मेकिंग इंडिया साप्ताहिकी

जीवन के सप्त रंग, मेकिंग इंडिया के संग
जीवन है मेरा चुनाव, आपका चुनाव चिह्न क्या है?

कभी कभी उन सारे क्रिया कलापों से छुट्टी लेकर देखिये जिनमें लगातार आपकी उपस्थिति दर्ज होती है. जैसे मैं कभी कभी सोशल मीडिया या मेकिंग इंडिया साप्ताहिकी के लेखों से गायब रहने का प्रयास करती हूँ, क्योंकि मुझे कभी कभी लगता है मुझे लगातार झेलना ज़रा मुश्किल है, इसलिए एक ब्रेक ज़रूरी होता है. मैं किसी के लिए उबाऊ हो जाऊं मुझे मंज़ूर नहीं. क्योंकि कभी कभी मैं खुद के लिए भी बड़ी उबाऊ हो जाती हूँ.. मैं खुद को भी लगातार नहीं झेल सकती.

ऐसे में मैं मंच से गायब हो जाती हूँ, नैपथ्य में आ जाती हूँ… लेकिन छुप के रहना मुझे बेचैन कर जाता है, कभी कभी उदास भी… क्योंकि मैं बहुत अच्छी अदाकारा हूँ… जीवन की हर घटना में अपना सर्वोत्तम अभिनय देने का प्रयास करती हूँ… ऐसे में परदे के पीछे चले जाना एक अभिनेता या अभिनेत्री के लिए ज़रा मुश्किल काम होता है…

ऐसे में कभी कभी उदासी को भी झेलना पड़ता है, लेकिन उदासी का अपना आनंद है. खुशियाँ तो फुलझड़ियां होती हैं झट चमकी फट बुझ गयी…. उदासी अगरबत्ती की तरह धीमे धीमे जलती है और बुझने के बाद भी कमरे में देर तक अपनी सुगंध बनाए रखती है. और फिर वैसे भी उदासी मेरा स्वभाव नहीं… इसे बहुत लम्बे समय तक नहीं खींच सकती… अन्दर बहता प्रसन्नता का झरना रोके रखना मेरे लिए बहुत मुश्किल है… लेकिन रुके हुए झरने के एकदम से फूट पड़ने से पानी की आणविक संरचना में भी परिवर्तन हो जाता है.. पानी अधिक मीठा और रेशमी हो जाता है…

मेरी चेतना का स्वभाव झरने के पानी सा है तो देह का ताम्बाई, बस समय समय पर इस ताम्बे के घड़े को नीबू इमली में नमक मिलाकर मांजना पड़ता है, तो ये फिर से चमचमाने लगता है…

नीबू इमली की खटाई-से खट्टे अनुभव और घावों के लिए दूसरों के द्वारा छिड़के गए नमक का सदुपयोग कीजिये, इसे अपने ताम्बाई देह पर मलिए और इसको फिर से चमकाकर नया कर दीजिये… और इसमें भरिये अपने प्रेम और आनंद का मीठा पानी, ताकि ये औषधियुक्त हो जाए और अपने ही नहीं दूसरों के जीवन में भी स्वास्थ्य लाए…

ये बातें सिर्फ दार्शनिक नहीं वैज्ञानिक भी है… इस तरह के प्रयोग करते रहना चाहिए… इससे आपके हारमोंस में भी बदलाव आता है. कुछ नई रासायनिक क्रियाएं होती हैं, कुछ पुराने घटक टूटते हैं, कुछ नए अधिक ऊर्जायुक्त घटक बनते हैं… बाकी जीवन में जो भी घटनाएं (अच्छी-बुरी आप तय कर लें), उस उत्प्रेरक (कैटेलिस्ट) की तरह होती हैं जो रासायनिक क्रियाओं में भाग लेते हुए भी अंत में खुद को अपरिवर्तित निकाल लाती हैं….

