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पाणिनि, संस्कृत भाषा का गौरव और आधुनिक विज्ञान

विश्व के सर्वकालीन महान गणितज्ञों में से एक श्रीनिवास रामानुजन ने अपने छोटे-से जीवन में क़रीब चार हज़ार प्रमेय दिए थे। उनमें से कई चमत्कारिक प्रमेयों के बारे में जब कैम्ब्रिज के गणितज्ञ जे.एच.हार्डी ने आश्चर्यचकित होकर उनसे पूछा कि यह कैसे सोचा तो रामानुजन ने उत्तर दिया, देवी नामगिरि ने स्वप्न में आकर बता दिया।

खुद हार्डी उस समय रामनुजन के इस उत्तर से संतुष्ट नहीं थे लेकिन धीरे-धीरे उन्होंने स्वीकार कर लिया कि रामानुजन की प्रज्ञा सीधे तौर पर उनकी ईश्वरीय चेतना से संचालित थी, क्योंकि वे कहते थे कि उनके लिए वे सभी प्रमेय निरर्थक हैं जिसमें आध्यात्मिक आभा न हो।

आज किसी वामपंथी या कथित वैज्ञानिक सोच वाले व्यक्ति के सामने रामानुजन की यह कथा सुनाना ख़ुद को हास्य का पात्र बनाना होगा, क्योंकि भारत की आध्यात्मिक चेतना और ईश्वरीय अवधारणा उसके लिए उपहास की विषयवस्तु है।

उनका लगभग यही रवैया संस्कृत भाषा के साथ भी है। कोई तीन साल पहले केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी ने मानव संसाधन मंत्री के तौर पर जब कहा था कि आईआईटी में संस्कृत भाषा भी पढ़ाई जानी चाहिए तब वे उपहास का पात्र बन गई थीं। जबकि उनके कहने का आशय सिर्फ यह था कि प्राचीन संस्कृत ग्रंथों के गंभीर अध्ययन से हम पुराने प्रतिपादित वैज्ञानिक और गणितीय सिद्धांतों के बारे में जान सकेंगे।

चूंकि आधुनिक और प्रगतिशील भारतीयों के लिए संस्कृत देवी-देवताओं की अभ्यर्थना मात्र की भाषा है, इसलिए उसे पढ़ने की ज़रूरत ही नहीं है बल्कि उनके मुताबिक़ तो संस्कृत पढ़ना मूढ़मति या जड़ होना है। वे मानते हैं कि संस्कृत मृत भाषा है।

दूसरे संस्कृत के विरोधी वे लोग हैं, जो इसे सिर्फ ब्राह्मणों की भाषा मानते हैं और संस्कृत की बात आते ही तमिल-तेलुगु और प्राकृत-पाली के लिए भी ऐसी ही मांगें करने लगते हैं। उन्हें समझना चाहिए कि प्राचीन भारत में बौद्धिक और गणितीय-वैज्ञानिक सिद्धांतों की, विचार विमर्श की मानक भाषा संस्कृत ही थी। वराहमिहिर, भास्कराचार्य और आर्यभट्ट प्राकृत या पाली में नहीं लिखते थे, न उन भाषाओं में उनका बौद्धिक संवाद होता था।

