मेकिंग इंडिया साप्ताहिकी

जीवन के सप्त रंग, मेकिंग इंडिया के संग
प्रतीक्षा-मिलन : अंतर्मन की भाषा का शाब्दिक प्रकटन

देखिये मैं बहुत संकोची स्वभाव का हूँ, बहुत कम इस शैली में बात करता हूँ… आपने आग्रह किया तो कह दिया… वर्ना मुझे बहुत कष्ट होता है अंतर्मन की भाषा को शब्दों में प्रकट करना… यह तो ऐसा ही है ना जैसे आप चेतना को देह देने का प्रयास कर रहे हैं…

अंतर्मन के भाव के बाह्य प्रकटन में इतना संकोच क्यूं? शिव और शक्ति के इस ब्रह्माण्डीय मिलन का बहिप्रसरण न हुआ होता तो इस संसार का प्रकटन कैसे होता? यह संसार उस आत्मस्फुरण का ही तो प्रकटन है ना? ब्रह्माण्डीय मिलन तक पहुँचने की सीढ़ी भी तो यही है न? फिर भी आपको कष्ट हुआ… उसके लिए क्षमा प्रार्थी हूँ… लेकिन आपने यह कष्ट क्यों उठाया मेरे लिए?

आप मुझे पूर्वपरिचित जैसी लगती हैं… ‘जन्मों का नाता है’ गीत की तरह। आप साधक भी लगती हैं। अर्थात साधना में रत। आप तपस्विनी भी लगती हैं। चिर प्रतीक्षा में रत तापसी। आप की आँखें इस लोक से इतर, कुछ और खोजती हुई दिखती हैं। आपकी समझ, आपकी बातें इतनी मिलती है मुझसे, लगता है जैसे मैं ही बोल रहा हूँ… और आप यह सब जानती हैं लेकिन मुझसे बुलवाए बिना रह नहीं पाती।

हे ईश्वर!! इतनी सारी चीज़ें खोज ली आपने मुझमें… मैं कुछ नहीं जानती प्रभु… अपने मन की मौज पर सवार रहती हूँ… ‘तुझमें रब दिखता है’ गीत के जैसे सबमें उसी का स्वरूप देखती हूँ… मेरे लिए हर व्यक्ति ईश्वर का दूत है… इसलिए प्रतीक्षा तो है ही उसकी कि जिसकी रचना इतनी सुन्दर वो कितना सुन्दर होगा…

मन तो किया कि कह दूं आपसे अधिक सुन्दर तो न होगा.. लेकिन चुप रह गया… बस इतना ही कहा – अन आनुकूल्य विरत सकल कलि कालुष्य हारक निर्दुष्ट राग समन्वित अनुहरि उपसेव्यक…

हे ईश्वर इसे सरल हिन्दी में बताएं, मैं अज्ञानी बहुत अनपढ़ हूँ जी..

सरलीकरण असम्भव है…

फिर भी कुछ तो कह दीजिये ऐसा जो मुझे समझ आये…

नहीं, विशेषणों का सरलीकरण नहीं होता। काला, गोरा, मीठा, अच्छा, ये सब स्वयं में अपना एक अर्थ लिए हैं, इन्हें उसी तरह से ही समझना होता है।

किसी को ना समझ आए तो उसे क्या अधिकार नहीं जानने का… क्या आपका कर्तव्य नहीं कि उसे उसकी भाषा में समझाया जाए…. मैं बीहड़, आदिम… न वेद पढ़ी न उपनिषद… उसे तो इस संसार की भाषा भी नहीं आती … उसके लिए आपने तनिक न सोचा… काला, गोरा, मीठा, अच्छा, जैसा कोई विशेषण मेरे लिए भी तो बना होगा आपके शब्द भण्डार में?

वह भाषा जो मेरे अंतर्मन की है, आप जान भी गईं और समझ भी गईं। यूँ परीक्षा न लीजिए माते!! गिरा अनयन, नयन बिनु बानी।

शब्द तो अमूर्त भाव का प्रतीक मात्र होता है देवी. किसी अमूर्त भाव को शाब्दिक अर्थ देने पर एक शब्द के स्थान पर कुछ और शब्द ही तो प्रकट होंगे… शब्द के पीछे जो भाव होता है वह तो अप्रकट ही रह जाएगा…

मेरी ज़ुबान की तो आँखें नहीं हैं, और आँखों के पास कोई वाणी नहीं है. सुंदर और सौंदर्य के पीछे जो सूक्ष्म भाव है वह कैसे किसी को समझाया जाए. शब्दों में वह सार्मथ्य कहाँ कि किसी जुबान को मिठास चखा सके?

