मेकिंग इंडिया साप्ताहिकी

जीवन के सप्त रंग, मेकिंग इंडिया के संग
काली

कुंठा, पीड़ा, तड़प, अकुलाहट और प्रतीक्षा की लम्बी यात्रा के बाद जब आपका पूरा अस्तित्व ही प्रश्न में परिवर्तित हो जाये तब जाकर उत्तर प्रकट होता है. प्रश्न सिर्फ एक ही होता है अमूमन सबका … आखिर मेरे साथ ही क्यों?

उत्तर काली के इस चित्र के साथ प्रकट हुआ, माध्यम हमेशा की तरह ध्यान बाबा रहे… उन्होंने अपनी जादुई आवाज़ में नीचे अंग्रेज़ी में जो लिखा है वो पढ़कर सुनाया, लगा जैसे मुझे मेरे अंतिम प्रश्न का उत्तर मिल गया… माया यामा में बदलती हुई… राधा की आँखों से धारा बनकर बह गयी…

ध्यान बाबा ने भी यही कहा… जैसे माया में उलझी थी उसका उल्टा-उल्टा करती चलो, दोबारा वहीं पहुँच जाओगी जहाँ से यात्रा शुरू की थी… मैंने उल्टी यात्रा शुरू कर दी है, कदम पीछे की ओर है लेकिन चेहरा सामने… जानती हूँ जब प्रारम्भ बिन्दु पर दोबारा लौटूंगी मैं वही नहीं होऊंगी जो पहले थी… ये एक बार फिर जीवन का नया जन्म होगा…

लेकिन इस जन्म के लिए हर बार उतनी ही प्रसव पीड़ा से गुज़रना होता है… मैं प्रतीक्षा में हूँ अपने ही जन्म की, देखना चाहती हूँ अपने नए शिशुवत रूप को जो पहले से अधिक निर्मल और निश्छल होगा….

“What’s the difference in approach of Kali and other forms of the Goddess?” was the question.

Imagine the stay of a child in the womb of its Mother for Nine whole months, one of bliss and comfort. Now go to the Delivery room, where the Mother is writing in pain, unable to bear the presence of the child within and complications arise.

Now say Kali steps in, rips apart the womb of the Mother, to bring forth the child into the world. Was it an act of cruelty or love? You decide.

You may choose to call it an act of violence, because of it’s goriness and blood, but I call it an act of Supreme Compassion, helping the Mother and Child to live. Also that one act of “compassionate barbarianism” breaks the bubble in which the child was living and introduces it to the real world.

Ah! It’s Kali who has the power to break the bubble of Maya, if you are ready and ripe and in Her “Anger” and “Violence” lies Selfless and Supreme Compassion.

– Srinatha Raghavan

 

सोचा था इसका हिन्दी में अनुवाद करके प्रस्तुत करूंगी, लेकिन अनुवाद में वो शब्द ऊर्जा न आ सकी जो मुझ तक उत्तर बनकर पहुँची थी… कुछ तरंगों को शब्द रूप देने से वो विकृत हो जाती है… इसलिए खुद को माध्यम बनाकर तरंगों को आप तक पहुंचा रही हूँ. इसे विस्तृत भी नहीं कर रही बस जो बात जिस रूप में है उसे उतने ही रूप के साथ अंगीकार करना होती है. विस्तार देने से तर्क अपना फन उठाने लगता है. और कुछ बातों को समझने के लिए अज्ञानी होना अनिवार्य है.

– माँ जीवन शैफाली

 

काली – एक भयंकर स्त्री : सद्गुरु

काली एक उग्र रूप हैं. आपको इस तरह की महिला को संभालने के लिए अलग तरह का कौशल चाहिए. दूसरे रूपों की तुलना में, इन तक पहुँचना आसान है, लेकिन साथ ही, वे बहुत तेज तर्रार हैं. अगर आप किसी उग्र रूप को बुलाने के बाद, उसे संभालना नहीं जानते, तो वह आपको मिटा भी सकता है. कुछ और रूप इनसे भी ज्यादा भयंकर और उग्र हैं. योगियों ने ये भयंकर रूप इसलिए बनाए क्योंकि वे खुद इसी स्वभाव के थे और वे किसी सौम्य स्त्री के साथ नहीं रह सकते थे. उन्हें कोई ऐसा चाहिए था जो तेज-तर्रार व उग्र हो.

 

ये रूप एक खास तरह की प्रक्रियाओं को रिस्पांड करते हैं, जो उस तरह की ऊर्जा को अपनी ओर खींचते हैं. काली कोई एक मूर्ति नहीं जिस पर आप विश्वास कर सकें. वे आपके लिए एक जीती-जागती हकीकत बन सकती हैं. वे आपके सामने प्रकट हो सकती हैं क्योंकि जब एक बार ऊर्जा शरीर बन जाता है तो उसके साथ ही आप चाहें तो एक भौतिक देह भी रच सकते हैं.

उदाहरण के लिए, ध्यानलिंग सबसे ऊंचे स्तर का ऊर्जा शरीर है. वैसे तो इसके लिए भौतिक शरीर भी बनाया जा सकता है, लेकिन इसमें बहुत मेहनत करनी होगी और वह भी किसी काम की नहीं होगी. एक और इंसान बनाने का क्या तुक है?

अभी आप मुझे मेरे असली रूप में अनुभव इसलिए नहीं कर पा रहे क्योंकि मैं भौतिक शरीर में हूँ. मैं आपकी तरह बोलता हूं, सारे काम करता हूँ. अगर मैं किसी और रूप में होता, तो लोगों के लिए थोड़ी आसानी होती. जब आप किसी इंसान को देखते हैं तो उसे अपने तार्किक ढांचे में फिट करने की कोशिश करते हैं. अगर वह फिट न आए तो आप उसे आत्मज्ञानी नहीं मानते. आपको लगेगा कि वह पागल है. तो ऐसा भौतिक शरीर बनाने का कोई फायदा नहीं है.

She is the Beauty,
She is the Ugliness as well.

She is the Divinity,
She is the Mundane as well.

She is the Love,
She is the Hate as well.

She is the Truth,
She is the Falsity as well.

She is the Savior,
She is the Destroyer as well.

She is what you can think She is,
She is what you can’t never as well.

She is beyond all opposites,
Yet She is both as well.

She IS,
What you and I aspire to be – Eternally Free!

– Srinatha Raghavan

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