बहरहाल, सबसे पहले हमें संस्कृत व्याकरण की बात करनी चाहिए। ख़ासकर पाणिनि के व्याकरण की। जब हम आधुनिक भाषाओं के व्याकरण से पाणिनि के संस्कृत व्याकरण की तुलना करते हैं तो उसे सर्वथा भिन्न पाते हैं। क्योंकि पाणिनि वैयाकरण से पहले एक गणितज्ञ थे। उन्होंने सबसे पहले इस बात को समझा कि भाषा का एक एल्जेब्रिक स्वरूप हो सकता है। चूंकि प्राचीन भारतीय गणित अपनी संरचना में एल्जेबरा के नज़दीक है (भास्कराचार्य को देखें) और इस क्षेत्र में तब ज्यादा काम किए गए (जैसे कि यूनान में त्रिकोणमिति के जानकार मौजूद थे), इसलिए उन्होंने संस्कृत के व्याकरण को एक एल्जेब्रिक गणितीय भाषा का रूप दिया। वह व्याकरण स्पष्ट, सुनिर्देशित और सुव्याख्यायित सिद्धांतों से कार्य करता है। उसकी हर पंक्ति एक नियम से तय होती है। पाणिनि के व्याकरण में लोकाचार से भाषा में छूट का कोई स्थान नहीं है, जैसा कि हिंदी या दूसरी भाषाओं के व्याकरण में होता है। यानी उसकी एक मानक भाषा है, जिसे हम बड़ी आसानी से आधुनिक कंप्यूटर की भाषा से तादात्म्य कर सकते हैं।

कंप्यूटर की भाषा मशीनी होने के कारण वह भाषा के इस स्वरूप को सबसे आसानी से ग्रहण करता है, क्योंकि वह ख़ुद अपने दिमाग़ से किसी भाषा को नहीं रचता, बल्कि एक व्याख्यायित भाषा से काम करता है। इसलिए सभी बड़े सॉफ्टवेयर प्रोग्रामर और कंप्यूटर साइंस के विद्वान इस बात को मानते हैं कि पाणिनि का व्याकरण कंप्यूटर की भाषा के लिए आदर्श है। न सिर्फ कंप्यूटर की भाषा के लिए बल्कि आधुनिक भाषा विज्ञान के विद्वानों को व्याकरण और लिंग्विस्टिक्स की समझ विकसित करने में पाणिनि और प्राचीन भारतीय भाषाविदों ने अमूल्य योगदान दिया है।

शेल्डन पोलक, जो कि प्राचीन भारतीय संस्कृति के कटु आलोचक हैं और पारंपरिक पश्चिमी चश्मे से भारत को देखते हैं, जिनका पूरा आग्रह ही संस्कृत को मृत भाषा साबित करने का है, वे भी इस सत्य को मानते हैं कि आधुनिक लिंग्विस्टिक्स के जो पश्चिमी धुरंधर रहे, उन्होंने भारतीय भाषा और भाषिक संरचना से बहुत कुछ लिया। दु:ख की बात ये है कि ब्लूमफ़ील्ड ने पाणिनि से सीखा, नोम चोम्स्की ने ब्लूमफ़ील्ड से जाना और पाणिनि के व्याकरण से सबकुछ लेकर उन्हें कुछ नहीं दिया। आज दुनिया नोम चोम्स्की की बड़ी इज्ज़त करती है लेकिन उन्होंने जो पाणिनि से लिया, कभी उसका कृतज्ञता ज्ञापन किया?

पाणिनि ने तक्षशिला और कंधार से लेकर कामरूप और इधर विन्ध्याचल से ऊपर के भारत का पैदल भ्रमण करके उस समय प्रचलित शब्दों को एकत्रित किया था। बाद में इनका वर्गीकरण किया और एक मानक कोश की रचना की। पाणिनि के विषय में कहा जाता है : ‘महती सूक्ष्मेक्षिका वर्तते सूत्रकारस्य’ यानी वैयाकरण पाणिनि की दृष्टि अत्यंत पैनी है। पाणिनि के वर्गीकरणों का इतना महत्व है कि कालांतर में भाषा के जो प्रयोग ‘अष्टाध्यायी’ के निष्कर्ष पर खरे नहीं उतरे हैं, उन्हें ‘अपाणिनीय’ कहकर अशुद्ध घोषित कर दिया जाने लगा।

कहा जाता है कि पाणिनि के सूत्र में एक भी शब्द अनर्थक नहीं है। यह अकारण नहीं है कि सहसा इधर पाणिनि पश्च‍िमी भाषाशास्त्र‍ियों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हो गए हैं, एक हम भारतीयों को ही आज उनके बारे में बात करने में भी लज्जा आती है।

