मेकिंग इंडिया साप्ताहिकी

जीवन के सप्त रंग, मेकिंग इंडिया के संग
नायिका – 22 : आज की रात बचेंगे तो सहर देखेंगे…

फिर कल रात 12 बजे तक भांजे के साथ बैठा रहा। ऊपर गया तो साहिर ने आवाज़ दे दी, उन्हें साथ ले कर लेटा। पहला पेज खोलते ही खरीदने की तारीख़ पर नज़र गयी – 24 -09 1989! सिर्फ 14 साल 5 महीने और 5 दिन की थी! किस बात पर डांट पड़ी थी इस तारीख़ को या कोई और चोट? एक उत्सुकता – किस पाँव के पन्जे पर, ऊपर या नीचे, या पंजे के आसपास तिल है?

सबसे छोटी बहन के लड़के को बुखार है, राखी बांधने नहीं आयेगी – ये खबर सुबह नीचे आते ही अम्मा ने दी। मैं गया उसके घर, जब वापस आने लगा – ‘क्या बात है, बड़े खोये खोये हो? सब कह रहे हैं कि आज बड़ी सुन्दर लग रही हूँ!’

आँख भर के उसे देख, – कब नहीं लगती हो?

घर आया तो इंदौर वाली जीजी का फोन और राखी आ चुकी थी, लगा आपके शहर में सांस ले रहा हूँ।

शाम को कहीं से आ रहा था। रास्ते में देवी का एक प्राचीन मंदिर पड़ता है। कभी इस किस्म के देवी देवताओं को नहीं माना या पूजा या पुकारा, जान पर आ बनी तब भी। ये क्या कर दिया मुझे, सर झुका और कुछ फरियाद सी मन में गूंजी। क्या है ये, क्यूं हुआ ऐसा, मैंने तो नहीं झुकाया था सिर? कौन है जो ये सब करवा रहा है।

कल भी सारे दिन खाना नहीं खाया था, सीधे रात में खाया और आज भी, अभी खा ही रहा हूँ।

– विलुप्त स्मृति
16 Aug 2008 at 9:53 pm

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आज सबसे बड़ी बहन का जन्मदिन है। जिस साल जन्म हुआ था उस साल राखी थी। पूछ लिया कि कोई खास फरमाइश या मैं ही कुछ ला दूं? कल ही तो राखी गुज़री है भाई पर, शायद ये सोच कर कह दिया – जो तुम्हारी इच्छा।

सरल भाषा में इसका अर्थ हुआ कि ले आओ कोई किताब। ये बहुत मुश्किल घड़ियाँ होती हैं मेरे लिये, जब किताबों के बीच खड़ा होता हूँ, हर किताब पुकारती है, मैं किसी को अनसुना नहीं कर पाता, पर अक्सर अनसुना करना पड़ता है, किताबें भी सोचती होंगी कि कितना मग़रूर है, पर शायद कुछ पुरानी किताबें उन्हें बता देती होंगी कि नहीं पॉकेट से मजबूर है।

बहन के लिये ली, “औरत होने की सज़ा”, पैसे दिये और अपनी पीठ ठोकते हुये बाहर… कि पुकार अनसुनी करने में सफल रहा और अपने लिये कुछ नहीं लिया।

“भैया, ऐसी भी क्या जल्दी, इतने दिनों बाद आये, चाय तो पी लेते और ये आपकी गाड़ी की चाभी”, पलट कर देखा तो उनके हाथ में चाभी थी…

और मेरी नज़र उनके सर के ऊपर, शेल्फ से झाँक रहे सरदारजी पर। सरदार खुशवंत सिंह, ‘सच, प्यार और थोड़ी सी शरारत, उनकी आत्मकथा है।

वापसी के सारे रास्ते, खुद पर भुनभुनाता आया, ‘तुम नहीं सुधारोगे।’

परसों और कल की तरह आज भी खाना नहीं खाया, भूख तो रात को भी नहीं लगती पर क्या करूं, सोमवार दोपहर एक बजे तक ज़िन्दा भी तो रहना है । तो लंच कल 1 बजे, इसी जगह…

V
17 Aug 2008 at 6:38 pm

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अकेला होता तो क्या ये किताब ही लेता सबसे बड़ी बहन के लिये? नहीं मालूम।

आज चार बार जाना पड़ा, पर हर बार उस प्राचीन मंदिर वाले रास्ते को अवॉयड किया।

जागते हुये तो वक्त काटना बहुत मुश्किल होगा, 11:20 हो रहा है, सोचता हूँ सो जाऊं, कब सुबह हो जायेगी सोते-सोते पता भी नहीं चलेगा। नींद आ जायेगी… ये भी तो एक सवाल हो गया है?

खाना खा लिया है, 24 घंटे में खाया तो सर भारी सा हो रहा है, स्क्रीन पर फोकस नहीं कर पा रहा हूँ, जितनी देर घर पर रहा हूँ, यहीं तो आँखें गढ़ाए था, उम्मीद के ख़िलाफ़ उम्मीद करता हुआ…, शाम को मोबाइल के सिग्नल्स नहीं मिल रहे थे, बहुत था मेरे परेशान होने के लिये।
की बोर्ड पर एक-एक की देख-देख कर टाइप कर रहा हूँ, पर यहाँ से जाने की इच्छा नहीं हो रही, जान रहा हूँ कि बहुत देर रुक पाना मुमकिन नहीं अब।

जाऊं? अभी खुशवंत सिंह से भी तो कुश्ती लड़ना है! आज तो ये हालत हो रही है कि भांजी भी छू दे तो ढेर हो जाऊं।

1 बजने में तो अभी 13 घंटे से भी ज़्यादा है, उसी समय आप ऑनलाइन मिलेंगी और मुझे यकीन है कि कल कोई न कोई काम आ पड़ेगा और मैं घर समय से नहीं आ पाऊंगा, पर…. “कभी तो आऊँगा”….
कितना निश्चिंत हूँ कि लौट ही आऊँ, कितने हैं जो घर से निकल कर कभी लौट कर नहीं आ पाते… देखेंगे, सब देखेंगे, सब कुछ देखेंगे… ‘आज की रात बचेंगे तो सहर देखेंगे, आज की रात…’
Now its 11:52, आता हूँ…

– विघ्न
17 Aug 2008 at 11:53 pm

– प्रस्तुतकर्ता माँ जीवन शैफाली
(नोट : ये काल्पनिक नहीं वास्तविक प्रेम कहानी है, और ये संवाद 2008 में नायक और नायिका के बीच हुए ईमेल के आदान प्रदान से लिए गए हैं)

नायिका के इसके पूर्व के एपिसोड्स पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

नायिका -21 : खींचे मुझे कोई डोर तेरी ओर…

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