मेकिंग इंडिया साप्ताहिकी

जीवन के सप्त रंग, मेकिंग इंडिया के संग

जीवन-लीला : कृष्ण तत्व का जन्मोत्सव

नायक से मिलने से पहले नायिका जीती थी मध्य मार्ग में… थोड़ा-थोड़ा, थोड़ा-सा प्यार, थोड़ी-सी नफ़रत, थोड़ी-सा जीवन, थोड़ी-सी मृत्यु… और आज? नायिका – आज अपनी परछाई बनाकर तुम मुझे

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मानो या ना मानो : साक्षात माँ काली से बातें करता है वह!

आठ साल बाद हरेन्द्र फिर से मेरी ज़िंदगी में अचानक से आ गया है. दो-तीन दिन पहले मुझसे मिलने ग्वालियर से दिल्ली आया था. पहली बार 2010 में एक मित्र

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मानो या ना मानो : वामांगी-उत्सव पुनर्जन्म एक प्रेमकथा

वामांगी, जिसका ज़िक्र पहले आता है उसके बाद आती है वह.. पैरों की ऊंगलियों के नाखून बढ़ाकर रखती है, लेकिन उस पर महावर नहीं होता, बाकी उसके महावर से रंगे

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Fritjof Capra, The TAO of PHYSICS के बहाने : तेरा तुझको अर्पण क्या लागे मेरा

सुबह जागी तो दो शब्द मुंह पर थे तन्मय और तल्लीन, और लगा कोई रचना इन दो शब्दों के आसपास बुनकर जागी हूँ। एमी माँ (अमृता प्रीतम) के अनुसार इसे

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मानो या ना मानो : बिल्वा से सद्गुरु बनने की तीन जन्मों की दास्तान

करीब चार सौ साल पहले की बात है। जिला रायगढ़ (मध्य-प्रदेश) में बिल्वा नाम का एक आदमी रहता था। ऊंची कदकाठी, गठीला बदन। जिंदगी से बहुत प्यार करने वाला बिल्वा

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बनारस : एक रहस्यमय आध्यात्मिक प्रेम कहानी

कुछ दिनों पहले फिल्म बनारस का अंत देखा, कुछ आधे एक घंटे की ही फिल्म देखी, कहानी ऐसी कि हर दृश्य पर आंसू निकलते रहे, दो कारणों से। पहला, बनारस

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मानो या ना मानो – 6 : अग्नि के मानस देवता

मानो या न मानो भाग-5 के आगे… चार साल बाद मिली उस ड्रेस को पहनने के बाद मैं खुद को कहीं की परी समझने लगी थी, उम्र को मैंने कभी

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मानो या ना मानो – 4 : पिता के अंतिम दर्शन

पिता की मृत्यु के बाद लिखे दो लेख- सत्य से मुंह फेर कर खुद को समेट समेट कर जीते रहने की आदत औरत में जन्म के साथ पड़ जाती है,

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रास्ते कभी बंद नहीं होते

मां बाप को बच्चों से ज़्यादा से ज़्यादा चाहिए, वो सब भी जो खुद कभी नहीं कर पाये। उम्मीद का पूरा टोकरा सिर पर लिए घूमते हैं आज के बच्चे।

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अलविदा पीड़ा के राजकुंवर नीरज

जीवन कटना था, कट गया अच्छा कटा, बुरा कटा यह तुम जानो मैं तो यह समझता हूँ कपड़ा पुराना एक फटना था, फट गया जीवन कटना था कट गया ‘जीवन’

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