खैर आपने इतना कष्ट उठाया तो मैं भी अपनी बुद्धि अनुसार इसका अर्थ निकाल लूंगी… कुछ उल्टा सीधा अर्थ निकालूँ तो फिर हँसना नहीं…

आप जो अर्थ निकालेंगी वही सही होगा…

हाँ सच है… तभी तो कहा आपने… वह भाषा जो मेरे अंतर्मन की है, आप जान भी गईं और समझ भी गईं.. इस अंतर्मन की भाषा का प्रकटन करने का प्रयास करूंगी, शब्द भले न दे पाऊँ… जिन भावनाओं पर सवार है… वह अवश्य प्रकट होगी…

इतना कहना हुआ और वह अचानक से रेत के टीले की भांति ढह गयी… रेत का एक गुबार सा उठा और रेगिस्तान के तूफानी बवंडर की तरह गोल घूमता हुआ भागने लगा…

दूर कहीं कालबेलियों की काली नागिनें गोल घूमती हुई गीत गा रही थीं…

भक्ति हमारो पीर संतो शरणे सासरो कालबेलिया
अब कैसे होवे जग में जिवणो
म्हारी हैली
लागा शब्द रा तीर
म्हारी हैली
लागा शब्द रा तीर

न जाने कौन सी बयार थी जो आंधी का रूप लेकर आई और रेत का एक गुबार उठकर उस अग्नि के चारों तरफ घूमने लगा… जिस के पास बैठकर कुंवर मिलन सिंह परमपरमेश्वरी से प्रार्थना कर रहा था… अचंभित था कि इतनी तेज़ हवा में भी रेत का एक कण उसके आँखों में नहीं जा रहा… और वह सबकुछ इतना स्पष्ट देख पा रहा था जैसा वह दिन के उजाले में भी न देख पाता होगा…

रेत से एक स्त्री की आकृति उभरती है और अग्नि के दूसरे छोर पर जाकर बैठ जाती है…

कुंवर मिलन सिंह माडधरा की रियासत का अंतिम वारिस जिसे मुग़लों से अपने राज्य को बचाए रखने के लिए लगातार युद्ध करना पड़ रहा था… उनके आधुनिक हथियारों के आगे मिलन सिंह की पुरानी युद्ध शैली लगातार कमज़ोर पड़ती जा रही थी…

सेना और संपत्ति के धीरे धीरे कम होने की चिंता में माघ की इस ठाड़ में वह महल से दूर रेगिस्तान में रेत के टीले पर अकेला आग के पास बैठा मनन कर रहा था…

अपनी जन्मभूमि का वह अंतिम वारिस है, सात सौ से अधिक वर्षों तक उसके वंश ने यहाँ राज किया है… बस उसे बचाए रखना ही उसका अंतिम उद्देश्य है… परन्तु आसपास की सारी रियासतों का मुग़लों के साथ सन्धि कर लेना उसके लिए चिंता का विषय हुआ जा रहा था कि वह कब तक अकेला अपने राज्य को बचाए रख सकेगा…

राजपुताना घराने का वह स्वाभिमानी राजकुमार जान दे देगा लेकिन कभी किसी के सामने झुकने को तैयार नहीं… अग्नि के पास बैठकर वह एकटक बस उसे निहार रहा है…

कल युद्ध का अंतिम दिन है और मैं जानता हूँ मेरी हार निश्चित है… उनका सेना बल ही अधिक नहीं, बल्कि आक्रमणों से हार चुकी मेरी सेना का आत्मबल भी अब तो रसातल में धंस चुका है… हे अग्निस्वरूपा कोई तो राह दिखाओ… कहता हुआ मिलन सिंह अपना सर उस अग्नि के आगे झुका लेता है…

किसी के सामने न झुकने वाला आज तुम्हारा पुत्र तुम्हारे चरणों में झुककर प्रार्थना करता है… या तो मार्ग दिखाओ या मुझे अपनी शरण में ले लो…

न जाने कौन सी बयार थी जो आंधी का रूप लेकर आई और रेत का एक गुबार उठकर अग्नि के चारों तरफ घूमने लगा… रेत से एक स्त्री की आकृति उभरती है और अग्नि के दूसरे छोर पर जाकर बैठ जाती है…

आप कौन हैं देवी?

प्रतीक्षा…. चिर प्रतीक्षा में रत तापसी…

क्या आपको परमेश्वरी ने मेरी सहायता के लिए भेजा है?

हाँ, परन्तु सहायता वह नहीं, जो तुम मांग रहे हो, सहायता जो माडधरा के भविष्य के लिए आवश्यक है… और तुम्हारी भक्ति और शक्ति के कारण माडधरा, जैसलमेर बनने से रुका हुआ है…

संसार वही नहीं जो दिखाई देता है… कभी-कभी सुखद भविष्य के लिए वर्तमान में दुःख सहन करना होता है…

आप आदेश करें देवी मुझे क्या करना होगा?

