मेकिंग इंडिया साप्ताहिकी

जीवन के सप्त रंग, मेकिंग इंडिया के संग
SPINAL CORD : स्वस्थ शरीर का केंद्र जिसे भुलाकर हमने बीमारियों को दिया न्योता

पिछले दिनों सद्गुरु का एक बहुत ही दिलचस्प वीडियो देखा. सबसे बड़ी बात जिसने मुझे अचंभित किया वह यह कि शुद्ध शरीर तल की बात करने वाले चिकित्सकों के बीच उन्हीं की शब्दावली में अध्यात्म की बात करना सिर्फ सद्गुरु के बस का ही है.

जहाँ एक ओर किसी शरीर में दिल के बंद हो जाने को डॉक्टर्स मृत्यु मान लेते हैं, उस शरीर में कितने समय तक जीवन मौजूद होता है इस बात को जिस तरह से सद्गुरु ने समझाया डॉक्टर्स को भी यह स्वीकारना पड़ा कि कैसे कोई व्यक्ति कई बार मृत घोषित हो जाने के बाद भी चमत्कारिक रूप से जीवित हो उठता है.

यह प्रश्न पूछने पर कि ढेर पैसा लगा कर दवाइयों के भरोसे अपनी आयु बढ़ाने के प्रयत्न में जुटा इंसान क्या वाकई अपनी उम्र बढ़ा सकता है, सद्गुरु बहुत प्यारी बात कहते हैं… कि किसी व्यक्ति को मृत्यु से बढ़कर कोई सज़ा देनी है तो उसे अमरता का वरदान दे दीजिये… जब इंसान को यह पता चल जाए कि वह कभी मर नहीं सकता तो सोचिये उसकी सोच और मन:स्थिति कैसी हो जाएगी… और वह पागल तक हो सकता है…

यहाँ हर व्यक्ति अपनी तयशुदा उम्र लिखवाकर आया है. बजाय अपनी उम्र बढ़ाने के प्रयास के इंसान को यह कोशिश करना चाहिए कि जो जीवन मिला है उसका कैसे अधिक से अधिक उपयोग कर लिया जाए.

पिछले दिनों हमारे शहर में चिकगुनिया और डेंगू से कई मौतें हुईं… मैं खुद उस बीमारी की चपेट में आ गयी थी लेकिन मुझे इतना तो विश्वास था कि जिस योजना के लिए मुझे चुना गया है, उसके पूरे होने से पहले तो मृत्यु मुझे छू भी नहीं सकेगी. तो मैंने कोई एलोपैथिक दवाई नहीं ली, यहाँ तक की बुखार कम करने की भी नहीं, यह बात मैं कई बार दोहराते हुए बता चुकी हूँ कि कैसे मैंने रोगहारिणी शक्ति का आह्वान कर अपनी जीवनी शक्ति को बचाए रखा.

इस बात को बार बार दोहराने का एक ही उद्देश्य है कि मैंने उन दिनों अपने बहुत करीबी मित्र को बहुत कम उम्र में इस बीमारी की चपेट में मृत्यु प्राप्त करते देखा. तो जैसा कि कहते हैं हर व्यक्ति अपनी उम्र यहाँ लिखवाकर आया है तो वह इस बीमारी से न मरता तो किसी और कारण से मृत्यु को प्राप्त होता क्योंकि कदाचित उसकी उम्र उतनी ही लिखी थी.

अफ़सोस मुझे इस बात का हुआ कि एक अच्छा भला व्यक्ति दो चार दिन बुखार में रहकर घर पर ही प्राथमिक चिकित्सा लेते हुए ठीक हो रहा था बस थोड़ी सी कमज़ोरी अनुभव करने पर डॉक्टर के पास चला गया.

बस फिर क्या था डॉक्टर ने प्लेटलेट्स की कमी बताते हुए उसे अस्पताल में भर्ती किया और चौथे दिन फिर सीधे उसकी अर्थी ही उठी.

मैं यहाँ हर डॉक्टर ऐसा ही होता है ऐसा नहीं कह रही लेकिन जिस तरह से बड़े अस्पतालों ने चिकित्सा को व्यवसाय बना लिया है और हम मध्यम वर्ग के लोग उनकी चपेट में आ रहे हैं, ऐसे में वह अपनी विश्वसनीयता खो रहा है.

तो क्या ज़रूरी है? बीमारी में डॉक्टर के पास न जाया जाए? मैं कहती हूँ ऐसी नौबत ही क्यों आने दी जाए कि आप अपने ही शरीर की बीमारी को ठीक करने में असक्षम हो जाए!!

आपका शरीर इस तरह से बना है कि यदि बाहरी आघात बहुत गहरा न हो तो सारी बीमारियाँ वह स्वयं ही ठीक कर लेता है. लेकिन इसके लिए आवश्यक है कि आप शरीर को इतना चैतन्य और अनुशासित रखें कि वह आपके आदेश का पालन करे.

