मेकिंग इंडिया साप्ताहिकी

जीवन के सप्त रंग, मेकिंग इंडिया के संग
Masala-E-Magic : जब भगवान को बेचने पड़ते हैं पापड़

आज फिर भगवान मेरे घर पापड़ बेचने आए…

पिछली बार आपके पापड़ का टेस्ट उतना अच्छा नहीं था मैंने साइकिल पर पापड़ के थैले लटकाए खड़े, लटके मुंह वाले भगवान से कहा… तो उन्होंने कहा बेटा दे देना वापस पापड़ का वो पैकेट, बदले में ये दूसरा ले लो… ये वाले बहुत अच्छे हैं सच में….

क्या फर्क है उसमें और इसमें .. मैंने उसके और लटक आए मुंह की ओर देखकर कहा… तो उसके चेहरे पर रौनक आ गई … कहने लगा ये मेरी बड़ी बहू ने बनाए हैं.. वो बहुत अच्छे पापड़ बनाती है… पहले जो मैं आपको दे गया था वो छोटी बहू ने बनाए थे…. .

मुझे हंसी आ गई तो भगवान का लटका हुआ चेहरा थोड़ा और खिल गया, और सोचा कहूंगी छोटी बहुओं से कि वो कितनी भी आधुनिक हो जाए … कितनी भी तेज़ तर्राट हो जाए, पूछ तो बड़ी बहू के धैर्य की ही होती है … ज़रा लपड़-झपड़ काम करना बंद करो…. और सीखो बड़ी बहू से पापड़ बनाना……

खैर, पापड़ तो दोनों ही बहुओं के हाथ के एक जैसे लगे मुझे … 10 रुपये के पैकेट में स्वाद कहाँ से लाओगे… वो तो उस बेचारे भगवान की थोड़ी कमाई हो जाए इसलिए हर 15 दिन में उससे 50-100 रुपयों का सामान खरीद लेती हूँ… 10 रुपये के पापड़ के पैकेट पर 1 रुपया और 5 रुपये वाले फिंगर्स पर 50 पैसे कमाई है उसकी.

और सबसे बड़ी हिट तो सुनिए …. 1 रुपये के चाइनीज़ मसाले के पैकेट पर सोचिए कितना कमा लेते होंगे… मेरे पूछने पर बताया ऐसे 100 पैकेट्स बेचने पर 2 या 3 रुपये मिलते हैं…. . मेरी सारी नज़र तो उन पैकेट्स में ही उतर आई…. खूब सारे खरीद लिए…

घर के सामने एक स्कूल है स्कूल छूटने के बाद सारे बच्चे वहां खड़े रहकर ठिलवई करते रहते हैं… कोई अपने रईस बाप का महंगा स्मार्टफोन उठा लाता है और झुण्ड बनाकर सब लोग पता नहीं क्या देखते हुए खी खी खी करते रहते हैं… तो कोई अंकल चिप्स या लेज़ का पैकेट पकड़कर कुटूर-कुटूर खाता रहता है….. . मैंने भी मौक़ा देखकर छक्का लगाया उस चाइनीज़ मसाले का एक पैकेट फाड़कर चखते हुए यूं जोर से तारीफ़ करना शुरू की कि उन रईस बाप की औलादों के कान में पड़े… वाह क्या बढ़िया मसाला है!!!! इसे तो नूडल्स, पास्ता में डालकर खाओ तो मज़ा ही आ जाए…

नूडल्स, पास्ता जैसे शब्द आजकल के बच्चों के कान में पड़े और उनके कान खड़े न हो जाए ऐसा हो ही नहीं सकता… . उनमें से पहले 2 – 3 बच्चे आए और 5 पैकेट्स खरीद कर ले गए और वहीं खोलकर चाटने लगे… उनको देखकर 2-4 और बच्चों के मुंह में पानी आया … यूं करते हुए बच्चे मधुमक्खी के झुंड की तरह उस मसाले के छत्ते पर टूट पड़े…

जब बेचारे भगवान ने कहा कि अब मेरे पास ख़त्म हो गए हैं पैकेट्स तब जाकर बच्चे वापस अपने स्मार्टफोन की दुनिया में लौट गए… . मुझे ख़याल आया क्यों बार बार उन बच्चों को स्मार्टफोन का ताना दे रही हूँ एक स्मार्ट फोन तो मेरे पास भी है… मैं अन्दर जाकर उसे लेकर आई तब तक भगवान जा चुके थे..

लेकिन शुक्र है मेरे प्यारे भाई का इतना शानदार फोन दिया है कि इतनी दूर से भी ज़ूम करते हुए उनकी पीछे से फोटो ले ली… और उन बच्चों की बातें सुनकर हंसी आ गई … भगवान से पूछ रहे थे… आपके पास फोन वोन नहीं है क्या… आप अपना नंबर दे दो हमको….. और मसाले के पैकेट्स चाहिए होंगे तो आपको फोन लगा देंगे….

भगवान का जवाब सुन नहीं पाई तब तक वो काफी दूर निकल चुके थे….. उस पापड़ बेचने वाले भगवान का पूरा नाम है भगवान दास साहू… उम्र 60 -65 साल… दो बेटे के पिता और पापड़ बनाने वाली दो बहुओं के ससुर…

अगली बार आएँगे तो आप लोगों के लिए भी वो मसाले के पैकेट्स खरीद कर रखूँगी… मेरे हजारों की संख्या में दोस्तों के लिए खरीदूंगी तो सोचो उसकी कितनी कमाई हो जाएगी… गिन के रखना कितनी कमाई होगी भगवान की … और हाँ पैसे आपको ही भिजवाना है… क्या लगा था यूं ही फ्री में दे दूंगी… नहीं जी मेरे पिताजी स्मार्टफोन वाले नहीं है… होते भी तो यूं ठिलवई करने के लिए नहीं देते…

सुनाउंगी कभी वो उन्नीस रुपये वाला पापा का किस्सा… जिसकी वजह से आज उन्नीस साल हो गए लेकिन उनसे कभी उन्नीस पैसे भी नहीं मांगे…

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उपरोक्त पोस्ट कुछ तीन चार वर्ष पहले फेसबुक पर लिखी थी… वह फेसबुक आईडी तो बंद हो गयी, और अब पापा भी नहीं रहे, लेकिन भगवान आज भी मेरे यहाँ पापड बेचने आते हैं… कल कड़ाके की ठण्ड के कारण जहाँ सरकार ने स्कूल बंद कर रखे हैं, वो आये तो मैंने अधिकार पूर्वक कहा दादा इतनी ठण्ड में स्वेटर नहीं पहने हो, तो अपना शर्ट उठाकर बताने लगे नहीं बिटिया अन्दर एक इनर और उसके ऊपर एक हाफ स्वेटर पहना है…

मैंने कहा फिर भी फुल स्वेटर पहन कर निकला करो… और हाँ वो मसाला ए मैजिक भगवान आज भी बेचते हैं लेकिन उसकी कीमत इन पांच वर्षों में पांच गुना हो गयी है.. पांच रुपये का एक मिलता है, हालांकि उसका साइज़ भी बड़ा हो गया है… भगवान का कहना है अब एक रुपया कहाँ चलता है… पांच रुपये से कम तो भिखारी भी नहीं लेते…

मैं मन ही मन सोच रही हूँ क्या सच में अच्छे दिन नहीं आए क्या अभी तक कि भिखारियों का स्टेटस भी एक रुपये से पांच रुपये हो गया है…

– मसाला-ए-मेजिक वाली शैफाली

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