मेकिंग इंडिया साप्ताहिकी

जीवन के सप्त रंग, मेकिंग इंडिया के संग
नाग लोक का रहस्य – 1

बहुत छोटी थी जब श्रीदेवी की नगीना फिल्म आई थी, और मैं उस फिल्म से इतनी प्रभावित हुई थी कि दर्पण के सामने खड़े होकर दिन भर ‘मैं तेरी दुश्मन, दुश्मन तू मेरा, मैं नागिन तू सपेरा’ पर नृत्य करती रहती थी. श्रीदेवी की भाव भंगिमाओं की हूबहू नक़ल उतारने का प्रयास करती थी. उन दिनों फिर टीवी पर रीना रॉय की नागिन फिल्म भी देखी थी, उस फिल्म का भी मुझ पर काफी गहरा असर रहा.

मुझे इस बात पर विश्वास हो गया था कि सच में इच्छाधारी नाग नागिन होते हैं. और ऐसी कोई मणि भी अवश्य होती है, जिसे जादुई मणि कहा जाता है. क्योंकि समाज में यदि किसी काल्पनिक कहानी पर फिल्म बन रही है तो सबसे बड़ा सवाल यह आता है कि मनुष्य के मस्तिष्क में यह कल्पना आई कहाँ से? कहीं तो उसका अस्तित्व रहा होगा, वर्ना कैसे ऐसी किंवदंतियाँ प्रकट होती हैं, बावजूद इसके कि मैं प्रत्यक्ष तौर पर बहुत बड़ी नास्तिक थी, भूत प्रेत, बाबाओं, ज्योतिषियों और पूजा पाठ कर्मकांड का मखौल उड़ाया करती थी. विद्रोही भी थी तो बाजू में हरसिद्धि माता का मंदिर था वहां पीरियड्स के दिनों में भी चले जाया करती थी.

लेकिन इसलिए नहीं कि मुझे समाज का कोई नियम तोड़ना था, या मैं इतनी कम उम्र में नारीवादी शब्द का अर्थ जानती थी. बस मन में एक गहन भाव था कि यह मेरी माँ है, और कौन माँ अपनी बच्ची को पीरियड्स के दिनों में अपने से दूर रखने का सोचेगी. इसीलिए मैंने जीवन में कभी ऋषि पंचमी का व्रत भी नहीं रखा जबकि मेरे साथ की सभी बहनों को यह व्रत रखते देखा है. कहते हैं रजस्वला होने पर हुई छुआछूत के पाप से मुक्ति के लिए यह व्रत रखा जाता है, और मेरा विद्रोह यह कि जिस क्रिया के कारण तुम हमें माँ होने का सौभाग्य देते हो उस शारीरिक क्रिया को इतनी घृणित क्यों मानूं.

कहते हैं हर मनुष्य अपनी यौवनावस्था में कम्युनिस्ट होता है. लेकिन मैं इस मामले में भी खुद को अपवाद मानती हूँ. नास्तिक होने के बावजूद मेरी इस बात पर गहन आस्था थी कि कोई तो निराकार है जिसका आशीर्वाद सदैव मनुष्य के सर पर रहता है. यानी सामजिक रूप से कहे जाने वाले नास्तिक शब्द के विपरीत चेतना के स्तर पर मैं बहुत बड़ी आस्तिक थी. बस उसे प्रकट करने का रास्ता मुझे नहीं मिल रहा था.

चेतना में कुछ ऐसा दबा पड़ा था जिसका संकेत मुझे जब तब प्रकाश की हल्की किरण के रूप में मिलता रहता था लेकिन यह किरण कहाँ से आ रही है उसे खोजने की उत्कंठा लिए मैंने जीवन के 34 वर्ष निकाल दिए. परिस्थतियों ने भी जैसे हथौड़ी मार मार कर मुझ पत्थर के अन्दर की मूर्ति प्रकट करने के लिए पूरा ज़ोर लगाया. मैं हर वार के साथ टूटती चली गयी. यह टूटना ऊपरी तल पर बहुत पीड़ा दायक होता है. जीवन निरर्थक मालूम पड़ने लगता है. खुद को समाज की भीड़ से अलग होते देखना एक तरफ सुखद अनुभव देता है तो दूसरी तरफ लांछनों की बौछारों से मन उद्वेलित भी होता है.

और ऐसा नहीं कि यह सिर्फ मेरे साथ हुआ हो, हर व्यक्ति की अपनी यात्रा होती है बस कुछ लोग उस हथौड़ी की मार को समझ नहीं पाते और और टूटन की मिट्टी से बने दलदल में धंसते चले जाते हैं, कुछ लोगों को गुरू की विशेष कृपा प्राप्त होती है और वे अपनी मूर्ति का प्रकट होना देख पाते हैं. और एक आस्था और विश्वास जागृत होता है कि कहीं कुछ तो ऐसा है जो प्रकट होने को आतुर है. वह क्या है भले उस समय न जान पाए.

