मेकिंग इंडिया साप्ताहिकी

जीवन के सप्त रंग, मेकिंग इंडिया के संग
व्यंग्य : विश्व पुस्तक मेले के बहाने

देवांशु तेरे कितने नाम….

मैं लगभग आश्वस्त हो चुका हूं कि लिखने वालों में से अधिकांश बहुत स्वार्थी, बेईमान और पिलपिले किस्म के भावुक हैं। इन्हें शब्दों के जाल में लोगों को फांसना आता है। इनका एकमात्र मंतव्य अपना प्रचार और लोकप्रियता हासिल करना है। खासकर, पुरुष को स्त्री का आकर्षण और स्त्री को पुरुष का उनपर लट्टू हो जाना ही प्रिय है। इस उद्देश्य के लिए ये साहित्य में कुछ भी रच सकते हैं जिनमें रत्तीभर ईमानदारी नहीं होती। लेखक कवि समुदाय से मुझे लगभग घृणा हो गई है। इन गधों को यह लगता है कि दुनिया इनकी वजह से सुंदर है। हुंह ! दुनिया सुंदर है तो कर्मयोगियों, उद्यमियों और समाज में घुसकर काम करने वालों से।

पुस्तक मेला मुझे आइडेंटिटी क्राइसिस का अड्डा लगता है। भेड़ियाधसान लोग और जबरन की वाह वाह। जिसे देखो, वही मुंह बाए वाहवाही बटोरने को खड़ा है, माइक लेकर ज्ञान दे रहा। मतलब कुछ भी बकवास। कोई भी किसी को महान लेखक घोषित किये दे रहा। हद है पाखंड और खोखलेपन की। मैं स्वयं दुटकिया लेखन करता हूं। कलमघसीट कारकुन हूं पर इस क्षेत्र में व्याप्त बदमाशी मुझे स्तब्ध करती है।

परन्तु मेरी इस टिप्पणी से वे लोग मुक्त हैं जिन्होंने वाकई श्रेष्ठ लिखा या लिख रहे। जिनके जीवन,विचार और आचार में कोई अंतर नहीं है। बाक़ी सब तो चिरकुट हैं, चाहे जितनी प्रसिद्धि पा लें और ज्ञान झाड़ लें। जय श्रीराम।

क्षमा कीजिए कवयित्री महोदया!!

तो कल पुस्तक मेले में अपनी फेसबुक मित्र की किताब खरीदने के लिए एक प्रकाशन के पास पहुंचा। पता चला पुस्तक की प्रतियां खत्म हो चुकी हैं। मैं वहां खड़े होकर दूसरी पुस्तकों को देखने लगा। पीछे गुलाब गुलाब हो रहा था। दो तीन कवयित्रियां विहंस रही थीं। जिनकी पुस्तकों के विमोचन के साथ दे गुलाब, ले गुलाब का खेल चल रहा था। संयोग यह कि उनमें से एक महादेवी की पुस्तक मेरे हाथ में थी। वे फ़ौरन गुलाब से गुम हुईं और मेरे पास आकर बोलीं, ये मेरी ही किताब है, तीन काव्य संकलन पहले आ चुके हैं!

मैं एक कदम पीछे हटा। फिर, मुस्कराकर कहा, जी आपकी ही कविताएं पढ़ रहा हूं ! लगे हाथों तपाक से यह भी कह डाला कि मैं भी लघु उद्योग के स्तर का अतुलनीय, अद्वितीय, नमनीय महाकवि हूं! अब चूंकि कवयित्री जी सामने ही थीं तो मुझे यह भी कहना पड़ा कि मैं आपकी एक पुस्तक खरीद रहा हूं।

मैंने एक पुस्तक खरीदी और उनके करकमलों से उस पर अपना नाम लिखवाने को प्रस्तुत हुआ। उन्होंने पूछा, आपका नाम? जी, देवांशु! उन्होंने लिखना शुरू किया… सप्रेम, सस्नेह दिवा….. मैंने टोका, दि नहीं दे! उन्होंने काटकर पुनः लिखा, देवाशुं!! देवांशु में उन्होंने शु के माथे पर बिंदी टांक दी।

मैं धन्य हुआ। हिन्दी भाषा धन धन्य हुई। अब सोचिए कि जिसकी ध्वनि ग्राह्यता, आधारभूत या साधारण शाब्दिक ज्ञान इतना खराब हो, जो देवांशु लिखने में लटपटा जाय, वह कविता में कैसी कला बिखेरती होगी!!

