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रोटी का जादू

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स्वामी ध्यान विनय से मिलने से पहले हमारी कोर्टशिप के दौरान यानी जब हम ई मेल ईमेल खेल रहे थे या फोन फोन खेल रहे थे, तब मैं उनसे अक्सर एक सवाल पूछा करती थी, कि आप काम क्या करते हो?

तब उन्होंने कहा था चार सुबह और चार शाम की मिलाकर आठ रोटी का ही तो सवाल है उसके लिए काम करूं और काम सम्बंधित हज़ार झंझटें झेलूँ, इतना सब्र नहीं मुझमें इसलिए मैं कोई काम नहीं करता, क्योंकि पैसे कमाने से अधिक मैंने इतना प्रेम कमाया है कि जिसके दरवाज़े पर खड़ा हो जाऊं आठ रोटी वो खुशी खुशी खिला देगा.

पहले मुझे लगा मज़ाक कर रहे होंगे, जिस तरह की मेरी लाइफ स्टाइल थी उन दिनों मुझे लगता था कोई कैसे बिना काम के जी सकता है. लेकिन जब अपनी आँखों से देखा तो यकीन हुआ, सच में नौकरी जैसी चीज़ मैंने उनको कभी करते नहीं देखा…

और फिर हम भी उनके रंग में ऐसे रंगे कि संसार के वो सारे काम छूटते चले गए जिसे दो जून की रोटी कमाने के लिए करना कहते हैं… फिर भी आज हम जिस दरवाज़े पर खड़े हो जाएं लोग प्रेम से दो वक्त का खाना खिला देंगे. आखिर सारी भागा दौड़ी भी तो इस दो वक्त की रोटी के लिए ही तो है…

हाँ कुछ काम शौकिया कर रही हूँ, लेकिन वह भी राष्ट्र की उन्नति और समृद्धि के लिए, समृद्धि पैसों से नहीं, संस्कारों और जीवन शैली से, उसके लिए भी पैसा मैं नहीं कमाती, पूरा मेकिंग इंडिया परिवार बना लिया है, उनसे कह दिया है भई मेकिंग इंडिया आपका है मैं सिर्फ उसमें सेवा कर रही हूँ…

तो कहने का मतलब है कि जिस दो जून रोटी के लिए दुनिया इतनी भागा दौड़ी कर रही है, क्या वह दो जून की आपकी रोटी आपके स्वास्थ्य के लिए लाभदायक है भी? या उसको खाकर, चालीस पचास के बाद ही हम शरीर को बीमारियों का घर बना लेते हैं?

तो आइये इस विषय में विस्तृत जानकारी लेते हैं डॉ N K Sharma से…

तो यह हाल है गेहूं की रोटी का, मैं तो घर में, ज्वार की रोटी, चने की रोटी, मक्का, बाजरा, सबकुछ मौसम के अनुसार उपयोग में लाती हूँ, उसके अलावा जो काम मैं करती हूँ वो भी आपको बताऊँ?

लेकिन वो बताने से पहले कुछ शिकायतें बता दूं जो मेरे मिटटी का जादू वीडियो देखने के बाद लोगों ने प्रतिक्रया स्वरूप की,

मिट्टी के बर्तन में पकाने से क्या हो जायेगा जब बनाने वाली सामग्री ही दूषित है.

दूसरी शिकायत इतना समय किसके पास है आजकल?

तो पहली शिकायत या आपकी यह समस्या तो मैं अभी दूर कर देती हूँ… सब्ज़ियों को बाज़ार से लाकर हम धोकर ही उपयोग में लाते हैं, तो उन सब्जियों को उपयोग में लाने से पहले 15 मिनट तक गौमूत्र अर्क या चूने के पानी में भिगोकर रख दें, उसमें लगे पेस्टीसाइड पूरी तरह से निकल जाएंगे.

