मेकिंग इंडिया साप्ताहिकी

जीवन के सप्त रंग, मेकिंग इंडिया के संग
उत्पादक श्रम अर्थकारी और अनुत्पादक श्रम अनर्थकारी

उत्पादक श्रम अर्थकारी और अनुत्पादक श्रम अनर्थकारी होता है। सन्तानोत्पत्ति हेतु संसर्ग करना अर्थकारी है।

केवल भोगेच्छा पूर्ति हेतु पहले सहवास करना, फिर विरक्ति होने पर पुनः भड़काऊ सामग्री की शरण में जाना, पश्चात मानसिक अशांति होने पर ड्रग्स आदि का सेवन और वहाँ से विखंडित व्यक्तित्व की पूर्ति हेतु विकृतियों को अपनाना, कुल मिलाकर एक अंतहीन चक्र है जिसे ही शास्त्रों में तृष्णा माना गया है।

जिम जाना, अनुत्पादक श्रम है, कुँए से पानी खींच लाना उत्पादक। अनुत्पादक श्रम में शरीर का व्यायाम तो होता है किंतु चित्त की शुद्धि नहीं होती।

कुँए से पानी खींच कर लाने में, जब पसीना बहता है तो उसके साथ चित्त के विकार भी बह जाते हैं। हल चलाने वाले और भेड़ चराने वाले, स्वभाव से ही साधु होते हैं। – सरदार पूरणसिंह, यूँ ही नहीं कहते।

परोपकार हेतु श्रम करना, जिसे सेवा कहते हैं, वह इससे भी अगला चरण है, जिससे आत्मतत्व का विकास होता है। उसे छोड़िये, अभी तो अपने कच्छा बनियान धो लें, वही बड़ी बात है!

वर्तमान व्यवस्था की सबसे बड़ी त्रासदी यही है, श्रम की अप्रतिष्ठा। जितना कम परिश्रम, उतना अधिक वेतन। बड़े अधिकारियों, तुंदिल सेठों को भी श्रम अवश्य करना चाहिए। कई लोग करते भी हैं।

बड़े बड़े आईएएस वगैरह, घर के बगीचे में एक घण्टा घनघोर पसीना बहाते हैं, कई उद्योगपति अपने कारखाने में मजदूरों के साथ उनसे भी ज्यादा पसीना बहाते देखे जा सकते हैं।

जब राजा महाराजा, घुड़सवारी आदि करते थे तो वे स्वयं भी खूब श्रम करते थे। भारतीय जीवनशैली को इस तरह से डिज़ाइन किया गया था कि उत्पादन, श्रम, चित्तशुद्धि आदि स्वतः विकसित होते चले जाते थे।

वर्तमान युवाओं का अकर्मण्य स्वरूप और फोकट की नौकरी हेतु भागदौड़ के पीछे, इस बोगस शिक्षा व्यवस्था का बहुत बड़ा हाथ है। आप किसी से पैसे माँगते हैं और इस हेतु, अपने 15-16 वर्ष के लड़के को भेजकर देखिए, उसके कदम ऐसे डगमगाते हैं मानो मौत के पिंजरे में धकेला जा रहा हो!

गणित-विज्ञान-अंग्रेजी के नाम पर मंहगी शिक्षा, कोचिंग संस्थानों की दादागिरी, और नितांत अव्यवहारिक पप्पुओं की बढ़ती फ़ौज, से पूंजीवाद के बूचड़खानों में कटने के लिए फसल उगाई जा रही है, इनसे और कोई उम्मीद भी नहीं रखी जा सकती।

देश में सभी प्रकार के सर्विससेक्टर में अधिकतम 10% लोग ही नियोजित हो सकते हैं। तब, ये शेष 90% क्या करेंगे?

एंड्रॉइड क्रांति, लव शव, बलात्कार, सेक्स, असन्तोष, अशांति, उठापटक, आत्महत्या, दिशाहीन भटकाव!

श्रम विहीन, कुंठित चित्त वाले, लोकतंत्र के वोटर बने इन सभी लड़कों हेतु करणीय कुछ है या नहीं?

सर्वत्र यंत्र संस्कृति का बोलबाला है, मनुष्य के लिए कुछ बचता ही नहीं। पर्यावरण, कृषि, पशुपालन आज भी अनपढ़ जाहिल समझे जाने वाले लोगों के हाथ में है।

किसी समय, इस देश में 15-16 वर्ष की आयु में युवाओं ने साम्राज्य खड़े कर दिये थे, जबकि आज 30-35 वर्ष की आयु के लफंगे jnu में मुफ्त की रोटियां तोड़ते हुए भारत की बर्बादी के सपने देखते हैं।

– केसरी सिंह सूर्यवंशी

जब तक श्रम नहीं करेंगे, पाप नहीं धुलेंगे, जब तक पाप नहीं धुलेंगे, फैट नहीं घुलेंगे

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