ऐसे कई कवि, कवयित्रियों के कलरव से पुस्तक मेला प्रफुल्लित रहा। विमोचन के व्यापार से प्रकाशक महोदय खुश, लेखक कवि की तो पूछिए ही मत। यानी, बसंती भी तैयार, मौसी भी तैयार! इसलिए मरना कैंसिल! मैं पुस्तक मेला से घर जा रहा हूं मौसी जी….

तो बाबूजी ने बंगाल के प्रभाव में नाम रखा देवांशु। उनका वश चलता तो बनर्जी भी जोड़ देते। एक ही औपचारिक नाम है मेरा। पुकारने का अंशु अलग से। पर, दिल्ली आकर मैं अनेक नामों से विख्यात हुआ। जैसे कि दिवांशु, दिव्यांशु, देव्यांशु। बंगालियों के लिए देबांग्शु। ईटीवी में तो एक महोदया तिग्मांशु तक पुकार बैठीं। शुक्र था कि तब तक धूलिया जी का सिनेमाई धरातल पर प्रादुर्भाव नहीं हुआ था। इन सबके बीच अक्सर लोगों ने हिमांशु, सुधांशु आदि नामों से मुझे सुशोभित किया।

यहां कई बार फोन पर पूछा जाता है, देवेन्दर जी बोल रहे हैं !! दीवान जी !! एक बार तो पत्नी ने कहीं नंबर मेरा दिया था और नाम अपना तो साहब ने उनके ही नाम से पुकार लिया, ये जी बोल रहे हैं ? सुलग गई। पर क्या करता।

पांच साल पहले रेलवे के चार्ट में काफ़ी देर तक उलझा रहा। टिकट कन्फर्म था पर नाम नहीं मिल रहा था। फिर देखा तो एक नाम लिखा था, दीवान ….. शू। दीवान जी को जूते पड़ गए थे। सिर पकड़ कर बैठ गया। जी में आया, रेल छोड़ दूं। बाबूजी से बहुत नाराज़ हुआ। मनोज सनोज अनोज टाइप का नाम रख देते तो कितना आसान हो जाता जीवन।

अब कवयित्री महोदया ने देवाशुं भी कह दिया तो वह भी स्वीकार है। क्या करूं… बूहूहूहू। ढिशुम ढिशुम ! सुबुक सुबुक …

– देवांशु झा

अदीब@मेला

दिल्ली में हर बार की भाँति पुस्तक मेला लगा, दिल्ली देश का दिल है, अवार्ड वापसी वाले लेखक बहुत परेशान हैं कि जितनी ख्याति उनको अवार्ड लौटाकर नहीं मिली थी उससे ज्यादा प्रचार-प्रसार तो इस मेले में लेखकों का हो रहा है।

एक अनुमान के तौर पर सिक्किम की आबादी के जितनी पुस्तकों का विमोचन हो चुका है और केजरीवाल के मोदीजी पर अगणित आरोपों जितनी सेल्फियां फेसबुक पर पोस्ट हो चुकी हैं। पुस्तक मेले के गेट पर पास सिस्टम बन्द है। एक हरियाणवी की बतौर पुलिस डयूटी है जो मिजाज से शायर है। मिर्ज़ा ग़ालिब गेट से बिना टिकट घुस रहे थे तो उसने टिकट और आईडी माँगी,

गालिब बोले” वो पूछते हैं हमसे कि ग़ालिब कौन हैं
कोई बतलाएगा कि हम बतलायें क्या”?
पुलिस वाला उखड़ते हुए बोला
“ताऊ तुमको मैं फेंक दूँगा तरण ताल में
इब मुफ्त घुसेगा जो तू मेले के हाल में,

