मेकिंग इंडिया साप्ताहिकी

जीवन के सप्त रंग, मेकिंग इंडिया के संग
Period : End of Sentence : तन ढंकने वाले कपड़ों पर मज़हबी दखलअंदाज़ी

ईरान जानते हैं? मिडिल ईस्ट का दूसरा सबसे बड़ा देश। मुस्लिम बहुल जनसंख्या वाला मुल्क है। कुछ महीनों पहले वहाँ पर #چالش_آتش_زدن_قرآن काफ़ी trend हुआ था। जिसका मतलब है – Burn The Qur’an Challenge!

इसकी वजह ये कि इस्लामिक क्रांति के बाद से ही वहाँ पर सभी महिलाओं के लिए सार्वजनिक स्थानों पर हिजाब पहनना अनिवार्य है। यदि वहाँ की महिलाएं विरोध करना चाहती तो केवल इस एक नियम के विरुद्ध या सत्तापक्ष की मज़हब में लिपटी मर्दवादी सोच के विरुद्ध ही अपना विरोध ज़ाहिर कर सकती थी।

मगर उन्होंने सीधा कुरान को ही जलाने की बात कही। इंसान को प्रेरणा दो प्रकार से मिलती है- या तो दूसरों की अच्छाईयाँ देखकर अच्छा बनने की, या फिर दूसरों की बुराईयाँ देखकर बुरा ना बनने की।

अब सेमेटिक मज़हब वाली बहुसंख्यक आबादी वाले जिस देश में मुखर होती नई आवाज़ों को दबाने का प्रचलन बहुत प्राचीन हो, वहाँ आवाज़ उठाने की प्रेरणा के लिए सकारात्मक तत्व तो क्या ही उपलब्ध होते उन्हें! इसीलिए ईरानी महिलाओं को आसमानी किताब जलाने का आईडिया यदि दूसरों की कमियों से सीखकर आया है, तो ज़रूर उनके प्रेरणास्त्रोत भारतीय ही रहे होंगे, क्योंकि हमारी ही मानसिकता है कि हम कभी समस्या के मूल में ना जाकर केवल इर्द-गिर्द घूमते रहते हैं।

ज़रा सोचिए कि एक इस्लामिक मुल्क में जिन महिलाओं ने ये मुहिम चलाई उनकी रीढ़ कितनी मज़बूत होगी। आज भी गाहे बगाहे कई वीडियो आते रहते हैं जिनमें ईरानी महिलाएं मर्दवादी मज़हब की सोच से यलगार करती हुई अपना विरोध ज़ाहिर करने के लिए सार्वजनिक स्थलों पर खुले में अपने बाल लहराकर चलती हैं। (सड़क पर अपने बाल खोल कर चलना आपके लिए शायद नॉर्मल होगा, किन्तु उनके लिए वो उनकी मतभिन्नता प्रदर्शित करने का एक माध्यम है क्योंकि वहाँ उन्हें इसकी अनुमति नहीं है।) ये सब करने का जिगरा उनमें तब है, जब आए दिन वहाँ ऐसा ही करने पर या तो लड़कियों को जेल भेज दिया जाता है या फिर भरी भीड़ में कोड़े मारे जाते हैं। एक घटना में तो इस नियम का विरोध करती लड़की ने जब अपना हिजाब जलाया, तो उसे ही आग के हवाले कर दिया गया।

अब जहाँ तन ढंकने वाले कपड़ों पर ही इतनी मज़हबी दखलअंदाज़ी हो, ऐसे मुल्क में माहवारी को लेकर महिलाओं की जागरूकता को लेकर प्रश्न तो उठने चाहिए। आंकड़ों की मानें तो करीब 48 फ़ीसदी ईरानी लड़कियाँ माहवारी को एक बीमारी मानती हैं। वहीं भारत में मीडिया फुटेज की सहायता से मशहूर होने वाले गिने-चुने स्वघोषित नारीवादियों को छोड़ दिया जाए, तो यहाँ के बहुसंख्यक समुदाय के लोग माहवारी को मासिक ‘धर्म’ कहते हैं (रिलीजन और धर्म को बराबर मानने वालों से पूरी उम्मीद है कि उन्हें यहाँ पर इस शब्द का प्रयोग समझ नहीं आएगा)।

पर जिस धरती पर इस प्राकृतिक क्रिया के लिए आस्था और परंपराओं में भी स्थान है, फिर भला स्वतंत्रता के सात दशकों बाद वहाँ पर इस विषय को लेकर सोच में ऐसी जड़ता कैसे आती गई? क्या जनसंख्या की आधी आबादी के हर चार में से करीब एक हफ़्ते किसी तकलीफ़ से गुज़रने पर उस आधी आबादी की पीड़ा का समाधान करना दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का कर्तव्य नहीं बनता था?

बात ईरान की महिलाओं से शुरू करते हुए भारत तक और माहवारी जैसे संवेदनशील विषय पर लाने की वजह ये हुई कि जिस धरती पर हिजाब के विरुद्ध युद्ध लड़ रही महिलाएं बिना जान की परवाह किए अपनी मज़हबी किताब पर सवाल उठा रही हैं, उसी धरती से एक फ़िल्ममेकर – रायका ज़हताबी ने अपनी डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म के लिए ऑस्कर अवार्ड जीता है। फ़िल्म का नाम है – ‘Period: End of Sentence’. फ़िल्म में इस विषय पर जो केस स्टडी दिखाई है वो उत्तर प्रदेश के हापुड़ की है। मानव शरीर संबंधी स्वच्छता के ज्ञान के विस्मृत होने एवं यौन शिक्षा संबंधी जागरूकता के अभाव के अलावा, एक और बहुत बड़ा कारण रहा कि नारी को पूजने वालों की धरती पर स्वयं नारी ही मूल आवश्यकताओं से वंचित होती रही। सन् ’47 के बाद से ही इस समस्या का समाधान ना कर पाने के पीछे सबसे बड़ा कारण रहा – बाज़ार।

