मेकिंग इंडिया साप्ताहिकी

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विश्व के प्रत्येक पदार्थ के मध्य यन्त्र है और उस यन्त्र के मध्य भी यन्त्र है

सृष्टि के सभी जड़-चेतन पदार्थों का स्थूल, सूक्ष्म एवं कारण धरातलों पर जो रूपायन होता है, उसका मूल सूत्रधार है– ‘अग्नि’ या उसकी ‘रूपतन्मात्रा’। इसलिए अग्नितत्व (रूपायन) का यन्त्र से सम्बन्ध है।

यन्त्र शब्द का ‘र’ ( यं+त+रं=यन्त्र ) अक्षर यही संकेतित करता है। ‘यन्त्रम्’ शब्द का ‘त’ अक्षर अमृत का बोधक है। ‘त’ ( अमृत ) सुसंगति ( Harmony ) का बोधक है।

यन्त्र के अंग– यन्त्र में तीन शक्तियाँ हैं– ‘यं’ = वायु = उपादान (स्पंदन), ‘र’ = अग्नितत्व = रूपायन एवं ‘त’ = अमृत = छन्द (Harmony) = सुसंगति।
उपादान+आकृति+छन्दस– तीनों महत्वपूर्ण तत्व हैं। जहाँ जड़, प्राण या मन के रूप में व्यक्त सत्ताशक्ति सस्पन्दावस्था में है, वहीं किसी भी श्रेय- प्रेय की सिद्धि के लिये ‘छन्दस्’ के आश्रय में निर्दिष्ट रूपायण ही ‘यन्त्र’ है। वेदों ने ‘छन्दस्’ से सृष्टि होने का प्रतिपादन किया है।

यन्त्र का व्युत्पत्त्यात्मक अर्थ– यन्त्र शब्द ‘यम्’ धातु से निष्पन्न होता है ( यन्त्र् + अच् अथवा यम् + त्र )। रोकना, निग्रह करना, संयम करना, नियंत्रण करना, विस्तृत शक्ति को केन्द्रीभूत करना– ‘यन्त्र्’ धातु का अर्थ है। यन्तृ का अर्थ है– परिचालक। यन्त्रिन् का अर्थ है– नियन्त्रण करने वाला।

‘मौलिक्यूल’ और ‘एटम’ ( यौगिक अणु एवं अणु ) दोनों यन्त्र है, क्योंकि उन दोनों में अनन्त शक्तिभण्डार है, किन्तु उस शक्तिभण्डार को न्यूक्लियस के यन्त्र से इस प्रकार नियन्त्रित करके रखा गया है, कि उसके एलेक्ट्रान अपनी कक्षायें छोड़कर बाहर निकलते हुए प्रलयंकारी ताण्डव नहीं मचा सकते।

( एक बीज को लें। यह भी एक ‘यन्त्र’ है। इसके भीतर एक पूर्ण वृक्ष ( जड़, तना, शाखा,पत्ते , फूल, फल, ऊँचाई, लम्बाई, चौड़ाई, रूप, रंग, आन्तरिक व्यावर्तक गुण, बाह्य गुण, औषधीय गुण आदि ) उत्पन्न करने की पूर्ण शक्ति सम्पीड़ित करके भरी हुई है। इसी में जेनेटिक कोडिंग एवं पूर्ण जैवसंरचना भी निहित है। बीज एक सूक्ष्म यन्त्र है, किन्तु इस बीज की शक्तियों को नियंत्रित करने वाला कोई और सूक्ष्म यन्त्र स्थित होगा और वही ‘मूल यन्त्र’ होगा। )

साधन राज्य में विभिन्न स्नायुकेन्द्र ही ‘यन्त्र’ है। इन यन्त्रों में प्राणशक्ति को चालित करके एवं मन को स्थिर करके अनेक अलौकिक कार्य साधिक किये जाते हैं। श्रीकृष्ण के शरीर के समस्त यन्त्र पूर्ण विकसित थे। इसीलिये उनकी प्रत्येक इन्द्रिय में समस्त इन्द्रियों की शक्तियाँ विकसित थीं।
‘अग्ङानि यस्य सकलेन्द्रिवृत्तिमन्ति।’

जिस प्रकार अणुवीक्षण यन्त्र, दूरवीक्षण यन्त्र की सहायता से हम सूक्ष्म एवं दूरस्थ पदार्थों को देखते हैं, उसी प्रकार योगी एक-एक स्नायुकेन्द्र में प्राणशक्ति चालित करके वहाँ मन के स्थिरीकरण द्वारा अतीन्द्रिय तत्वों का प्रत्यक्षीकरण किया करते थे।

क. प्राणशक्ति को चालित करने की प्रणाली ‘तन्त्रतत्व’ ( योगतत्व )।

ख. मनन शक्ति को केन्द्रीभूत करने की प्रणाली ‘मन्त्रतत्व’।

ग. शरीर के समस्त स्नायुओं के विभिन्न केन्द्रों को जागृत करके अतीन्द्रीय शक्तियों का आयत्तीकरण ‘यन्त्रतत्व’ का विषय है।