ग़ालिब खिसक लिये जाके मीर को उकसाया कि तुम्हारी किताब बिक रही है तुम मुफ्त में अंदर जाओ। मीर आये आते ही बोले –
“मेहर की है तवक्को,अंदर मुफ्त जाएंगे हम
शर्मो हया कहाँ तक है मीर कोई दम”
पुलिस वाले ने समझाया –
“दाढ़ी तुम्हारी रंगीन है चचा मगर लगते हो उम्रदराज
अंदर तभी जा सकोगे जब हो सीनियर सिटीजन का पास,”

मीर भी निराश हो गए तो उन्होंने जौक को बुलाया कि इनकी दिल्ली में बड़ी जान पहचान है, इनकी एंट्री हो गयी तो हम भी अंदर जा सकते हैं। जौक ने पहुँचकर मुस्कराते हुए कहा –
“इश्क़ का जोके नज़ारा मुफ़्त में बदनाम है
बेगम मेले में अंदर हैं, जाने दो मुझे काम है”
पुलिस वाले ने उनको उन्हीं की भाषा में जवाब दिया –
“बेगम बड़ी हैं तेज चली, तन्ने क्यों रफ्तार सुस्त है
खबिंद नहीं, खातून के साथ बच्चे की एंट्री मुफ्त है।”

बात नहीं बनी तब तक अकबर इलाहाबादी आ गये, उन्होंने कहा कि मैं अभी बात बनाता हूँ
“जुल्म का चिराग बुझेगा ए कमिश्नर तेरी आंधी से
मुझे मुफ्त अंदर जाने दे और बचा ले बर्बादी से
पुलिस वाला बोला –
“कमिश्नर नहीं गेट पर रहता है हवलदार
चश्मे के बिना अंकल जी अंदर जाना है बेकार”

तब तक दुष्यंत कुमार आ गये उन्होंने भी यही बात की –
“सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिये
सबसे ज्यादा किताबें मेरी बिकती हैं
मुझे हर हाल में मुफ्त एंट्री मिलनी चाहिये।”
पुलिस वाला कुछ बोलता तब तक कविवर हरिवंशराय बच्चन आ गये –
“मंदिर, मस्जिद सब कुछ भूलो, सबसे अच्छी मधुशाला
पुस्तक मेले ने निकाला है, मेरे बेटे का अब दीवाला
हर कोई किताब पढ़ेगा तब कैसे करेगा विज्ञापन वो
साबुन, मंजन, तेल बिके ना, अमिताभ हुआ है मतवाला”
पुलिस वाला झल्ला कर बोला – “अरे महान आत्माओं आप सब आत्मा हैं आपको टिकट की ज़रूरत नहीं है, टिकट जीवित मनुष्यों हेतु है। ये महान विभूतियां अंदर पहुंची तो वहाँ सबसे पहले बेग सुलेमानी मिल गये जो हज्जाम का अपना पुराना पेशा छोड़कर बीच में हकीमी करने लगे थे बाद में किताब भी बेचने लगे थे, वो लय में अपनी मार्केटिंग कर रहे थे –
“लिख दी है मैंने किताब, बस खरीद लीजिये आप
बेची है सफेद मूसली मैंने, लेकर के तौल-नाप
चम्पी भी करूँगा, और बनाऊंगा हजामत
डिस्काउंट भी मिलेगा बस खरीद लो ये किताब’

लेकिन किसी ने उनकी ना सुनी। थोड़ी देर पर चालीस किलो के एक व्यक्ति नज़र आये, दिल्ली की सर्द हवाओं में बेचारे उड़ गए थे। प्रगति मैदान की कंटीली बाड़ में उलझ गए वरना बाहर ही हो जाते, लोग उन्हें पकड़कर लाये, उनके हाथ में कोई कागज़ था साथ में ढेर सारी नारीवादियों का झुण्ड।

पता लगा कि इस बात पर बहस हो रही है और उनसे ज्ञापन पर सहमति ली जा रही है कि इस वर्ष को शरीर का कौन सा अंग वर्ष घोषित किया जाये हिंदी साहित्य का। पता लगा कि ये फिटनेस फ्रीक लेखक महोदय कह रहे थे “मैं लंदन से किताब बेचने आया हूँ, ये सब घोषित करने नहीं”। और वो हवा से नहीं उड़े थे बल्कि नारीवादियों ने उनको दौड़ा लिया था ज्ञापन पर हस्ताक्षर करने के लिये, और उड़े नहीं थे बल्कि दीवार फांद कर भाग जाना चाहते थे। पास जाकर देखा तो ये संदीप नैय्यर साहब थे जो मुझे देखकर कातर स्वर में गाने लगे –

