया।

अब जब मिठाई मन तक पहुंची ही नहीं सिर्फ मिठाई ग्रहण करने का ज्ञान ही पहुंच तब प्रश्न यह उठता है कि मन तक मिठाई ग्रहण करने का सुख अथवा मधुरता कैसे पहुंची? क्योंकि क्रियाज्ञान में क्रियाफल संलग्न नहीं होता।

अतः सिद्ध होता है कि सुख-दुख अथवा रस विषय वस्तु में न हो कर मन में पूर्व से ही स्थित है। सुख यदि मिठाई में होता तो पेट भर मिठाई ग्रहण करने के बाद और मिठाई खाने पर वमन, वितृष्णा आदि नहीं होनी चाहिए थी तथा जिसे उस मिठाई से अरुचि है उसे भी ग्रहण करने पर समान सुख प्राप्त होना चाहिए, किन्तु ऐसा तो नहीं होता।

किन्तु एक ही स्त्रोत में विपरीत गुण साथ-साथ नहीं हो सकते, क्योंकि वहां प्रबल आश्रित निर्बल आश्रित को नष्ट कर देगा जैसे एक ही स्त्रोत में जल और अग्नि रहेंगे तो जो प्रबल होगा वह दूसरे को नष्ट अथवा निष्प्रभावी कर देगा।

अतः मन भी सुख दुख दोनों का ही स्त्रोत सिद्ध नहीं होता।

मित्रों , कामना के कारण मन अशांत अथवा चंचल होता है तथा कामना पूरी होने पर शांत और समाहित हो जाता है , जैसे ही मन शांत और समाहित होता है वैसे ही सुख स्वरूप आत्मा का मन में प्रतिफलन हो जाता है और मन सुखी हो जाता है। जैसे अशांत जल के शांत होते ही सम्मुख खड़े व्यक्ति का प्रतिबिम्ब तत्काल जल में प्रतिफलित हो जाता है।

फिर मन की चंचल प्रकृति के कारण कुछ समय बाद पुनः दूसरी कामना उत्पन्न होती है और मन अशांत हो कर बाह्य मुखी हो जाता है, तब सुख स्वरूप आत्मा का प्रतिबिम्ब तिरोहित हो जाता है और मन पर पुनः जड़ता छा जाती है जिससे सुख का अभाव हो कर दुःख की व्याप्ति होती है।

अतः सरल शब्दों में कह सकते है कि, अनुकुलता होने पर मन जब शांत, समाहित हो कर चैतन्य, सुख स्वरूप आत्म तत्व की निकटता प्राप्त करता है तब सुख अनुभूत होता है और प्रतिकूलता होने पर मन जब अशांत और बहिर्मुख होकर जड़ता (संसार ) की निकटता प्राप्त करता है तब दुःख अनुभूत होता है।

वस्तुतः मन भी सुख दुख का स्त्रोत न हो कर सुख दुख का अभिव्यंजक संस्थान मात्र है जैसे दर्पण चेहरा न हो कर चेहरे को अभिव्यक्त करने वाला अभिव्यंजक संस्थान मात्र है।

मित्रों, मन अंतःकरण चतुष्टय का चौथा सदस्य है। मन से ऊपर बुद्धि, बुद्धि से ऊपर अहंकार और अहंकार से ऊपर चित्त की स्थिति है।

पद में निम्नतम होने पर भी मन का सबसे अधिक महत्व क्यों है?

उसका कारण यह है कि मन एकमात्र कारक है जिसकी गति तीनों काल में होती है, प्रत्येक देश में होती है और प्रत्येक वस्तु में होती है। ऐसा कोई काल, देश, वस्तु नहीं है जिसमें मन की गति प्रतिबंधित हो।

बुद्धि की ज्ञान के सापेक्ष सीमा होती है, अहंकार की व्याप्ति स्वयं के अलावा सिर्फ उसी देश, काल, वस्तु में होती है जिससे ममता होती है।

मन का अधिदैव चन्द्रमा है। समष्टि स्तर पर समझे तो चन्द्रमा स्वयं प्रकाशित न हो कर सूर्य से प्रकाशित होता है एवं पृथ्वी द्वारा बाधित सूर्य प्रकाश के कारण सोलह कलाओं को प्राप्त होता है ।
व्यष्टि स्तर पर मन भी स्वयं प्रकाशित न हो कर आत्मा द्वारा प्रकाशित होता है एवं अविद्या द्वारा बाधित आत्म प्रकाश की भिन्न मात्रा के कारण सोलह मनःदशा को प्राप्त होता है।
साधन की विधा की दृष्टि से विभिन्न ग्रन्थों में इन सोलह मनः स्थितियों के विभिन्न नाम उपलब्ध होते हैं।

समष्टि में जिस प्रकार पूर्णिमा का पूर्ण प्रकाशित चन्द्र भी कभी कभी पृथ्वी की छाया में आकर ग्रहण की चपेट में आ जाता है, उसी प्रकार अक्सर साधना काल में पूर्ण समाहित शांत तथा आत्मप्रकाश से प्रकाशित साधक का मन भी अविद्या की चपेट में आकर साधना से च्युत हो जाता है। जैसे राजा भरत के साथ हुआ था।

जागृत अवस्था में मन चेतन, सुप्ति में अवचेतन और सुषुप्ति में अचेतन (अविद्यक) हो जाता है ।

मन की दार्शनिक परिभाषा अनुसार, ज्ञान और शब्द तथा शब्दजन्य संस्कार का समवेत संघात मन है। मन का कार्य संकल्प – विकल्प करना है, बिना ज्ञान और शब्द के कोई संकल्प विकल्प नहीं हो सकता।

अतः मन को शांत करने की एक विधि मौन धारण करना भी है, यह मौन न सिर्फ स्थूल “वैखरी वाणी” के निषेध द्वारा होना चाहिए बल्कि मानसिक “मध्यमा वाणी” का निषेध भी आवश्यक है ।

फिर प्रश्न उठता है कि जब शब्दों के निषेध से मन शांत हो जाए तब ऐसा शांत मन बिना शब्दों के प्रभु स्मरण या आत्म चिंतन कैसे कर पायेगा, क्योंकि स्मृति और चिंतन भी बिना शब्दों के नहीं होगा? चिंतन के लिए तो शब्द आवश्यक है ही, रूप स्मरण के लिए भी शब्द आवश्यक है क्योंकि नाम रूप अभिन्न होते है अतः रूप स्मरण करते ही नाम भी प्रकट होगा जो शब्दगत होता है।

मित्रों इस अवस्था में स्मरण और चिंतन हेतु तृतीय “पश्यंती वाणी” का अवलम्बन लेना होता है , जिसका अभ्यास अष्टांग योग का छठवा चरण ध्यान कहलाता है।

पश्यंती वाणी में शब्द संघात न हो कर रूपमय हो जाते हैं, मित्रों इसीलिए इस वाणी को पश्यंती (देखना) कहते है। और इसीलिए ऋषियों को मन्त्रदृष्टा कहते हैं जो शांत समाहित मनःदशा में मन्त्र का दर्शन करते है।

विशेष – यह लेख अध्ययन एवं चिंतन आधारित मेरे निजी विचार है, आपका असहमत होने का अधिकार सुरक्षित है।

– आशीष पिपलोनिया

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