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नाग लोक का रहस्य – 5 : Totem & Tattoo

टोटेमवाद (गणचिह्नवाद) को सामान्यतः धर्म और समाज दोनों ही के लिए एक प्राचीन प्रणाली के रूप में व्यवहार में लाया गया. धर्म की प्रणाली के रूप में, यह आदिम मनुष्य के अपने टोटेम के साथ रहस्यमयी संबंध को दर्शाता है एवं समाज की प्रणाली के रुप में यह उस संबंध को दर्शाता है जिसमें समान टोटेम के महिला और पुरुष एक दूसरे के लिए तथा दूसरे टोटेमगण के समूहों के सदस्यों की मदद के लिए सदैव खड़े रहते हैं.

क्या दोनों पक्ष, धार्मिक और सामाजिक, हमेशा एक साथ अस्तित्व में रहे हैं, या अनिवार्य रूप से स्वतंत्र, यह एक प्रश्न सदैव उठता रहा जिसके विभिन्न उत्तर मिलते रहे हैं. कुछ लेखकों उदाहरण के लिए, John Lubbock और Herbert Spencer का मानना है कि टोटेमवाद समाज की एक प्रणाली के रूप में प्रारंभ हुआ, और उससे जुड़े अंधविश्वास गलतफहमी की एक सरल प्रक्रिया के माध्यम से विकसित हुए.

कुछ दूसरे लेखक जैसे J F Mclennan और Robertson Smith का मानना है कि टोटेम की धार्मिक आस्था मौलिक है जिसके कारण ही बहिर्विवाह से परिचय प्रारंभ हुआ. आदिम समाज टोटेमगण(टोटेमिस्टिक) समूहों का एक नेटवर्क था और उनमें से प्रत्येक के पास एक जानवर या पौधा प्रतीक के रुप में हुआ करता था. और समय के साथ ये टोटेमिस्टिक समूह अपने टोटेम के नाम से पुकारे जाने लगे.

उदाहरणार्थ, भारत में ये टोटेमिस्टिक समूह कभी वानर (बंदर वंश) के, कभी अज (बकरी वंश), वृष्णि (Vrshnis) (कृष्ण वंश), गरुड़ (चील वंश), मत्स्य (मछली वंश) और नाग (सर्प वंश) के रुप में मिलते रहे. अतः नागों को नाग से जोड़ते हुए सर्प वंश का माना जा सकता है, इसलिए उनके मुकुट और झंडे इत्यादि पर सर्प का चिह्न देखने को मिलता है.

R. K. Sharma की पुस्तक Nagas : The Tribe and The Cult में जिस तरह से नागों का उद्भव और उसका समाज और धर्म से सम्बन्ध बताया गया है वह सिर्फ प्राप्त जानकारियों पर आधारित सा लगता है. इतिहास प्रमाण मांगता है, अनुमान लगाकर हम प्राप्त जानकारियों को भी अपने अनुसार ढाल सकते हैं.

आज की तारीख में जब हम आधुनिक सन्दर्भ में टैटू को देखेंगे तो हमें पता चलेगा कि एक विशेष तरह की डिज़ाइन ही क्यों टैटू बनवाने के लिए प्रसिद्ध है. कुछ प्रयोग होते भी हैं तो वह उसी के आसपास के होते हैं. यानी कहीं न कहीं मनुष्य के मस्तिष्क में प्राप्त डिज़ाइन के अलावा उससे जुड़ाव भी दीखता है.

स्थूल प्रमाण न भी मिले तो भी बहुत सूक्ष्म प्रमाण यह सिद्ध करते हैं कि जब कोई वस्तु धार्मिक मार्ग से समाज में ग्रहण की जाती है तो उसका प्रभाव सदियों तक बना रहता है. उस डिज़ाइन का अर्थ और उसका उसी तरह का होना हमारे जीवन में क्या प्रभाव डालता है यह शायद आगे के अध्याय में मिले परन्तु इस समय मुझे यह अधिक महत्वपूर्ण लगता है कि हमने सामाजिक परम्पराओं को धार्मिक चोला पहनकर उसे सदियों के लिए जीवंत कर दिया…

तो Totem का Tattoo बन जाना उतना ही स्वाभाविक है जैसे किसी धार्मिक प्रथा का सामाजिक परंपरा के रूप में स्वीकार किया जाना.

अगले अंक में हम पुराण में नागों के उल्लेख के बारे में जानेंगे.

– माँ जीवन शैफाली

नाग लोक का रहस्य – 4 : उद्गम और टोटेमवाद

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