अपना राज्य मुग़लों को सौंपना होगा, क्योंकि तुम्हारी अधूरी लड़ाई तुम्हें ही पूरी करनी है परन्तु अभी नहीं, कुछ सौ वर्षों बाद तुम्हारे दोबारा जन्म की तारीख निश्चित कर दी गयी है, परन्तु कम से कम उतने वर्षों तक यह ज़मीन मुग़लों और उसके बाद अंग्रेज़ों के हाथ जाएगी…

कुछ सौ वर्ष?? तब तक तो मेरे माडधरा को यह लोग उजाड़कर रख देंगे…

नहीं मिलन, हर स्थान की अपनी चेतना होती है, हर व्यक्ति की तरह स्थान की अपनी यात्रा होती है… उस धरती के टुकड़े की अपनी जन्म कुण्डली होती है, उसकी भौगोलिक स्थिति के अनुसार उस पर नक्षत्रों के प्रभाव भी होते हैं… अभी तो उस पर बहुत कुछ होना बचा है… परन्तु यह धरती का टुकड़ा, इस राष्ट्र के जिगर का टुकड़ा भी है… यहाँ बहुत लोग आएँगे जाएंगे परन्तु यह अपनी चेतना को कभी दूषित नहीं होने देगा, उसकी उन्नति और समृद्धि निश्चित है, जहाँ एक ओर वह अपनी परम्पराओं को संभाले रखेगा दूसरी तरफ नए शिल्प कौशल से वह और सुन्दर तरीके से निखर कर आएगा.. यहाँ का संगीत और कला पूरे राष्ट्र के लिए धरोहर बनेगी…

परन्तु उसके लिए तुम्हें हटना होगा और प्रतीक्षा करना होगी अपने दूसरे जन्म की…

मैं हट जाऊंगा, अपने माडधरा के भविष्य के लिए मैं हटूंगा…

परन्तु आप कौन हैं यह तो बताते जाइए… क्या सच में आपको परमपरमेश्वरी भेजा है मेरे पास?

मैं वह प्रतीक्षा हूँ जो तुम्हें अपने दोबारा जन्म लेने तक मिलेगी… मैं वह समय हूँ जिसके पास तुम्हें कुछ सौ वर्ष तक रहना है और अपनी चेतना को उन नए आयामों तक पहुँचाना है जब जैसलमेर की धरती फिर किसी को सौंपना नहीं पड़ेगी… वहां रहने वाला हर व्यक्ति इस धरती का राजा होगा… उसका स्वामी होगा…

मैं वह अनुकूलता हूँ जो तुम्हारे जन्म लेने तक की सारी प्रतिकूल परिस्थतियों का अंत करेगी, नए जन्म के प्रकाश से पहले राह में आए अन्धकार को मिटाएगी, मैं वह नि:स्वार्थ प्रेम हूँ जो तुम्हे नए जन्म पर उपहार स्वरूप मिलेगा परन्तु उसे नए जन्म के किसी सामाजिक सम्बन्ध के नाम के साथ मत जोड़ना… क्योंकि मैं वह प्रेम हूँ जो तुम्हें मृत्यु और नए जन्म के बीच प्राप्त होगा प्रतीक्षा स्वरूप और यह काल, समय और स्थान से परे होता है इसलिए यहाँ संबंधों के नियम लागू नहीं होते… यह प्रेम मात्र सेवा और समर्पण से ही समृद्ध होता है…

मिलन को अचानक अग्नि की एक लपट ऊंची उठती दिखाई देती है… और झुककर उसकी नाभि को स्पर्श करती है… मिलन को लगता है जैसे उसके अन्दर का सारा दुःख, सारी पीड़ा, सारा कष्ट किसी ने हर लिया है… अंतिम श्वास लेने से पहले उसके मुंह से सहसा निकलता है –

अन आनुकूल्य विरत सकल कलि कालुष्य हारक निर्दुष्ट राग समन्वित अनुहरि उपसेव्यक…

कहाँ खो गए मिलन??

कुछ नहीं माँ पुरानी स्मृतियाँ जागृत हो आई थीं…

तुम्हें बहुत कष्ट देती हूँ ना… क्षमा करना उस कष्ट के लिए…

नहीं ऐसे न कहो… आपने तो मेरी प्रतीक्षा की स्मृति को इस मिलन तक पहुँचाया है…

जाओ अब जैसलमेर की प्रतीक्षा को मिलन में बदलना है….

और आप ?

मैं? मैं तो लोगों के जीवन में प्रतीक्षा रूपी कष्ट बनकर आती हूँ और जब जाती हूँ तो सारे कष्ट हर ले जाती हूँ…. अब मेरा जाने का समय आ गया है… कहीं कोई और प्रतीक्षा कर रहा होगा, उसे भी तो मिलन तक पहुँचाना है…

जी अम्मा…

पता है ना यह संबोधन मुझे बहुत प्रिय है…

हाँ बछड़ा माँ नहीं बोलता, अम्मा ही बोलता है ना…

– माँ जीवन शैफाली

अँगरेज़ की कहानी : जादूगरनी

Facebook Comments

Leave comment

Your email address will not be published. Required fields are marked with *.

error: Content is protected !!