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दिल चाहता है : प्रेम कथा भक्ति और ज्ञान की

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परमात्मा के जन्म की कोई कहानी यदि होती तो परमात्मा के जन्म के साथ जुड़ी होती परमात्मा के प्रति आस्था और भक्ति. चूंकि परमात्मा सनातन है… इसलिए उसके साथ भक्ति भी सनातन हुई.

हाँ ज्ञान ने अवश्य मनुष्य के जन्म के साथ सृष्टि में प्रवेश पाया, चाहे वो अमैथुनीय सृष्टि के जन्म की बात ही क्यों न हो. और मनुष्य के विकास के साथ उसकी बुद्धि के कपाट भी खुलते गए.

हालांकि ज्ञान इस बात को भी अपने तर्कों के आधार पर नकार सकता है जैसे आज तक नकारता आया है. लेकिन सत्य यही है कि भक्ति की उम्र ज्ञान से हमेशा से बड़ी रही है और रहेगी भी.

तो हमारी इस कहानी के नायक का नाम है “ज्ञान” है और नायिका का “भक्ति”. इसलिए भक्ति उम्र में ज्ञान से बड़ी है. अब जब बुद्धि का उम्र से कोई लेना देना नहीं इसलिए ज्ञान हमेशा से खुद को भक्ति से अधिक ज्ञानी समझता है. और उसका सोचना गलत भी नहीं, ज्ञान का जन्म ही जैसे किताबों के बीच हुआ था… किताबों ने पाला पोसा… जीवन में जब जब भटकाव आया इन किताबों ने ही थामा…

किताबों में लिखे शब्दों की भक्ति से कोई दुश्मनी नहीं… बल्कि खुद भी उसी की नाव पर सवार है… लेकिन जब जब मौन का समुन्दर उसे अपने आगोश में लेने को बेकरार रहता है वो अपनी पतवार छोड़ देती है… फिर उसे ना शब्दों की नाव बांधकर रख सकती है ना अर्थों वाले किनारे…

ज्ञान उसी किनारे पर खड़े खड़े भक्ति को निहारा करता… उसे लहरों के साथ खेलते, गहराइयों में डूबते देखना उसका पसंदीदा शगल था… लेकिन उसकी बुद्धि उसे समंदर में डूबने से हमेशा रोका करती. उसके लिए जीने के लिए समंदर के बाहर की हवा ज़रूरी है… लेकिन भक्ति के लिए प्रकृति के हर रूप को अंगीकार करना, समय के हर पल को पूरा पूरा जीना ही सच्चा जीवन है….

हर कहानी की तरह जब दोनों की पहली मुलाक़ात होती है तो भक्ति को ज्ञान से प्रेम हो जाता है… पहली नज़र वाला प्रेम… Love at first sight… होता है ना? ये नज़रें जैसे जन्मों पुराना चेहरा पहचान लेती है… बस नज़रों को भी इसकी खबर नहीं होती…

भक्ति ने वो चेहरा पहचान लिया था लेकिन उसे याद नहीं आ रहा था किस जन्म की अधूरी कहानी को पूरा करने ज्ञान ने उसके जीवन में प्रवेश किया है… लेकिन ज्ञान प्रेम को भी दिल से नहीं बुद्धि से देखता है. उसके हृदय से उठती तरंगे भी उसके मस्तिष्क से होकर गुज़रती और प्रेम की एक सामाजिक परिभाषा के साथ वह भक्ति के सामने खड़ा हो जाता…

भक्ति हमेशा की तरह प्रेम की परिभाषा से शब्दों को ऐसे उतार देती जैसे कोई आत्मा से देह के कपड़े उतारकर नग्न खड़ा हो जाए…

लेकिन मोक्ष जानता है जब जब ज्ञान अपने पूर्णत्व को प्राप्त होने की कगार पर होगा… उस पहाड़ी की चोटी से धक्का देने के लिए उसे किसी की ज़रूरत पड़ेगी जहां उसे यह बताया जाएगा कि अहंकार का पहाड़ तब तक ही खड़ा है जब तक समर्पण की गहराई का अस्तित्व है…

ऐसे ही किसी पहाड़ की चोटी पर दोनों की मुलाक़ात होती है… ज्ञान के टीले पर भक्ति का खाई की गहराई की बातें करना…. ज्ञान को गंवारा नहीं….

