मेकिंग इंडिया साप्ताहिकी

जीवन के सप्त रंग, मेकिंग इंडिया के संग
बब्बा, मैं जीवन सिखाती हूँ

बात दो तीन दिन पहले की है, जब मेकिंग इंडिया की पिछले वर्ष की यादें अपनी फेसबुक वाल पर शेयर करने के लिए जैसे ही वेबसाइट पर 14 तारीख पर गयी. तो एक बहुत खूबसूरत दृश्य देखा.

शुरू की दो ख़बरों में एक में मेरी तस्वीर थी एक में बब्बा (ओशो) की. मेरी तस्वीर वाले लेख का शीर्षक था, “जैसी हो वैसी ही आ जाओ, सिंगार को रहने दो“. और बब्बा की तस्वीर के साथ लेख का शीर्षक था “कभी कोई शिष्य उन ऊंचाइयों को पा लेता है, जहाँ से कोसों दूर रह जाता है गुरु भी” .

दोनों लेख में तस्वीरें ऐसे लगी थी जैसे हम एक दूसरे से बात कर रहे हों… अपने अंतिम धाम पहुँचने के लिए मैं यहाँ अध्यात्म का सिंगार करने में लगी हूँ और जैसे बब्बा कह रहे हैं, जैसी हो वैसी ही आ जाओ सिंगार को रहने दो….

न जाने क्यों यह लिखते लिखते ही आँखें भर आई, मुक्ति की प्यास अब अपने उत्कर्ष पर पहुँचने की कगार पर है, सांसारिक प्रपंच गले में उत्कंठा की तरह जम चुका है… जिम्मेदारियां पूरी किये बिना जा नहीं सकती, उधर बब्बा कहते हैं.. जैसी हो वैसी ही आ जाओ…

‘दो दुनिया’ … यह नाम मैंने अपने लेखन के शुरुआती दिनों में ही दे दिया था अपने ब्लॉग में, तब तो मैं जानती भी नहीं थी कि मुझे वाकई दो दुनिया जीनी होगी, यह तो बस मेरे मन का भाव था, जैसे हर इंसान को लगता है कि उसके बाहर की दुनिया अलग है और अन्दर की अलग… लगा ऐसा ही भाव होगा…

लेकिन इन दस सालों में जाना कि गुरुओं ने मिलकर सच में मुझे दूसरी दुनिया में खींच लिया है. मैं भक्ति के गीत गाती हूँ, उसे प्रियतम कहती हूँ, कान्हा कहती हूँ, राम कहती हूँ, शिव कहती हूँ, इश्क़ कहती हूँ, कभी श्री एम कहती हूँ, कभी बब्बा कहती हूँ… लोग उसे सांसारिक प्रेम से जोड़ लेते हैं… कितनों से इश्क़ है तुमको… मैं कहते कहते रुक जाती हूँ हर उस व्यक्ति से जिसमें मुझे उस परमात्मा की झलक दिखाई देती है… और मैं उससे गुज़र कर पार हो जाती हूँ… जान पाती हूँ जिसे दुनिया आकर्षण कहती है, मोह कहती है, माया कहती है, प्रेम कहती है… वह तो सिर्फ रास्ता है… उस परम तक पहुँचने का जिसकी झलक जब एक बार कोई पा ले तो वह इस दुनिया का नहीं रह जाता…

और फिर कोई आकर मुझसे कह जाता है…

आप बहुत उच्च भूमि पर सहज ही चढ़ जाती हैं।
यही नहीं, वहाँ खींचकर दूसरों को भी ले जाती है।

तो कोई कहता है … प्रणाम माँ, अभी मैं आपके लिखे लेख  चरित्रहीन 2 & 3 पढ़ रही थी, पता नहीं क्यों आंसू आ गए, मन भर आया पढ़ते पढ़ते। बहुत बार होता है ऐसा ही।

निरंतर अनगिनत मनोभावों को आप शब्द देती हैं, ऐसे भी जिनके बारे में पता ही नहीं होता कि ऐसा भी कुछ है अंदर। उसको बाहर ले आती हैं। सब कुछ इतना व्यापक लगने लगता है कि सोच को भी नए आयाम मिलते हैं। जो हम एक ही लीक पर सोचते चले जाते हैं वो एक ही झटके में टूट जाता है। इस दुनियादारी में रहते हुए, सब कुछ निभाते हुए भी कोई इतने आयामों में जी सकता है, दूसरों को प्रेरित कर सकता है, राह दिखा सकता है, ये आपको देख कर ही विश्वास होता है, नहीं तो विश्वास करना भी कठिन है।

मेरा सौभाग्य है कि मैं आपसे जुड़ी, आपसे बातें कर सकती हूँ, कुछ भी मन में आए आपसे शेयर कर सकती हूँ, जो मैं किसी से नहीं कर सकती, वो भी।

और कुछ समझ नहीं आ रहा, बस आभार स्वीकार करें… प्रणाम …

और एक ने कहा… ‘माँ अनोखी जीवन शैफाली’… पता है क्यों? .. क्योंकि एक अजीब सा एहसास मुझे आपसे मिल रहा है बहुत अजीब और बहुत ही अद्भुत अद्वितीय अवर्णीय…

आप का मेरा कोई रिश्ता नहीं है पर जैसे रिश्ते की कोई ज़रूरत नहीं है, कुछ अजीब सी चीज़ है जो शायद रिश्ते से ऊपर है, कोई आप को दीदी या माँ या दोस्त कुछ भी कहता होगा, मैं तो कुछ नहीं कहता, रिश्ते के किसी एक शब्द से आपसे जुड़ना अधूरा है, सभी रिश्तों से जुड़कर भी कुछ अधूरा है या कुछ अलग है.