तो आज की तारीख में भी वह प्रक्रिया जारी है. लेकिन बस अंतर इतना आया है कि मूर्ति का प्रकट होना अब मैं देख पा रही हूँ, और देख पा रही हूँ अस्तित्व के हाथों में उस छैनी को जो इस मूर्ति को तराशने के लिए मुझ पर चल रही है. दर्द आज भी होता है, लेकिन अब यह दर्द वैसा दुखदायी नहीं होता, एक सुख और संतुष्टि देता है कि मानव योनी में जन्म लेना सार्थक हुआ. मूर्ति अपने पूरे वर्चस्व के साथ प्रकट होने को है… ताकि इस मूर्त के माध्यम से जो अमूर्त है वह प्रकट हो सके.

इसलिए मूर्ति प्रकट हो जाने पर भी यात्रा ख़त्म नहीं होगी, अभी तो मूर्त से अमूर्त के प्रकट होने के लिए भी बहुत लम्बी यात्रा बाकी है. ताकि उस क्षण तक पहुँच सकूं जब अपने बचपन में मेरे मस्तिष्क में उपजे उस विचार की पुष्टि हो जाए कि कुछ तो निराकार है जिसका मनुष्य के सर पर आशीर्वाद होता है, जिस विचार ने उम्र के इस पड़ाव पर आकर यह भाव उपजाया है कि बस अब उस निराकार में विलीन हो जाना ही इस जीवन का अंतिम उद्देश्य है.

बचपन में मस्तिष्क में उपजा एक छोटा सा विचार अपनी यात्रा के साथ आपको किस स्तर पर पहुंचा देता है इस पूरी फिल्म को आज जब दोबारा देखती हूँ तो अस्तित्व के प्रति अहोभाव से भर जाती हूँ, कि जीवन की एक भी घटना तो ऐसी नहीं थी जो मेरी मुक्ति की तैयारी के लिए न की गयी हो. उस समय भले समझ न आये, उस समय हम भले भाग्य को कोसें, समाज के प्रति विद्रोह से भर जाएं, अपनों से दूर होते चले जाएं, लेकिन समय आने पर नेपथ्य में हमारे ऊपर काम कर रहे लोग किसी न किसी रूप में प्रकट हो ही जाते हैं.

तो बात शुरू की थी नगीना फिल्म से कि बचपन में उस फिल्म का ख़ासा प्रभाव मुझ पर रहा, और समय के साथ यह प्रभाव इतना गहन हुआ कि मुझे यह अनुभूति देता है कि किसी न किसी जन्म में मैं इस नाग लोक का हिस्सा अवश्य रही हूँ. और अस्तित्व की योजना देखिये कि जब पहली बार मुझे अनुवाद का काम मिला तो इसी नाग लोक पर लिखी किसी की थीसिस के अनुवाद का काम मिला.

कुछ आठ नौ साल पहले मैंने R. K. Sharma की पुस्तक Nagas : The Tribe and The Cult पुस्तक के कुछ अंश का हिन्दी अनुवाद किया था. इन कुछ वर्षों में वह मन की परतों में दबा रहा, क्योंकि इसका अनुवाद करते हुए भी कई चीज़ें मुझे समझ नहीं आई थी, लेकिन अब यह अनुभव होता है कि जब मैं अपने ही अनुवादित कार्य को दोबारा पढूंगी और उसे इन बीते वर्षों के अनुभवों के प्रकाश में देखूंगी तो कई रहस्य उजागर होंगे, चेतना की कई परतें खुलेंगी. हालाँकि यह सिर्फ प्रारम्भिक विचार है, और भविष्य में इस पर क्या लिखना है मुझे यह तक नहीं पता. लेकिन जैसा कि मैंने प्रारम्भ में ही लिख दिया था कि ” समाज में यदि किसी काल्पनिक कहानी पर फिल्म बन रही है तो सबसे बड़ा सवाल यह आता है कि मनुष्य के मस्तिष्क में यह कल्पना आई कहाँ से? ”

तो मेरे मस्तिष्क में भी यह विचार उत्पन्न हुआ है तो अस्तित्व ने भविष्य के पन्नों पर कहीं न कहीं मेरे शब्दों और अनुभवों को दर्ज कर दिया है. तभी तो मैं कहती हूँ, वर्तमान और कुछ नहीं, भविष्य की वह झलकियाँ हैं, जिसके Flash Back में हम जी रहे हैं.

क्रमश:
– माँ जीवन शैफाली

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