मेकिंग इंडिया साप्ताहिकी

जीवन के सप्त रंग, मेकिंग इंडिया के संग
जिसका कोई नहीं है उसके ‘गणपति बप्पा’ हैं

गणेश चतुर्थी के त्यौहार को समग्र राष्ट्र हर्सोल्लास के साथ मना रहा है। सारे महाराष्ट्र में इस त्यौहार को मानने के लिये “गणेश मंडल” बने हुये हैं जो उत्सव से पहले धनराशि इक्कठी कर के अपने गली मोहल्ले में भव्य पंडाल लगाते हैं जिसमे गणेश चतुर्थी का भव्य आयोजन किया जाता है।

पुणे में ऐसा ही एक मंडल है जो बीते 56 वर्ष से गणेश चतुर्थी पर पंडाल लगा कर आयोजन कर रहा है।

“नवशक्ति मित्र मंडल” के कई सक्रिय सदस्य हैं और हर वर्ष इनके लागये हुये पंडाल की भव्यता अलग ही चमकती है।

तस्वीर एक अनाथ युवक सतीश की है जिसकी मां का निधन हो गया था जब वह मात्र 5 वर्ष का था। पिता ने पाल पोस के बड़ा किया पर दुर्भाग्यवश चार साल पहले पिता भी चल बसे। सतीश नवशक्ति मित्र मंडल का एक सक्रिय सदस्य है।

बीते दिनों सतीश अपने घर में साफ सफाई कर रहा था कि अचानक एक भारी वस्तु उस सर पर आ गिरी। सतीश के सर से लहू बहने लगा। बेसुध सतीश फर्श पर पड़ा तड़प था था कि पड़ोस के किसी व्यक्ति ने उसे देख लिया। तत्क्षण उसे उठा कर साथ के हॉस्पिटल ले जाया गया। डॉक्टर्स ने एमआरआई किया तो पता चला के घाव गहरा है और सर्जरी करना आवश्यक है।

सर्जरी पर कुल खर्च 450000 का था और हालात यह थे कि अनाथ सतीश का अता पता लेने वाला भी कोई मौजूद नहीं था। इसी बीच बात नवशक्ति मित्र मंडल तक पहुंची और उन्हें पता लगा के उनका एक साथी जीवन और मृत्यु के बीच झूझ रहा है।

मंडल के प्रधान विकास नावडकर उसी समय हॉस्पिटल पहुंचे। डॉक्टर्स से बात की और अगले आध घँटे में सतीश के ऑपरेशन पर लगने वाली सारी रकम डॉक्टर्स के हाथ में थमा दी।

ऑपरेशन हुआ और सतीश जीवित बच गया। नवशक्ति मित्र मंडल के सदस्य अपने जिगरी को मौत के मुँह में से खींच लाये।

नवशक्ति मित्र मंडल का पंडाल लगा परन्तु इस बार ना तो पंडाल में वह भव्यता थी और पंडाल गक्त वर्ष के मुकाबले 1/4 वर्ग में भी नहीं था। ऐसा 56 वर्ष में पहली बार हुआ था के मंडल का आयोजन इतना फीका था।

परंतु इस फीके आयोजन के पीछे की वजह सामने आई तो लगभग सभी ने प्रधान और मंडली को झुक कर नमन किया।

आयोजन में एकत्रित लगभग सारी धनराशि सतीश के ऑपरेशन के लिये दे दी गयी थी।

प्रधान नावडकर ने एक स्थानीय अखबार के पत्रकार से कहा –

“आयोजन तो हर वर्ष होगा पर जीवन तो एक बार मिलता है। हम अपने जिगरी दोस्त को खोना नहीं चाहते थे। उसके मां बाप नहीं हैं परन्तु जिसका कोई नहीं है उसके “गणपति बप्पा” हैं”

पंडाल भव्य नहीं है मानवता से ओतप्रोत जिस भव्य सोच का उदाहरण नवशक्ति मित्र मंडली दिया है वह अतुलनीय और अनुकरणीय है।

गणपति बप्पा को भी अपने इन बच्चों पर नाज़ होगा। इस त्यौहार पर मानवता से प्रेरित सोच ने उपहारस्वरूप एक अनाथ को उसका जीवन भेंट कर दिया है।

रचित सतीजा

मानो या न मानो : सिर्फ़ सोचने भर से सब हो जाता है

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