दूसरी बात, मसाले पिसे हुए मत लाइए बाज़ार से, खड़े मसाले लाकर घर में कूट कर बनाइये. अंग्रेज़ी फ़ॉर्मूले से बने साबुन शैम्पू छोड़कर गोमय उत्पादों को अपनाइए. आप कहेंगे आजकल गोमय उत्पाद वाली वस्तुओं में भी मिलावट हैं.. तो घर में बनाइये, बहुत ही आसन है ये.

तो फिर आपकी दूसरी शिकायत सामने आएगी, इतना समय किसके पास है आजकल? और यही थोड़ी ना करना है जीवन में? पैसा कमाने के लिए बाहर निकलना पड़ता है, पति पत्नी दोनों को कामना पड़ता है. समाज में चार लोगों के बीच अच्छे कपड़े अच्छा घर अच्छा स्टेटस दिखाना पड़ता है, बच्चों को अच्छे स्कूल में पढ़ाने की भी मजबूरी है.

मतलब यह सब भागा दौड़ी सिर्फ अच्छे दिखने के लिए ही है ना? मतलब दो समय की रोटी के अलावा जो भी हम करेंगे दुनिया को दिखाने के लिए… और इस दिखावे की दुनिया के कारण हमने अपने जीवन से शान्ति सुकून और परिवार के सदस्यों से आत्मीयता को दांव पर लगा दिया, हम सेल्फ सेंटर्ड होते चले गए… मैं मेरा.. बस सबकुछ इसी के इर्द गिर्द घूम रहा है ….

जिस दिन आप इस मैं और मेरा के चक्कर से बाहर निकल जाते हैं तब अस्तित्व आपके लिए हज़ार दरवाजे खोल देता है… फिर आपको समय अलग से मिलता है या काम ऐसे होने लगते हैं कि जैसे सबकुछ आपके लिए ही हो रहा हो, सारी योजनाएं आपके लिए बनने लगती हैं, बस इसे साक्षी भाव से देखने जितना संयम आपको तप और ध्यान करना होता है.

इसलिए हमारी जीवन शैली में महिलों को बाहर नौकरी के लिए निकलने की आवश्यकता ही नहीं पडी, क्योंकि घर में ही इतने काम थे कि इतना समय ही नहीं था, लेकिन आधुनिक जीवन शैली काम कम करके आराम की सुविधाएं बढाती गयी, जिससे शारीरिक श्रम कम हो गया और लोग, बस दो समय खाना बनाने और खाने के अलावा अधिक कोई काम ही नहीं बचा, फिर मोटापा और कई बीमारियों ने हम पर आक्रमण कर लिया. फिर उसी मोटापे को कम करने के लिए हम गार्डन में घूमेंगे, व्यायाम करेंगे, जिम जाएँगे, लेकिन उसका उद्देश्य क्या है मोटापा कम करना, वह श्रम नहीं है, श्रम वह होता है जो उत्पादक हो, जिससे कुछ काम सधता हो, खुद के लिए भी परिवार के लिए भी और समाज के लिए भी.

हाँ, जो लोग मुझे शुरू से जानते हैं वो कह सकते हैं नौ सो चूहे खाकर बिल्ली हज को चली… लेकिन मैं एक बात बताऊँ जिसने नास्तिकता को पूरा पूरा जिया हो, वही पूरी तरह से आस्तिक हो पाता है, वैसे ही जिसने आधुनिकता को पूरा पूरा जिया हो और मेरी तरह उससे हुए नुकसान को झेला हो वही इस प्राचीन जीवन शैली की ओर पूर्ण समर्पण के साथ उन्मुख हो सकता है, और फिर मैं देख पाती हूँ कैसे एक एक करके अस्तित्व मेरे सामने अपनी योजनाएं प्रस्तुत करता जा रहा है. और जब अस्तित्व योजना बनाता है ना तो उस योजना में काम करने का आनंद और संतुष्टि अलग ही होती है.

