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नाग लोक का रहस्य – 4 : उद्गम और टोटेमवाद

पिछली तीन श्रृंखला मेरे अनुभवों और गुरुओं से प्राप्त ज्ञान का लेखा जोखा है, जो मुझे नाग लोक के रहस्य को जानने के लिए जिज्ञासु बनाते हैं. पिछली श्रृंखला में आध्यात्मिक गुरु श्री एम द्वारा उद्घाटित कई रहस्यमयी घटनाओं को पाठकों ने सिरे से ख़ारिज कर दिया, जो अपेक्षित था. लेकिन जब आप नाग लोक को अस्वीकार करते हैं तो हमारी आकाश पाताल लोक की अवधारणा को भी अस्वीकार करना होगा जबकि उसके कई प्रत्यक्ष प्रमाण मिलते रहते हैं.

आकाश लोक के रहस्य को जानने के लिए हमारे विज्ञान ने तो न जाने कितने सैटेलाइट भेजे हैं, और स्टीफन हॉकिंग ने तो यहाँ तक कह दिया था कि एलियन के संकेतों का जवाब देना छोड़ दो वर्ना वह पृथ्वी का बहुत नुकसान भी कर सकते हैं. यानी उन्हें पता था कि पृथ्वी के अलावा भी किसी और ग्रह पर जीवन है, और जब तक उनको हम पहचान नहीं लेते तब तक वे हमारे लिए एलियन ही है. और पाताल लोक के तो कई प्रमाण हम अपने धर्मग्रंथों में प्राप्त करते ही हैं.

जब तक हम चाँद पर नहीं पहुँच गए थे तब तक वह हमारे लिए चमत्कार ही था, आज भी जब तक इन रहस्यों को जान नहीं लेते तब तक यह हमारे लिए जादू ही है और जैसा कि मैं हमेशा कहती हूँ जादू उसी को दिखाई देता है जिसे इस जादू पर आस्था हो. हर बात तर्क, तकनीकी प्रमाण से नहीं समझा सकता. कई बातें हमारी बुद्धि से प्राप्त ज्ञान से कई गुना बड़ी और हमारी सोच की संभावनाओं के परे हैं, जिसे आप सांसारिक बुद्धि और ज्ञान से समझ ही नहीं सकते. और जिन्हें समझना नहीं उसी रहस्य में घुलकर बस जिज्ञासुओं के लिए संकेत छोड़ जाना है, उसे मेरी तरह अज्ञानी हो जाना पड़ता है.

तो इस अज्ञानी ने जो कुछ भी अध्ययन किया और उस अध्ययन के आठ वर्ष बाद दोबारा उसे नए परिपेक्ष्य में जानने की जिज्ञासा जागी तो वह खुद प्रतीक्षा में बैठी है कि अबकी दोबारा लेखन से कौन सा नया जादू प्रकट होने वाला है.
तो इस भाग में अपने उस अनुवाद कार्य को मैं दोबारा पढ़कर और अपनी सीमित बुद्धि से समझकर कुछ असीमित संभावनाओं के प्रकट होने की प्रतीक्षा कर रही हूँ.

(Nagas : The Tribe and The Cult (R. K. Sharma) पुस्तक का हिन्दी अनुवाद)

नाग एक संस्कृत शब्द है जिसका अर्थ होता है सर्प. इसका अर्थ ‘पहाड़ी’ या ‘पर्वत’ भी होता है. चूंकि आदिमानव पहाड़ों की प्राकृतिक कंदराओं और गुफाओं में रहते थे, इसलिए ये अनुमान है कि ऐसे स्थानों पर निवास करनेवालों को ‘नाग’ कहा गया.

प्राचीन कबीले के लोग कपड़ों का उपयोग नहीं करते थे एवं नग्न रहते थे. इसलिए इसका एक अर्थ ‘नग्न’ भी निकाला गया. इसका एक अर्थ हाथी भी हो सकता है, लेकिन इस जानवर का मानव से इतना अधिक संबंध नहीं दिखता जितना नाग से दिखता है, जिसके पीछे इसका नाम रखना अधिक न्यायोचित लगा.