यदि भारत में सैनेटरी पैड्स के बाज़ार और व्यापार के इतिहास की स्टडी करेंगे, तो आप पाएंगे कि भारत में इनके निर्माण पर हमेशा से ही विदेशी कंपनियों का दबदबा रहा है। अगर कोई गैरसरकारी संस्था या लघु उद्योग इनसे कम्पीट करना भी चाहे, तो बाज़ार में ज़्यादा समय टिक नहीं सकते थे। इससे इस धंधे में इन बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की मोनोपॉली हो गई। इन विदेशी कंपनियों के प्रोडक्ट इतने मंहगे होते हैं कि जिस औरत के घर में बच्चे भूख से तड़प रहे हों, उसके पास बमुश्किल हाथ आए पैसों से अपनी शारीरिक सहूलियत की बजाए बच्चे की भूख का ही इलाज करने का विकल्प बचता है। ऐसे नाज़ुक वक्त में औरतें कपड़ा, अख़बार और मिट्टी तक लगाने को मोहताज हो जाती हैं।

तकलीफ़ के उन दिनों में जब शारीरिक स्वच्छता की सबसे अधिक ज़रूरत होती है, तब ऐसे हानिकारक विकल्पों का इस्तेमाल उनकी सेहत पर बहुत नकारात्मक प्रभाव डालता है। इसीलिए भारत में सैनेटरी पैड्स के बाज़ार से विदेशी कंपनियों का एकाधिपत्य समाप्त होना बेहद ज़रूरी है। इस दिशा में बहुत से स्थानों से अच्छी पहल भी हुई हैं। जिन गैरसरकारी संस्थाओं की इस विषय पर शोध थी और जो लघु उद्योग इस दिशा में समाधान उन्मुख दृष्टिकोण से काम करने के इच्छुक थे, भारत सरकार के महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने उनके साथ मिलकर सैनेटरी पैड्स के बाज़ार के स्वदेशीकरण की पहल की। अरूणाचलं मुरुगानंथम के बारे में तो उनके ऊपर बने चलचित्र ‘पैडमैन’ से जान ही गए होंगे आप। मगर जिस देश में चीनी उत्पादों के इस्तेमाल का बहिष्कार केवल सोशल मीडिया तक सीमित रह जाता हो, वहाँ इन विदेशी कंपनियों से सस्ते और बेहतर प्रोडक्ट बनाने के लिए उसमें कुछ विशेषता भी होनी चाहिए। तो पर्यावरण की दृष्टि से सबसे संतोषजनक बात ये है कि सैनेटरी पैड्स का निर्माण करने वाले स्वदेशी उद्योग जिस कच्चे माल का प्रयोग करते हैं, वो बॉयोडिग्रेडेबल है। यानी उनमें मुख्यतः केवल रूई और सूती कपड़े का इस्तेमाल किया जाता है।

केन्द्रीय सरकार से नौकरी ना दे पाने की शिकायत करने वाले जानबूझ कर आपसे ऐसे तथ्य छिपाते हैं कि स्वरोज़गार और आंत्रप्रेन्योरशिप को बढ़ावा देने के लिए क्या-क्या कदम उठाए गए हैं। नकारात्मकता की फसल काटने वाले रोज़गार को केवल नौकरियों के समतुल्य रखकर आपको ये नहीं जानने देते कि स्किल इंडिया और मेक इन इंडिया जैसी योजनाओं से कितने निम्न या मध्यम वर्गीय परिवार अपना पेट पाल पा रहे हैं।

हो सकता है कि इसके पीछे उनकी ईर्ष्या भी हो, क्योंकि महंगी फीस वाले विश्वविद्यालयों और संस्थानों में पढ़े जो अभिजात वर्ग के लोग अपनी शर्ट का बटन लगाना तो छोड़िए, बल्कि सुई में धागा भी नहीं डाल पाते, उन्हें सामान्य वर्ग द्वारा बाज़ार की रवायत बदलते देखकर समस्या तो होगी ही। यूं भी महिलाओं को बिज़नेस में शामिल करके उन्हें आत्म-निर्भर बनाने से तो आसान ही है कि बेटी बचाओ अभियान की खिल्ली उड़ाकर नारी स्वतंत्रता का ढ़ोग रचाया जाए।

किन्तु अब बस! जैसा कि फ़िल्म के नाम में ही समाहित है, कि उस अभिजात वर्ग के द्वारा चुने गए शब्दों से ही बनने वाले वाक्य पर अब पूर्ण विराम लगाना होगा। 1400 साल से मज़हब के नाम पर मर्दवादी सत्ता जिस प्रकार महिलाओं को गुलाम बनाती आ रही है, इस पर पूर्ण विराम लगाना होगा, जिसकी पहल ईरान में महिलाओं ने अपनी मज़हबी किताब जलाने से कर दी है। लगाना होगा पूर्ण विराम विदेशी कंपनियों द्वारा किए जा रहे सामान्य वर्ग के आर्थिक शोषण पर, जिसकी वजह से महिलाएं मूलभूत आवश्यकताओं से वंचित रह जाती हैं।
“Period: End of Sentence.”

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस की शुभकामनाओं सहित
जय भवानी!

– रमण सिंह

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1 thought on “Period : End of Sentence : तन ढंकने वाले कपड़ों पर मज़हबी दखलअंदाज़ी

  1. (बहुत ही सुन्दर विचारो के माध्यम से कॉफी सारी जानकरी)
    Informative and beautiful written.

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