समाज का अर्थ यही तो होता है ना जैसे हम परिवार के लिए काम करते हैं वैसे ही सारे परिवार मिलकर समाज के लिए काम करे और सारे समाज मिलकर देश के लिए काम करे. और देश विश्व के लिए… भारत विश्व गुरु किसी एक आदमी के काम करने से नहीं बनेगा, उसके लिए हर व्यक्ति को अपना सहयोग देना होगा. और मोदीजी इसी नीति पर काम कर रहे हैं. उनका स्वच्छता अभियान, उनकी स्टार्ट up योजना यह सबकुछ समाज और देश के लिए है.

लेकिन उसके लिए हर व्यक्ति को मोदीजी ही की तरह दिन के 16 से 18 घंटे श्रम करना होगा, वरना करते रहिये आप जिम में पैसे देकर excersize और खाते रहिये अपनी इसी आधुनिक जीवन शैली का खाना तो आप इस चक्रव्यूह से कभी बाहर नहीं निकल पाएंगे.

इस चक्रव्यूह से बाहर निकलना है तो आपको श्रम करना होगा, बिना श्रम के खाया हुआ भोजन आपको सिर्फ और सिर्फ रोग देगा और कुछ नहीं.

और ऐसा नहीं है कि नौकरी करते हुए महिलाएं ये सब नहीं कर सकती, मैं भी तो वेबसाइट चलाते हुए यह सब कर रही हूँ. और दूसरी बात इससे खर्चा भी कम ही होता है. एक तो रेडीमेड वस्तुएं महंगी होती है, नामी कंपनी की है तो कहना ही क्या.

तो मैं तो हर वस्तु घर में ही कूट पीसकर उपयोग में ला रही हूँ और बच्चों को भी इसकी ट्रेनिंग अभी से दे दी है, ताकि वे अपनी भारतीय जीवन शैली से अभी से परिचित हो जाएं, ताकि जब वो बाहर पढ़ाई के लिए जाएं भी तो बाहर के ही न होकर रह जाए, आपके संस्कार आपकी शिक्षा यहाँ अधिक काम आएगी, बड़े स्कूलों में पढाई गयी अंग्रेज़ी पढाई काम नहीं आएगी.

तो मैंने इस बार अमचूर, त्रिफला, गोमय मंजन, साबुन, पापड़, बड़ी, आंवला केरी का अचार, मुरब्बा, आंवला कैंडी, सबकुछ घर में बनाया है. यहाँ तक कि अब मैं गोमय साबुन भी घर में बनाने जा रही हूँ, जिसका ज़िक्र मैंने आप सबसे किया था, बहुत जल्दी यह साबुन मैं आप सब तक पहुंचाने वाली हूँ.

अब तो यह हो गया है कि मैं स्वामी ध्यान विनय की तरफ जैसे ही उत्साह से देखती हूँ वह तुरंत समझ जाते हैं, लगता है फिर कोई नया आइडिया आया है आपके दिमाग में… तो दिमाग में ये आइडियाज़ तभी आएँगे जब दिमाग तेज़ चलेगा, और दिमाग मेरा आपका और बच्चों का तभी तेज़ चलेगा जब आप दो वक्त की रोटी सही तरीके से खा रहे होंगे. कहते हैं ना जैसा खाएंगे अन्न वैसा रहेगा मन… तो आप जिस क्षेत्र में कम कर रहे हैं उसमें कुछ नए आईडिया कुछ नए ट्विस्ट लाना चाहते हैं तो अपने खाने के तरीके में भी कुछ ट्विस्ट लाइए, फिर देखिये जीवन में कैसे होता है जादू…

सच में इसी दो वक्त की रोटी में ही ये सारा जादू, जिस दिन आप इस जादू को समझ जाएंगे आपके जीवन में अद्भुत परिवर्तन आएगा. इसलिए सबसे पहले अपने बच्चों को सिखाइए इस रोटी का जादू. उन्हें छोटे छोटे जादू पर अचंभित होने दीजिये, तभी वे अस्तित्व के बड़े बड़े जादू के लिए तैयार हो पाएँगे.

आइये अपने बच्चों की खातिर फिर घर लौट चलें…

  • माँ जीवन शैफाली
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