इसका और अधिक स्पष्टीकरण नाग की पूजा करनेवाले संप्रदाय में मिलता है. ये संप्रदाय प्राचीन भारत में व्यापक रुप से फैली हुई थी. प्राप्त प्रमाण के अनुसार यह निःसंदेह एक वैश्विक संप्रदाय है.

भारत का प्राचीनतम साहित्य वेद, आर्य और दस्यु में विरोध दर्शाते हुए दस्यु का सर्प(नाग) से संबंध जोड़ते हैं. वैदिक काल उपरांत के प्राचीन संस्कृत साहित्य में नागों को अन्य अर्ध दिव्य मानव जैसे किन्नर, गंधर्व, यक्ष आदि की तरह आधे आदमी और आधे सर्प वाले शरीर के अर्ध दिव्य मानव वर्ग में रखा गया.

इन्हें निचले क्षेत्रों के विलासी शहरों में अपनी सुंदर एवं आकर्षक सहचर्या के साथ पूर्ण विलास और सांसारिक सुख भोगते हुए खूब धनी संप्रदाय के रुप में भी वर्णित किया गया है.

इन्हें स्वर्ग में ईश्वर की सेवा करने वाले गणों में भी रखा गया है. इन सब के साथ-साथ इन्हें देश के विभिन्न भागों में रहनेवाले मानव के रुप में भी वर्णित किया गया है.

पुराण नीचे की दुनिया को सात भागों में विभाजित करता है जिनमें से पहले चार पर दैत्य या दानव का अधिकार था और बाकी पर नागों का. सबसे निचले क्षेत्र को विष्णु पुराण और पद्म पुराण में स्पष्ट रुप से चित्रित किया गया है. पाताल के अस्तित्व के कई स्पष्टीकरण भी मिले हैं.

वास्तव में, नागों को, नाग(सर्प) को एक टोटेम के रूप में माननेवाले टोटेमिस्टिक लोगों के रुप में देखा गया है. TOTEM शब्द उत्तरी अमेरिका में सुपीरियर झील के निकट रहने वाले Algonkin वंश के Ojibwa जनजाति की भाषा में उपयोग होता है.

यह उस कबीले के प्रतीक या उपकरण के रूप में कार्य करता है जिसके द्वारा इसे अन्य इस तरह के कबीले से प्रथक किया जाता है. टोटेम के लिए प्रतीक के रूप में कई प्राकृतिक वास्तु और प्राणी को लिया गया जैसे जानवरों में भेड़िया, भालू, मछली, साँप, पक्षी, सब्जियों में मकई आलू, तंबाकू के पौधे, इसके अलावा सूर्य, पृथ्वी, रेत, नमक, समुद्र, बर्फ, पानी, बारिश आदि प्राकृतिक वस्तु.

टोटेम की प्रकृति का वर्णन करते हुए जे.जी. फ्रेज़र कहते हैं: “टोटेम प्राकृतिक घटनाओं या सामग्री के वर्ग का होता है. एक वस्तु सामान्यतः जानवरों या पौधों की एक प्रजाति- जिसके बीच खुद असभ्य मनुष्य का मानना है कि एक निश्चित अंतरंग संबंध स्थित है.

इस संबंध की सही प्रकृति पता लगाना आसान नहीं है, विभिन्न व्याख्याओं का सुझाव दिया गया है, लेकिन कोई भी अभी तक सार्वजनिक स्वीकृति प्राप्त नहीं कर सका है, जो कुछ भी हो, वह असभ्य मनुष्य को अपने टोटेम यदि वह एक जानवर या पौधा है, को मारने या खाने से रोकती है.

इसके अलावा टोटेमीगण के सदस्य जिनका जीवन किसी टोटेम के साथ रहस्यमय रूप से गुंथा हुआ होता है, उस टोटेम के नाम से जाने जाते हैं और आपस में रक्तसंबध मानते हैं और इस कारण उनका परस्पर विवाह या सहवास सख्त रुप से वर्जित होता है. आम तौर पर इस समूह के भीतर विवाह निषेध को बहिर्विवाह के नाम से बुलाया जाता है.

इस टोटेम का सामाजिक और धार्मिक महत्त्व हम वर्तमान के हिन्दू समाज की जाति, प्रजाति या गौत्र के माध्यम से अगले अंक में समझेंगे. और साथ ही समझेंगे TOTEM का TATTOO हो जाना.

– माँ जीवन शैफाली

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