अब चुनाव आपका है आपको क्या बनना है, रासायनिक क्रिया, या उस क्रिया में टूटने वाले या बनने वाले घटक, या उत्प्रेरक…

सद्गुरु एक बहुत सुन्दर कहानी सुना रहे हैं… शेर और लोमड़ी और जंगल में ध्यान में बैठे योगी की… योगी ध्यान के लिए बैठा है सामने एक अपंग लोमड़ी दिख रही है जिसकी आगे की दोनों टाँगे कटी है लेकिन फिर भी लोमड़ी हृष्ट-पुष्ट है.

योगी सोच ही रहा है कि इसे खुद का खाना तक जुटाने में कितनी दिक्कत होती होगी फिर ये इतनी तंदरुस्त कैसे… तभी वहां एक शेर आता है और उसके सामने मांस का एक टुकड़ा रख देता है..

योगी को लगता है जैसे उसे भगवान् ने कोई दिव्य सन्देश दिया है कि इस संसार में किसी के साथ अन्याय नहीं हो सकता… तो वो भी ध्यान में बैठ जाता है ये सोचकर कि मेरे लिए भी ईश्वर भोजन की व्यवस्था कर ही देंगे… एक हफ्ता बीत जाता है लेकिन उसके पास उस दयालु शेर की तरह कोई भोजन लेकर नहीं आता…

उसकी हालत बहुत बिगड़ जाती है तब वहां से एक संत निकलते हैं, योगी की ऐसी हालत देखकर उससे पूछते है उसे क्या हुआ है… वो शेर और लोमड़ी का किस्सा सुनाते हुए बताता है कि मुझे पूरा विश्वास था कि मेरे लिए भी ईश्वर ने उस दयालु शेर और लोमड़ी का उदाहरण देकर कोई दिव्य सन्देश प्रस्तुत किया है…

संत कहते हैं कि यकीनन जीवन में घटने वाली हर घटना ईश्वर की तरफ से एक दिव्य सन्देश ही है लेकिन एक बात बताओ, तुमने दयालु शेर के बजाय असमर्थ और लाचार लोमड़ी होना ही क्यों चुना?

शेर और लोमड़ी के माध्यम से उस योगी को जैसे ईश्वर के किसी दिव्य सन्देश का आभास हुआ वैसे ही मुझे हर एक घटना में ईश्वर की तरफ से दिव्य संदेशों का आभास होता रहता है… इस हद तक कि आप मुझे अन्धविश्वासी भी कह सकते हैं, लेकिन मेरा यह अंधविश्वास मुझे दिन प्रति दिन जागरूक ही कर रहा हो तो मैं उसे हमेशा बनाए रखना चाहूंगी…

जैसे सद्गुरु की इस कहानी के माध्यम से मुझे अपने चुनाव को और अधिक परिष्कृत करने का दिव्य सन्देश मिला..

जीवन में तकरीबन रोज़ ही ऐसी घटनाएं होती रहती है जब आपको दो में से किसी एक का चुनाव करना होता है… आपका चुनाव ही आपको आगे की राह दिखाता है…

आप यदि जीवन पथ पर चल रहे हैं तो आपका चुनाव चिह्न आपकी जीजिविषा होगी, साधना पथ पर ध्यान, भक्ति पथ पर समर्पण, अध्ययन में ज्ञान, कला में आपकी रचनाशीलता…

आप भी अपना एक चुनाव चिह्न तय कर लें, जब भी खुद को दोराहे पर खड़ा पाएं अपने चुनाव चिह्न का ठप्पा उस पर लगाकर आगे बढ़ जाइए, यकीन मानिए कभी आपको पीछे मुड़कर नहीं देखना पड़ेगा… और हो सकता है आपको देखकर औरों को भी प्रेरणा मिले और वो आपकी पार्टी में शामिल हो जाए.

– माँ जीवन शैफाली

तदबीर से बिगड़ी हुई तकदीर बना ले, अपने पे भरोसा है तो एक दांव लगा ले

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