आप को मैंने हर दम ऐसे महसूस किया है कि जैसे इस अंनत ब्रह्मांड में एक सितारा है आप, जो अपनी मस्ती में चमक रहा है, मुस्कुरा रहा है या कोई उपवन में कोई फूल अपनी सम्पूर्ण ऊर्जा के साथ खिला हुआ है उस फूल से या उस सितारे से आप का कौन सा रिश्ता हो सकता है? कोई नहीं? रिश्ता अधूरे की निशानी है क्योंकि वो सीमित है, बस दो अस्तित्व जो एक दूसरे को देख के मुस्कुराते हैं, दोनों अस्तित्व अपनी मस्ती में चैतन्य है..

बस अपनी इस तस्वीर के लिए जो शब्द मुझे नहीं मिल रहे थे जैसे वो मिल गए… इसलिए जब कहती हूँ आप सबका प्रेम ही इस पत्थर में प्राण प्रतिष्ठा कर रहा है, … वर्ना मैं भी बस अवगुणों से भरी एक हाड़ मांस का पिंजर थी, आप ही है जो मुझे ‘जीवन’ दे रहे हैं,… तो बिलकुल हृदय के अन्दर से उपजे भाव होते हैं…

“बस दो अस्तित्व जो एक दूसरे को देख के मुस्कुराते हैं, दोनों अस्तित्व अपनी मस्ती में चैतन्य है…”

और फिर पिछले जन्म के एक पुत्र ने जिसे इस जन्म में भी मुझे पहचान लिया, ने एक सन्देश भेजा…

प्रारब्ध फलित होने के लिये, पूरी प्रकृति हाथ बँटाती है। पुरुषार्थ और उद्यम है – तैराकी, धारा के विपरीत। फिर कोई साथ न देगा। प्रकृति भी अपने तरीके से तोड़ने की कोशिश करेगी। आस पास सब सुर विरोध के उठ खड़े होंगे। विरोध की कौरव सेना खड़ी होगी सामने, पर मैं अपने कृष्ण को साक्षी रख उठाऊँगा गांडीव। आपने जीवन के हर पहलू को देखा, जिया, लिखा भी, कहा भी। सब जगह पहुँचती होंगी आपकी बातें, कभी लेख कभी वीडियो के माध्यम से। पर मुझ तक पहुँचती है – मेरी “माँ” मन्नतों वाली। ठीक वैसे ही जैसे आप कहती हैं – ज्योतिर्मय, “मन्नतों वाला बेटा”। मैं कहता हूँ – मन्नतों वाली माँ – मेरे हरेक जन्म में मेरे जीवन की साक्षी। माँ तुमने इस बार भी जीवन दिया, हर बार की तरह। यहाँ लिख रहा हूँ, वहाँ सामने फेसबुक वॉल पर भी लिख सकता था। पर “प्रेम” कई बार ऐसे भी संवाद करता है – छिपकर। मुझे आशीष दो माँ, धारा अनुकूल हो या प्रतिकूल मैं तुम्हें जीवन सौंप सकूँ। तुमने ही तो दिया है, जो कुछ भी मेरे पास है, मेरा कहलाने लायक। मेरी मन्नतों वाली माँ…..

इससे अधिक कुछ कहने का भाव नहीं… बब्बा से बस इतना ही कहूंगी कि जैसी हूँ वैसी ही चली आऊँगी लेकिन तुमने जो कहा था कि “मैं मृत्यु सिखाता हूँ” तो तुम्हारा वो अधूरा काम ज़रा पूरा कर लूं… कि बब्बा, मैं जीवन सिखाती हूँ… जिस दिन तुम्हें लगे कि “कभी कोई शिष्य उन ऊंचाइयों को पा लेता है, जहाँ से कोसों दूर रह जाता है गुरु भी”. तब बुला लेना.

तुम्हारी ऊंचाई तक पहुँचने के लिए मेरी अभी बहुत कठिन यात्रा बाकी है, और तुमसे ऊपर नहीं जाना है… बस जिस दिन लगेगा तुम्हारा मुझको दिया नाम सार्थक हुआ और मैं लोगों को जीवन-ऊर्जा देने में सफल हुई उस दिन जीवन की इस खिड़की से कूद कर आ जाऊंगी… जैसी हूँ वैसी ही आ जाऊंगी… ना सांसारिक, ना आध्यात्मिक कैसा भी सिंगार नहीं करूंगी…

आज तुम्हारे मृत्यु उत्सव के दिन देखो मैंने वीडियो भी सिंगार की बात करते हुए बनाया है… सिखा दो यह गीत सबको कि लोग कह सके… जैसी हो वैसी ही आ जाओ, सिंगार को रहने दो”….

– माँ जीवन शैफाली

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