“बिकवा दो सब किताब मेरी, ए दोस्त, मेरे भाई
है सिद्ध इस समर में बिक्री से है खूब कमाई
है डार्क बहुत नाईट, किसी को कर दो प्रपोज़
दो गर्लफ्रैंड मिलेगी तुम्हें, खिल जाओगे ज्यों रोज़”

मैंने उन्हें गले लगाकर कहा –
तुम पौंड वाले कृष्ण, मैं रुपये का सुदामा
बिक जाएगी किताब, पर करो ना यार ड्रामा
खाया पिया करो थोड़ा मेवा और बादाम
मैं सड़कछाप आदमी, चलता हूँ राम-राम”

– दिलीप कुमार

पुस्तक मेले में वामपंथी और कामपंथी

जन जन को चेतन करने के प्रयास में निरंतर ही अचेतन होती जा रही जनचेतना हर पुस्तक मेले में वैसे ही विराजमान रहती है, जैसे हलवाई की दुकान पर समोसे, जलेबी, लड्डू और रसगुल्ले, गुलाबजामुन के बीच पुरानी बासी बरफ़ी रहती है । आज से पांच दस साल पहले तो बरफ़ी चखी भी थी । अब तो देखता ही नहीं उधर । पिछले पांच सालों में तो इस बरफ़ी का बाज़ार एकदम से गिर ही गया है । बड़ी चिन्ता हो रही मुझे तो !

खैर, इस बार जब प्रगति मैदान के स्टेशन से उतर मेले के प्रांगण में घुसने वाला था, तभी दो चार दीख गए । ढकलेल टाइप के कपड़े, एकदम गुआरा मार्का दाढ़ी के साथ । हाथ में ढफ़ली लेकर कुछ क्रांतिनुमा नग़मा गा रहे थे । उनके हाथों में कुछ आड़े तिरछे सजीले, लचकीले अक्षरों में कविताई के पोस्टर भी थे । एक दो सुदर्शना बालाएं भी इस कार्य में जुटी हुईं थीं । एक ने मुस्कराकर पोस्टर बढ़ाया भी मेरी ओर और मैं हौले से बोल पड़ा जय श्रीराम । फिर तो चे के चेहरे की बिजली ही चली गई । लड़की कड़की हो गई । साथी सुन्न पड़ गए । वैसे उनके चेहरे पहले से म्लान थे । समझ सकता हूं, देश में भय का वातावरण है !! शाह तक सिहर उठा है!

भीतर भी एक नामी प्रकाशक की दुकान का एक कोना लेकर ये बैठे हुए थे । वही क्रांति के पोस्टर, वही थके हारे चेहरे, वही घिसी-पिटी कविता, और वही पुरानी अदा । अमा यार! देश बदल रहा है । कहां हो भाई !! हम लड़ेंगे साथी उदास मौसम के लिए का दौर गया ! अब तो उत्तिष्ठत जाग्रत का समय है ! आंखें खोलकर देखो! खंजड़ी फेंको और मृदंग उठाओ ! भजन गाओ पट्ठे !!

इन सबके बीच प्रवेश द्वार से आंगन तक नारी और इस्लाम बेचने वाले भी भतेरे मंडरा रहे थे । वेद और कुरान को चचेरा भाई बतला रहे थे । मार कचर मचर के बीच मैं साहित्य की स्टाल पर छोटी लड़कियों को देख रहा था । उन्हें शेरो शायरी लुभा रही थी । हिन्दी कविता से वे कतरा रही थीं । कुल मिलाकर वामपंथी बेरोजगार हो गए हैं । उनके पास अब दो चार यूनिवर्सिटी का परिसर है । उसी में पिले पड़े रहते हैं । देश के टुकड़े करते रहते हैं । फ़ासिज़्म डाउन डाउन ! डोन्ट वरी ! पाब्लोपुत्र!! मोदी जी विल वन्स अगेन वेयर द क्राऊन.!

– देवांशु झा

लेखन का वरदान पाने के लिए आप उसे भोगने के लिए अभिशप्त हैं

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