भक्ति कहती रही – अध्यात्म के जिस जादू को आप खोज रहे हैं, उसे आप कहीं पढ़ नहीं सकते, देख नहीं सकते, सुन नहीं सकते, उसे तो केवल अनुभव किया जा सकता है… शब्दों में उसे वर्णित करना भी उसके साथ अन्याय होता है… किताबों में दर्ज ज्ञान व्यर्थ नहीं, लेकिन वो सिर्फ एक दिशा मापक है जो आपको उस ओर इंगित करता है जहां आपको जाना है, चलना तो खुद ही पड़ेगा, यात्रा का आनंद तभी ले सकोगे जब यात्रा पर निकलोगे, केवल किताबों में किसी स्थान के सुन्दर चित्र को देखने को आप यात्रा नहीं कह सकते…

ज्ञान का मानना है या यूं कहें कि अपनी जिद है कि, सृष्टि में जो कुछ है सबको हमारे ऋषि मुनियों ने शब्दों में वर्णित किया है, जिसे पढ़कर कोई भी ज्ञान प्राप्त कर सकता है.

और भक्ति उसे समझाती रही – बहुत सी बातें हैं जो वास्तव में इतनी रहस्यपूर्ण हैं, कि शब्दों में नहीं उतर सकती बल्कि कुछ विशेष तरंगों को शब्द देना उन तरंगों को विकृत कर सकता है…

और वैसे भी जो कुछ भी लिखा गया है हमारे धर्म ग्रंथों में, उनका मूल अर्थ कितने लोग समझ पाए? हर एक ने अपनी अपनी व्याख्या की और अर्थ खोते चले गए… लेकिन मूल अर्थ उन किताबों के मोहताज नहीं, वो हमारी गुरु शिष्य परम्परा के कारण आज भी सुरक्षित है और गुरु से शिष्य में स्थान्तरित होते रहते हैं, जैसे गुरु होने की पात्रता हर किसी को प्राप्त नहीं, वैसे ही शिष्य होने की पात्रता भी.

शब्दों के पार की दुनिया देखना है तो कूद जाओ उस समन्दर में जहां आपका अस्तित्व मात्र एक बूँद जितना है, समंदर बनना है तो बूँद में विस्फोट आवश्यक है…

 

ज्ञान कहता- नहीं, डूबकर नहीं तैर कर जाना है.. केवल समर्पण ही मार्ग होता तो ज्ञान और ध्यान के रास्ते की व्याख्या नहीं की गयी होती किताबों में.

भक्ति ने मुस्कुराकर कहा – चलो मैं हारी आप जीते, प्रेम में हारने में जो आनंद है वो आप क्या जानो. लेकिन बस इतना बताते जाओ… आज इस समय हम एक पहाड़ी पर खड़े हैं और फिर कुछ देर में फिर अपनी अपनी यात्रा पर निकल जाएंगे… बताइए हमारे इस मिलन को आप अपने शब्दों में कैसे परिभाषित करेंगे?

ज्ञान ने कहा – नहीं ये “मिलन” नहीं “मुलाक़ात” है… इसके बाद इस जन्म में ना भी मिल सके तो अगले जन्म में मिलने की संभावना बनी रहेगी…

भक्ति ने मुस्कुराकर कहा – हाँ कदाचित आपकी यात्रा अभी एक जन्म और जारी रहेगी क्योंकि आप इस मुलाक़ात को मिलन में परिवर्तित करने की आकांक्षा लिए आगे बढ़ेंगे.

लेकिन मेरे लिए यह मिलन की अंतिम घड़ी है… क्योंकि किसी विशेष स्थान पर विशेष समय में दो चेतनाओं का मिलना उन तरंगों को उत्पन्न करता है जिसे हम शिव और शक्ति का मिलना कहते हैं, और उस समय ऊर्जा का वह वर्तुल पूरा होता है जहां कोई ब्रह्माण्डीय घटना घटित होती है और आत्मा और परमात्मा में कोई भेद नहीं रह जाता. और इस घटना के लिए ये कतई आवश्यक नहीं कि ये आत्मिक मिलन दैहिक भी हो ही, केवल उन चेतनाओं को उस समय सृष्टि की छत के नीचे प्रेमपूर्ण हो जाना ही काफी होता है.

भक्ति के प्रेम और समर्पण के साथ ज्ञान आगे नहीं बढ़ सका… ज्ञान उस टीले पर खड़े होकर भक्ति को देखता रहा जो उसकी आँखों के सामने मोक्ष का हाथ थामे आसमान की ओर बढ़ रही थी और धीरे धीरे एक प्रकाश पुंज में परिवर्तित हो रही थी. रात भर ज्ञान वहीं खड़ा रहा…. और देखता रहा जहाँ पर वो प्रकाश पुंज जाकर आकाश में विलीन हो गया था… वहां से एक नया सूर्य उदय हो रहा है.

– माँ जीवन शैफाली

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