हमने तो भारतीय प्राच्यविद्या को अंधविश्वासों से जोड़ दिया है, जबकि उसमें गणित, व्याकरण, काव्य, चिकित्सा की अद्भुत दृष्टियां हैं। मजाल है आज कोई जेएनयू या डीयू जैसी हिंदुस्तान की किसी बड़ी अकादमी से पढ़कर निकले और राजशेखर, भरतमुनि, व्यास, पाणिनि, आर्यभट या कुमारिल को उद्धृत करे!

इस पूरी ज्ञान-परंपरा को ही सांस्कृतिक राष्ट्रवाद कहकर निरस्त करने की कोशिशें की जा रही हैं! संस्कृत का नाम लो तो बुद्धिजीवी नाक-भौं सिकोड़ते हैं और ‘अष्टाध्यायी’ और ‘अमरकोश’ की बात करो तो सामान्यजन यूं कौतुक से देखते हैं, जैसे किन्हीं विलायती ग्रंथों का नाम ले लिया हो!

यह आधुनिक भारत है, जहां अच्छी अंग्रेज़ी लिखना गर्व की बात मानी जाती है और अच्छी हिंदी हमें असहज कर देती है। योग तक को ‘भगवा’ माना जाता है! हमारे बुद्धिजीवी रात-दिन भारतीय परंपरा को कोसते रहते हैं। अवैज्ञानिक कहते हैं। गीता, उपनिषद, योग उपहास्य हैं। ज्योतिष अंधविश्वास है। आयुर्वेद तिथिबाह्य है। फिर व्याकरण और काव्य सिद्धांत की तो बात ही क्यों करें? षट्दर्शन की चर्चा फिर कौन करे?

दुनिया के उत्तर आधुनिक चिंतक नागार्जुनाचार्य से फ़िलॉस्फ़ी सीखते हैं और पाणिनि से व्याकरण सीखते हैं पश्चिम के भाषाचिंतक! और हम इनके दाय से भी अनभिज्ञ! कृषि की तकनीकें हमने सोवियत संघ से सीखीं और ‘कृषिपराशर’ और ‘काश्यपीयकृषिसंहिता’ को उलटकर भी नहीं देखा। पाणिनि के पारिभाषिक शब्द जो सर्वज्ञात होने चाहिए थे, आज हमारे लिए कौतुक और आश्चर्य का विषय हैं। यह हमारी शिक्षा परंपरा पर ही एक टिप्पणी है ना!

इसे स्वीकार करने में हमें कोई भ्रम नहीं होना चाहिए कि प्राचीन भारत में अंकगणित, खगोल विज्ञान और समय की संकल्पना काफ़ी विकसित थी। श्रीमद्भागवत पुराण में ब्रह्मांड की आयु का जो उल्लेख है, वह काफ़ी हद तक क्वांटम मैकेनिक्स के आधुनिक सिद्धांत के क़रीब है।

शायद आपको ये जानकर हैरत होगी कि 1940 के आसपास प्रतिपादित गणित के आधुनिक सिद्धांत इन्फ़ॉर्मेशन थ्योरी की जड़ें साढ़े तीन हजार साल पुराने वेद में मिलती हैं। इन्फ़ॉर्मेशन थ्योरी का कंप्यूटर साइंस में इन दिनों बहुत इस्तेमाल होता है। कंप्यूटर साइंस इस सिद्धांत पर काम करती है कि दी जाने वाली सूचना जब आगे बढ़े तो भ्रष्ट न हो, यानी उसका मूल स्वरूप न बिगड़े।

हम जानते हैं कि वेद को श्रुति कहते हैं। उस समय श्रुति को सिर्फ सुनकर स्मरण किया जाता था और आगे बढ़ाया जाता था। तो ऋषियों ने श्रुति को भ्रष्ट पाठ से बचाने के लिए एक फ्रेमवर्क तैयार किया। इस खोज के बारे में भी हमें विदेशी विद्वानों से ही पता चला है।