बिलकुल एक फौजी कमांडो की तरह जो अपने जवानों को चुस्त दुरुस्त रखता है, एक आदेश पर सब एक साथ जवाब देते हैं… YES SIR…

मैंने कई लोगों को मोटापे का रोना रोते देखा है… यकीन मानो शैफाली मैं दो रोटी से ज़्यादा नहीं खाती… आलू चावल तो बिलकुल छोड़ रखे हैं… थाइरोइड कम करने के लिए तुमने जो अलसी, सौंफ, खड़े धने का उपयोग करने को कहा था वह भी नियमित रूप से ले रही हूँ, लेकिन न थाइरोइड कम हो रहा है, न मोटापा…

उनकी जीवन शैली देखो तो खा तो वो दो ही रोटी रही हैं, परहेज़ भी सारे हो रहे हैं, लेकिन मैं उनको जब भी देखती हूँ… आधा लेटे हुए कुर्सी या सोफे में धंसा हुआ देखती हूँ… बस यहाँ आकर सारा मामला गड़बड़ हो जाता है…

अब आते हैं लेख की शुरुआत जहाँ से की थी… सद्गुरु कहते हैं किसी भी जगह का जो केंद्र बिन्दु होता है वह सबसे अधिक महत्वपूर्ण होता है. उसी के चारों तरफ पूरी चीज़ें घूमती है और यह नियम हमारे शरीर से लेकर ब्रह्माण्ड तक सब जगह लागू होता है.

सारे ग्रहों को देखिये सूर्य को केंद्र में रखकर घूम रहे हैं तो सबकुछ कितना व्यवस्थित है, पृथ्वी को देखिये उसके घूमने से ही उस पर जीवन है… तो वैसे ही आप के शरीर का केंद्र कहाँ है?

आपने देखा होगा हमारे यहं मंदिरों में जो गुम्बद बने होते हैं, आप ठीक उसके नीचे खड़े होकर ॐ का उच्चारण कीजिये आपकी ऊर्जा एक अलग ही स्तर पर होगी… जब आप किसी कमरे में हैं तब भी आपको उसका केंद्र बिन्दु पता होता है… लेकिन जब आप खुद को ब्रह्माण्ड में खड़ा पाते हैं तो आपको उसका केंद्र बिन्दु नहीं पता.

तब मनुष्य शरीर का एवोल्यूशन इस तरह से हुआ कि उसकी रीढ़ की हड्डी ही उसका केंद्र बन गयी, जिन सात चक्रों की हम बात करते हैं वह भी उसी पर स्थित बताये जाते हैं.

और जब आप अपने शरीर के केंद्र बिन्दु का ख्याल नहीं रखते हैं तो आप सिर्फ और सिर्फ बीमारियों को न्योता दे रहे है.

तो मुद्दा यह कि आपको उठते, बैठते, चलते, सोते हर समय अपनी रीढ़ की हड्डी को सीधा रखना है. यही वह ट्रांसमीटर है जो ब्रह्माण्ड की ऊर्जा को ग्रहण करता है. उसे ही आप टेढ़ा मेढ़ा रखेंगे तो ऊर्जा का नष्ट होना स्वाभाविक है. फिर आप कितना भी परहेज़ करें, कितना भी पौष्टिक भोजन करें यदि इस स्वर्णिम नियम का पालन नहीं करते हैं तो सब व्यर्थ है.

और सबसे बड़ी बात आपने देखा होगा शरीर जब भी आपका कहना नहीं मानता तो सबसे पहले अपनी रीढ़ की हड्डी झुका लेता है…. या आपने यह भी सुना होगा किसी भी आत्मविश्वास विहीन व्यक्ति को देखकर यही कहा जाता है कि वह रीढ़विहीन है…

तो जब भी आपका शरीर आपका कहा न मानें तो जैसा कि मैंने ऊपर कहा उस सख्त कमांडो की तरह हो जाइए कि आपके एक आदेश पर आपके शरीर के सारे जवान यानी कलपुर्जे एक साथ बोल उठे YES SIR… फिर देखिये उन जवानों का कमाल… बीमारी रूपी दुश्मन जब भी आक्रमण करेगा वो एक साथ उस पर टूट पड़ेंगे और उसे ख़त्म करके ही लौटेंगे और कहेंगे… This is heart reporting sir, this is brain reporting sir…

और फिर आप कहियेगा चलिए वापस अपने कैम्प में आराम कीजिये और जब भी दुश्मन हमला बोले सतर्क रहिये… और वह कैंप क्या है… आपका Spinal Cord जहाँ इन जवानों को ट्रेनिंग मिलती है. और वह ट्रेनिंग क्या है यह अगले भाग में बताऊंगी.

तब तक स्वस्थ रहिये मस्त रहिये… ऐश को पसंद कीजिये लेकिन सुष्मिता को भी याद रखिये… याद है ना सुष्मिता का अर्थ? सु-स्मित… मतलब एक प्यारी सी मुस्कान…

– माँ जीवन शैफाली

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