१. हृदय भी एक यन्त्र है– हृदय में संयम करने से चित्त के स्वरूप का ज्ञान होता है– ‘हृदये चित्तसंवित्’ ( ३.३४ )।

२. मूर्द्धा भी एक यन्त्र है– ‘मूर्धज्योतिषि सिद्धदर्शनम्’ ( ३.३२ )। मूर्द्धा की ज्योति में संयम करने से सिद्ध पुरुषों के दर्शन होते हैं।

३. नाभिचक्र भी एक यन्त्र है– ‘नाभिचक्रे कायव्यूहज्ञानम्’ ( ३.२९ )। नाभि-चक्र में संयम करने से शरीर के व्यूह ( उसकी स्थिति ) का ज्ञान होता है।

४. ध्रुव भी एक यन्त्र है– ‘ध्रुवे तग्दतिज्ञानम्’ ( ३.२८ )। ध्रुव में संयम करने से ताराओं की गति का ज्ञान होता है।

५. सूर्य भी एक यन्त्र है– ‘भुवनज्ञानं सूर्ये सन्यमात्’। सूर्य में संयम करने से समस्त लोकों का ज्ञान होता है।

६. कण्ठकूप भी एक यन्त्र है– कण्ठकूपे क्षुत्पिपासानिवृत्ति:'( ३.३० ) । कण्ठकूप में संयम करने से भूख-प्यास की निवृत्ति हो जाती है।

७. चन्द्रमा भी एक यन्त्र है–’चन्द्रे ताराव्यूहज्ञानम्’ ( ३.२७ )। चन्द्रमा में संयम करने से समस्त तारों के व्यूह ( स्थितिविशेष ) का ज्ञान होता है।

८. स्वार्थसंयम भी एक यन्त्र है– ‘ततः प्रातिभश्रावणवेदनादर्शास्वादवार्ता जायन्ते’ ( ३.३६ )। सत्त्वपुरुषान्यताख्याति के द्वारा स्वार्थसंयम करने से–

१. श्रावण– दिव्य शब्दश्रवण,
२. वेदन– दिव्य स्पर्श का अनुभव,
३. आदर्श– दिव्य रूप का अनुभव,
४. आस्वाद– दिव्य रस का अनुभव,
५. वार्ता– दिव्य गन्ध का अनुभव– प्राप्त होता है।

९. पंञ्चभूत भी यन्त्र है– ‘ततोऽणिमादिप्रादुर्भाव:
कायसम्पत्तद्धर्मानभिघातश्र्च’ ( ३.४५ )। भूतों पर विजय प्राप्त करने से अणिमादिक अष्ट सिद्धियाँ कायसम्पत् की प्राप्ति एवं उन भूतों के धर्मों के बन्धन से मुक्ति प्राप्त होती है।

१०. चित्त भी एक यन्त्र है– ‘बन्धकारणशैथिल्यात्प्रचारसंवेदनाच्च चित्तस्य परशरीरावेश:'( ३.३८ )। बन्धन के कारण की शिथिलता एवं चित्त की गति का सम्यक् ज्ञान होने से चित्त को दूसरे शरीर में प्रवेश करने की शक्ति प्राप्त होती है।

११. संस्कार भी यन्त्र है– ‘संस्कारसाक्षात्कारात् पूर्वजातिज्ञानम्’ ( ३.१८ )। संयम के द्वारा संस्कारों का साक्षात्कार कर लेने पर पूर्वजन्मों का ज्ञान हो जाता है।

१२. चक्र भी यन्त्र है– मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपूरक, अनाहत, आज्ञा, बिन्दु, अर्द्धेन्दु , व्यापिनी, रोधिनी, शक्ति, समना, उन्मना, सहस्रार आदि सभी यन्त्र है। इनके ४,६,१०,१२,१६,२ दल, लं, वं, रं, यं, हं, ओं आदि बीज,डाकिनी, राकिनी, लाकिनी, काकिनी, शाकिनी, हाकिनी आदि शक्तियाँ, कामाख्या, पूर्णगिरी, जालन्धर, उड्डीयान पीठ, पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन आदि तत्व, ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, ईश, सदाशिव, शम्भु देवता– इन यन्त्रों के अंग है।

Atoms ( अणु ) भी एक सौर जगत् है। उनके भीतर भी तैजस् रेणुसमूह की शक्तिराशि क्रीड़ा कर रही है। अणु के यन्त्र ( शक्तिकूट ) के भीतर भी सूक्ष्मतर शक्ति-यन्त्र है। यह यन्त्र आणविक यन्त्र का भी कारण है। यन्त्र के भीतर यन्त्र, उसके भीतर यन्त्र और फिर उसके भी भीतर यन्त्र स्थित है।

‘श्रीयन्त्र’ को ही लें– वृत्त के भीतर वृत्त, उसके भीतर सूक्ष्म त्रिभुज, उसके भीतर पुनः त्रिभुज, उसके भीतर पुनः त्रिभुज का सातत्य।

विश्व के प्रत्येक पदार्थ के मध्य यन्त्र है और उस यन्त्र के मध्य भी यन्त्र है। सभी यन्त्र कार्य-कारण रूप से या अधिष्ठाता-अधिष्ठेय रूप में स्थित हैं।

– निशा द्विवेदी

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