आश्चर्य है कि जिस भारतीय दर्शन में इस आधुनिक गणितीय सिद्धांत के बीज थे, उस पर किसी की नज़र नहीं पड़ी। और एक समय के बाद जब सबकुछ लिखा जाने लगा तो उस सिद्धांत की ज़रूरत ही नहीं रही लेकिन आधुनिक समय में थ्योरी ऑफ इन्फ़ॉर्मेशन की ज़रूरत टेलीफ़ोन से महसूस की गई, जिसमें संवाद हमेशा शुद्ध नहीं होता। इंटरनेट आने के बाद तो इसकी ज़रूरत और बढ़ गई है।

बात छोटी-सी है लेकिन बड़ी भी है कि बीसवीं सदी के दो बड़े शोध, कंप्यूटर की भाषा और इन्फ़ॉर्मेशन थ्योरी की जड़ें भारत में थीं। यहां से ये संभावना भी प्रबल होती है कि आगे होने वाले शोधों की जड़ें प्राचीन भारत में रही हों।

गणित को लॉजिक से संचालित करने का आधुनिक सिद्धांत विदेशियों के लिए नया होगा, लेकिन इस सिद्धांत पर तेरहवीं सदी में मिथिला के विद्वान गंगेश उपाध्याय, जो कि नव्यन्याय के प्रवर्तक थे, ने विचार कर लिया था। कैलकुलस, जिसे हम पश्चिम की देन मानते हैं, के जनक केरल के चौदहवीं सदी के गणितज्ञ माधव थे। पश्चिम में अब इसे स्वीकारा जाने लगा है कि कैलकुलस भारत की उपज है।

गणित में भारत के लिए पहला फ़ील्ड्स मेडल जीतने वाले युवा गणितज्ञ मंजुल भार्गव ने एक साक्षात्कार में तमाम महान गणितज्ञों के प्रति सम्मान जताते हुए कहा था कि वे संस्कृत के विद्वान अपने दादा के भी ऋणी हैं, जिन्होंने 628 ईसापूर्व के भारतीय गणितज्ञ ब्रह्मगुप्त की संस्कृत में लिखी पांडुलिपि दिखाई थी और बताया था कि कैसे ब्रह्मगुप्त ने जर्मनी के महान गणितज्ञ कार्ल फ्रेडरिच गॉस के जटिल नंबर थ्योरी लॉ जैसे सिद्धांत को साधारण तरीक़े से समझा दिया था।

सार यह है कि सारे खोज और शोध सिर्फ पश्चिम में ही नहीं हुए। ना ही भारत ने ही दुनिया को सबकुछ दे दिया, जैसा कि कुछ कूपमंडूक दावा करते रहे हैं। अत: हम कूपमंडूक न बनें, लेकिन जो श्रेष्ठ था, उसे फिर से क्यों न पढ़ें, एक नई अंतर्दृष्टि से उस पर क्यों न विचार करें और गुनें? जानें कि भारत गणित, विज्ञान, दर्शन और भाषा के क्षेत्र में कहां था। इस जानकारी को हासिल करने के लिए हमें प्राचीन ग्रंथों के सागर में उतरना ही होगा, जिसका अधिकांश हिस्सा संस्कृत में है।

– देवांशु झा

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1 thought on “पाणिनि, संस्कृत भाषा का गौरव और आधुनिक विज्ञान

  1. लंबे दौर के बाद मुझे अच्छा ,साप्ताहिक मैग्जीन मिला ।
    जिसमे मख्यतः मुझे अधात्मिक ,लौजिकल,और प्रेरणादाई ज्ञान मिलेगा।
    मै बहुत खुश हूं ।
    आपके प्रयास की मै सराहना करता हूं ।
    धन्यवाद्।

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