मेकिंग इंडिया

जीवन के सप्त रंग, मेकिंग इंडिया के संग

जीवन को जो दिशा दे, ऐसा शिक्षक आना चाहिए हर छात्र के जीवन में

रात के डेढ़ बजे हों… मैं होऊं… मेरी साइकिल हो… दस-बारह फ़ीट चौड़ी सड़क हो… आगे-पीछे से कोई आता जाता न हो… मैं चलते-चलते ही ऊँघकर सो जाऊं… आगे बढ़ते हुए सो न भी पाऊँ तो कम से कम इस असम्भव सी कल्पना में खो जाऊं… मेरी कल्पना में 2007

Read More

तू किसी और की जागीर है जान ए ग़ज़ल, लोग तूफ़ान उठा देंगे मेरे साथ ना चल

ग़ज़ल सुनना आजकल जैसे बुद्धिजीवी होने का पर्याय होता जा है. कई तो ऐसे मिल जायेंगे जो ठीक से “ग़ज़ल” शब्द का उच्चारण नहीं कर सकते पर ग़ज़ल का शौक़ीन होने का दम्भ भरते नज़र आते हैं. अब ऐसे में समझ कितना आता है ये तो वो ही जानें या

Read More

सारे नियम तोड़ दो, नियम पे चलना छोड़ दो

कोटा की कोचिंग ने जब मेरी ज़िंदगी की लगानी शुरू की तो मेरे अंदर अध्यात्म जाग गया और मैं ढूंढने लगी किसी गुरु को जो मुझे शरण में ले और दुनिया के मोह-माया से आजाद करवाये. कोटा में हर दूसरा बच्चा प्रेशर में इतना पक कर गुलगुला हो चुका होता

Read More

जीवन के MONACO BISCUITS पर कुछ TOPPINGS हो जाए!

बिस्कुट एक ऐसी चीज़ है जो अमूमन सभी उम्र के लोग खाते हैं. चाय में डुबोकर, शाम की हल्की भूख के समय, या यूं ही कभी मन हो आता है बिस्कुट खाने का. आलू ही की तरह बिस्कुट हर जगह फिट हो जाते हैं, चाहे नाश्ता हो या खाना. इसको

Read More

Sandakphu Trek : तपस्वियों सी हैं अटल ये पर्वतों की चोटियाँ

“तपस्वियों सी हैं अटल ये पवर्तों की चोटियाँ ये बर्फ़ की घुमरदार घेरदार घाटियाँ ध्वजा से ये खड़े हुए हैं वृक्ष देवदार के गलीचे ये गुलाब के, बगीचे ये बहार के ये किस कवि की कल्पना का चमत्कार है ये कौन चित्रकार है, ये कौन चित्रकार !! ” प्रकृति, हम

Read More

कितनी फीकी थी मैं, सिन्दूरी हो जाऊं… ओ सैंया…

जिनके घर कॉलोनी के नहीं, मोहल्लों और गली के नामों से पहचाने जाते हैं वही जान सकते हैं मुम्बई की चाल में रहने वालों का इश्क. इसे पहली बार फिल्म ‘कथा’ में देखा था, पड़ोसी से शक्कर, चाय-पत्ती माँगने के बहाने मिलने जाना भी बहुत रोमांटिक लगता था. कॉलोनी में

Read More

Bipolar Mood Disorder : बहुत ही कन्फ़्यूजिंग बीमारी

हम भारतीय बोलते बहुत हैं इसीलिए बचपन से ही हमें विशेषण सुनने की आदत पड़ जाती है…. अरे यह तो आलसी है, वह तो बहुत गुस्सैल है… फलां तो नवाबजादा है जब देखो तब गाड़ियों, लड़कियों पर पैसे फूंकता रहता है… वह लड़की देखो… अपने आप को मिस इंडिया समझती

Read More

बहुरुपिया और प्रतीक्षा का फल

एक ही कथानक पर दो कहानियां! दोनों में समानता और इस हद तक समानता कि शायद एक दूसरे का एक्सटेंशन कही जाए. हंस पत्रिका के इस अंक में कहानीकार प्रियदर्शन की कहानी ‘प्रतीक्षा का फल’ और जनवरी 2018 से समालोचन ब्लॉग पर उपस्थित कहानीकार राकेश बिहारी की कहानी ‘बहुरूपिया’, दोनों

Read More

लोगों से बाद में, शहर और उसकी हर चीज़ से पहले प्यार करिए…

जिस उम्र में मेरे साथ की लड़कियां जान लेती थीं कि उन्हें पढ़ लिखकर क्या बनना है… उनका राजकुमार कुमार कैसा होगा… उस उम्र में मुझे इतना पता था कि पढ़ाई कोई भी करूँ मेरा ठिकाना कोई पहाड़ी शहर होगा… जहां ख़ूब सारी किताबें होंगी और सामने खिड़की पर खुलते

Read More

मैं दीपक… तुम ज्योति…

दीपक अंधेरे में बैठता है… ज्योति ढिंढोरा पीट आती है दूर तलक…… कि वहाँ कोने में, अंधेरे में दीपक रखा है. जैसे चाँद सुन्दर इसलिये है कि चाँदनी खबर लाती है. दीपक को व्याकरण ने ‘पुल्लिंग’ रखा है, ज्योति को ‘स्त्रीलिंग’. वैसे ही चाँद भी ‘पुल्लिंग’ की कतार में खड़ा

Read More
error: Content is protected !!