मेकिंग इंडिया साप्ताहिकी

जीवन के सप्त रंग, मेकिंग इंडिया के संग
बचिए एनर्जी वैम्पा़यर्स से : क्योंकि खाली दिमाग़ शैतान का घर

ईश्वर की एक बहुत असीम अनुकंपा है हम मनुष्यों पर कि उन्होंने हमें इतना ज़्यादा सक्षम दिमाग बख्शा.

बिल्कुल धरती पर उतरी पहली गंगधार की तरह, पवित्र और एक कोरे कागज़ की तरह धवल.

यह हम पर निर्भर होता है कि हम इस कागज़ पर किस तरीके की भावनात्मक स्याही का इस्तेमाल करते हैं.

अब स्याही का रंग भगवा हो या हरा, कम्युनल हो या दक्षिणपंथी, ज्ञान विज्ञान हो या साहित्य, जो चीज सबसे ज़्यादा महत्व रखती है, वह होती है अनवरत लेखन.

किसी एक दिशा में अदिश सोचों को ले कर जाना, और उस नई सोच की ऊर्जा से एक नई नवेली चीज़ का सृजन कर पाना ही हमारे जीवन को एक नई उमंग की तरफ अग्रसर करता है.

क्या हो कि कभी दिमाग कोरा छूटने लगे?

सारे के सारे ख्याल बिल्कुल उसी तरीके की आज़ादी को प्राप्त हों जैसी आज़ादी के लिए अक्सर हमारे JNU के छात्र आए दिन नारेबाज़ी करते रहते हैं?

क्या हो अगर कोई काम ही न बचे करने को?

क्या सचमुच उस वक्त हम “कुछ नहीं कर रहे होंगे?”

उत्तर होगा – नहीं! मृत्यु के पहले कोई भी ऐसा लम्हा नहीं मिलेगा जिसमें हम कुछ सोच न रहे हों. स्थूल शरीर के निकम्मा बैठ जाने से सूक्ष्म शरीर बिजली की गति से हमारे सोच के समंदर को मथने लगता है.

अब अगर समंदर मथा जाए तो इतना तो पता है कि सबसे पहला परिणाम हलाहल होगा. ठीक वैसे ही जब हम अपने दिमाग को कुछ समय तक के लिये दिशाविहीन रख देते हैं तो जन्म होता है मानसिक एनर्जी वैम्पायर्स का. जो आपकी समस्त सकारात्मक उर्जा को इस कदर सोख लेता है जैसे रेगिस्तान पानी को.

बंगलौर की एक घटना सुननें में आई थी –

वहां के बड़े महंगे इलाके में कोई इंजिनियर दंपति रहता था, उम्र दोनों की चालीस इकत्तालीस साल की थी लगभग या यूं कहें कि जिंदगी का लगभग तज़ुर्बा भी हो चला था, और जवानी भी अभी थोड़ी सी बाक़ी थी.

कुछ वक्त तक काम करने और मोटी रकम कमा के इकट्ठा कर लेने के बाद दोनों ने सोचा कि अब आराम से अपनी दौलत उड़ाते हैं, और काम धंधा छोड़कर एक मज़े की ज़िंदगी जीते हैं.

कुछ वक्त गुज़रा! मज़े से मन भरा, पर कुछ रुपये अभी भी खर्चने बाकी रह गए थे. पर एक बदलाव आया. अब पति -पत्नी दुखी रहने लगे थे. उद्देश्य की कमी सी हो चली थी, और ये चीज़ धीरे धीरे सालने लगी थी.

अब दिमाग खाली था. अनुशासन की चहारदीवारी टूट चुकी थी और उस खालीपन के वैम्पायर को अपने नुकीले दातों से ज़िंदगी जीने की चाह को चूस लेने का मौका मिल चुका था.

हुआ भी आखिरकार वही, कुछ दिनों बाद वही दंपति अपने कमरे में आत्महत्या किये पड़े मिले!

आखिर क्या थी वो वजह जिसके चलते इनकी जान तक चली गई?

मेरे ख्याल से खालीपन!

उस खालीपन ने शायद सभी सकारात्मक उर्जाओं को सोख लिया अपने भीतर तक.

बहरहाल ये वैम्पायर तो हुआ सूक्ष्म शरीर वाला था, पर कई वैम्पायर्स हमारे ईर्द-गिर्द भी घूमते रहते हैं. हम इंसानो के भेस में ही.

हमारे साथ! जी, जो हमें हमारे एकदिश बहाव से भटका कर हमारी तन्मयता भंग कर देते हैं और अचानक से वो उन कमियों के बारे में हमें बता कर हताश कर देते हैं जो असल मायनों में ज़्यादा मायने ही नहीं रखतीं.

असल में यही वो खाली दिमाग के इंसान होते हैं, जिनका काम ही होता है सामने वाले के आत्मविश्वास की वाट लगाना.

इन दुर्भिक्ष रूपी इंसानो की तीन प्रजातियां होती हैं –

1) जिनको गिलास आधा खाली लगता है.

2) जिनको गिलास आधा खाली लगता है, और भविष्य में पूरा खाली हो जाने की संभावना नज़र आती है.

3) जिनको गिलास भी नहीं पसंद और आप गिलास खाली दे या भर के, ये उनमें भी दस हज़ार नुक्स निकाल देंगे.

जीवन में सफल होना है और खुश रहना है तो आपको पहला काम यह करना होगा कि इन नकारात्मक मानव शरीर धरे वैम्पायर्स से दूरी बनानी होगी.

बहरहाल, अनुशासन की पकड़ मजबूत हो तो ज़िंदगी की कलम कभी रूकती नहीं है. वह लिखती जाती है आत्मविश्वास और प्रेरणा की हज़ार नई कहानियां जो हमेशा एनर्जी वैम्पायर्स पर भारी पड़ती है.

सदा सकारात्मक रहिए, सदा चलायमान रहिये, क्योंकि बिना चले तलवार भी रखे -रखे कुंद हो जाती है!

याद रखिये !

एक एनर्जी वैंम्पायर है, बहुत करीब आपके रूह के, जो आलस के चंद छलावों से आपकी निरंतरता निचोड़ लेगा! उसके लंबे और पैने दांत आपकी ज़िंदगी की गर्दन में घुसने को बेताब हैं. वह बेताब है आपकी सारी सकारात्मक ऊर्जा को खींच लेने को!

अभी भी समय है!

पैरों और परों में दम भरिये, अनुशासन की जकड़ को थोड़ा और मजबूत करिये और हो जाइये पुन: चलायमान!

क्योंकि वो आप ही हैं जो इस नकारात्मक्ता रूपी “एनर्जी वैम्पायर” को धूल चटा सकते हैं!

– अनिक श्रीवास्तव

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