Menu

प्रेम में सेक्स की भूमिका – 2 : Sex Taboo

0 Comments


शारीरिक अभिव्यक्ति व्यक्ति के व्यक्तित्व की परिचायक होती हैं। हम जैसे भाव रखते हैं, शरीर वैसी ही अभिव्यक्ति करता हैं। नवरस की अभिव्यक्ति का शरीर प्रकृति प्रदत एक सशक्त माध्यम है।

प्रेम भी एक भाव है, जो माता-पिता, संतान, भाई-बहन, पति/पत्नी, प्रेमी/प्रेमिका दोस्त आदि आदि रिश्तों में विभिन्न शारीरिक क्रियाओं द्वारा व्यक्त करना अत्यावश्यक है, या यह कहें कि सहज भाव से प्रकट होता है।

अब अगर बात प्रेम में सेक्स की करें, तो अगर प्रेम गहन है, सेक्स इसकी शारीरिक अभिव्यक्ति है, इसको पूर्ण करता है, जो कि बिलकुल प्राकृतिक है। माँ और संतान का सम्बन्ध भी इसका उदहारण है, सामान्तया संतान माँ से ज्यादा जुड़ी होती है, पिता की तुलना में, क्योंकि वहां भी भाव पूर्णता का ही है तो जहाँ प्रेम है, तो शारीरिक भाव उसकी अभिव्यक्ति का साधन है।

सो जहाँ भी भावनात्मक सम्बन्ध होंगे, वहां शारीरिक अभिव्यक्ति किसी न किसी रूप में आना प्राकृतिक है, इसको सहज भाव से स्वीकार करना चाहिए।

पश्चिम संस्कृति में सेक्स प्राथमिक हो गया, प्रेमी-प्रेमिका संबंधों में, भावना पीछे रह गयी, अतः सम्बन्ध भी अस्थायी हो गये। प्रेम की तीव्रता की अभिव्यक्ति सेक्स से हैं, तो स्वाभाविक है, पर अगर सेक्स ही लक्ष्य हो, तो प्रेम कहाँ रहा। पश्चिम में यही हो रहा है ज़्यादातर।

संतुलन तो मेरे विचार से यही है कि सेक्स को टैबू न बनाया जाये, इसको सहज रूप से स्वीकार करना चाहिए (What you resist that persist), अगर हम बहुत ज़्यादा प्रतिरोध करते हैं, तो बहुत सारी विकृतियाँ जन्म लेती हैं, (ले भी रहीं हैं)।

हाँ, सेक्स को प्राथमिकता के आधार पर लेना अनैतिकता है। समर्पण पूर्ण होना चाहिए …..अपूर्ण समर्पण भटकाव देता है। अपूर्ण जीवन और मृत्यु तुल्य कष्ट, बड़ी ही भयावह और दुखदायी स्थिति होती है।

बात प्रेम में शरीर की अभिव्यक्ति और निजता से शरू हुई थी। इसको थोड़ा और व्यापक किया जाये, तो परिवार और समाज आता है। भारतीय समाज 200 साल ब्रिटिश, और उसके पहले करीब 700 साल मुगलों के अधीन रहा। करीब 900 साल की असुरक्षा की भावना ने सामाजिक और पारिवारिक मूल्यों में बहुत परिवर्तन कर दिया।

हज़ारों साल पहले त्रेता में स्वयंवर की प्रथा थी, मतलब निजता का प्रभाव अधिक था। पर त्रेता भी सामजिक और पारिवारिक रिश्तों द्वारा निजता हनन से न बच सका। द्वापर के महानायक कृष्ण ने तो, निजता का भरपूर समर्थन किया। महाभारत ही करवा दिया, क्योंकि सामाजिक और पारिवारिक मूल्यों ने निजता के मूल्यों का हनन शुरू कर दिया था।

महाभारत से पहले धृतराष्ट्र, पांडू और विदुर सभी ‘नियोग’ से उत्पन्न व्यास पुत्र थे। मतलब उस समय के युग में भी सेक्स टैबू नहीं था, सामाजिक और पारिवारिक आवश्यकता को ध्यान में रख कर छूट प्रदान थी।

900 साल की गुलामी ने सेक्स को टैबू बना दिया। वर्तमान में इसको ऊपर से जितना ज़्यादा वर्जित किया गया, परोक्ष रूप से यह आज भी बहुत से व्यक्तियों का लक्ष्य बन गया, विकृति जैसा। प्रेम से भटक गया है। सोने में सुहागा तो यह हैं कि कुछ स्त्रियों ने भी इस लक्ष्य को अपने भौतिक स्वार्थों की पूर्ति का साधन बना लिया। ‘Me Too‘ बिना ‘You Too’ के नहीं हो सकता।

अंततः प्रेम में सेक्स अंतरंगता, आनंद और पूर्णता के लिए अत्यावश्यक है, पर सिर्फ सेक्स को लक्ष्य करके सम्बन्ध बनाना चारित्रिक हनन है। अपने इतिहास ने कभी भी प्रेम में सेक्स का विरोध नहीं किया, पर हाँ सिर्फ सेक्स ने हमेशा विकृतियों को ही जन्म दिया है, महाभारत काल से वर्तमान तक!

प्रेम डूब कर करे, सेक्स भी करिए, कोई पाप नहीं, हमारे परम आदरणीय सद्गुरु और ओशो ने यही कहा। इसको सहज भाव से स्वीकार करिए, कोई बात नहीं, जितना प्रतिरोध करेंगे, या जितना ज्यादा लक्ष्य बनाएँगे, उतनी ही विकृति आएगी।

आनंद से रहना चाहिए, आनंद बांटना चाहिए, अपने जीवन की दिशा और दशा के लिए हर व्यक्ति निजी तौर पर ज़िम्मेदार है, परिवार और समाज या तो साथ देंगे, या विरोध करेंगे, संतुलन बन जाये तो बहुत अच्छी बात है, न बने तो अपनी निजता का हनन करना, पचता नहीं!

– अनिल कुमार निगम

#AskAmma : प्रेम में देह की भूमिका और SEX की कामना

Facebook Comments
Tags: , , ,

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!