मेकिंग इंडिया साप्ताहिकी

जीवन के सप्त रंग, मेकिंग इंडिया के संग
मानो या न मानो : रहस्यों को हृदय में समेटे इंतज़ार करो अपनी पारी का

मेरा मानना है कि जादू टोना, गंडा ताबीज, नज़र लगना, व्रत करके भूखे मरना, ढोंगी बाबाओं को गुरू बनाना और तंत्र मन्त्र सब ढकोसला है लेकिन मैं मानता हूँ न? तो क्या ये जरूरी है कि मैं जो मानता हूँ सब सही है?

मैं सब जानता हूँ या उतना ही जितना मेरी छोटी सी बुद्धि में बैठ गया। क्या उतना ही सत्य है जितना मुझे पता है या उस से आगे पीछे भी कुछ हो सकता है? जिस परम सत्य को खोजते खोजते न जाने कितने साधू, ज्ञानी महाज्ञानी, राजा और सम्राट खाकनशीं हो गए उसे पूरा जानने का दावा कोई कैसे कर सकता है भला?

अच्छा चलो अपने जीवन की दो छोटी छोटी असामान्य घटना आप को सुनाता हूँ।

जब मैं कृषि कार्य करता था तो हमारे यहाँ दो भैंस थीं। एक चरवाहा उन्हें सुबह चराने ले जाता और शाम को छोड़ जाता था। एक दिन शाम को दोनों भैंस नहीं लौटीं। चरवाहे से पूछा तो उसने बताया कि आप के पशु झुण्ड से बिछड़ कर कहीं खो गए हैं।

कई दिन गुजर गए किन्तु कुछ पता नहीं चला और हम निराश होकर अपने घर बैठ गए। एक दिन किसी ने सलाह दी कि गुलावठी नामक कस्बे में पशुओं की बड़ी पैंठ लगती है और बड़ी मात्रा में चोरी के पशु वहां बिकने के लिए लाये जाते हैं।

मेरे बड़े भाईसाहब के पास यामाहा मोटरसाइकिल थी। उसी पर सवार होकर हम निकल लिए। इत्तेफ़ाक़ से जिस रस्ते से रोज जाते थे उसपर कोई व्यवधान था सो पुरानी चुंगी वाले रस्ते से जा रहे थे। तभी बूंदा बांदी होने लगी और मोटरसाइकिल में पंचर हो गया। सिहानी की मेरठ रोड चुंगी पर एक पंचर वाला बैठता था। वो प्रसिद्ध मुस्लिम मोहल्ले “कैला भट्टे” पर रहता था। मोटरसाइकिल घसीटकर उसके पास पहुंचे तो उसने उत्सुकतावश पूछा “बाउजी आज तो बरसों बाद दिखाई दिए। ऐसे मौसम में कहाँ?”

मैंने उसे बताया कि दो भैंस चोरी हो गई हैं।

उसने कहा “पांच दिन पहले दो भैंस हमारे मोहल्ले में पुलिस ने कसाइयों से छुड़ाई हैं। आप एक बार कैला भट्टा पुलिस चौकी में पता कर लीजिये।”

हमारी मोटरसिकिल निकट ही कैला भट्टा पुलिस चौकी की तरफ मुड़ गई। इंस्पैक्टर ने बताया कि भैंस हमने एक ग्वाले के यहाँ बंधवा रखी हैं। पहचान लीजिये। जाकर देखा तो दोनों भैंस आराम से जुगाल रही थीं।

उस रस्ते से हम बरसों से गए नहीं थे। उस पंचर वाले से बरसों से काम नहीं पड़ा था। इत्तेफाक से हमें उसके पास ना जाने किस विधा ने पहुंचा दिया था।

दूसरी घटना इस से भी अधिक आश्चर्यजनक है।

एक दिन मैं और मेरी पत्नी कविनगर रामलीला मैदान में मेले में गए। गाड़ी सड़क पर छोड़कर भीतर चले गए। वापस लौटे तो गाड़ी गायब थी। थाने में पता किया, कई लोगों से पूछा, सब बेकार। अंत में स्थानीय सभासद मित्र राजेंद्र त्यागी जी को फोन किया तो वे अपनी गाड़ी लेकर आये और हम लुटे पिटे पति – पत्नी को घर छोड़ दिया।

अगले दिन मैंने अपने सभी निकट के मित्रों को फोन किया कि भइया गाड़ी खो गई है। ये नंबर है। ध्यान रखना।

दोपहर बारह बजे एक मित्र का फोन आया कि आज सुबह आप की गाड़ी पटेलनगर मेरे दामाद के घर के सामने पार्क में खड़ी देखी गई थी। अब नहीं है।

हम कई लोग आनन फानन में वहां पहुँच गए और किसी जासूस की तरह घटना स्थल का मुआयना करने लगे। तभी सामने के घर से एक बच्ची दरवाजे पर आई और उसने कहा “अंकल आप यहाँ क्या ढून्ढ रहे हो? ”

हमने बताया कि आज सुबह हमारी गाड़ी यहाँ खड़ी हुई थी। तो बच्ची ने बताया कि हाँ दो लडके गाड़ी को स्टार्ट करने की कोशिश कर रहे थे मगर हो नहीं पा रही थी। फिर वो मैकनिक को बुलाकर लाये और गाड़ी स्टार्ट करके ले गए। ”

हमने पूछा – “क्या तुम किसी को पहचान सकती हो?”

लड़की ने कहा – “नहीं” और घर में चली गई।

कुछ देर बाद लड़की दोबारा बाहर आई और उसने कहा – “अंकल एक बात है, वो पार्क के उस कोने पर जो शर्मा अंकल रहते हैं उनके लड़के ने कार वालों से चलते चलते हेलो बोला था।”

अब तो आप समझ ही गए होंगे कि उस बच्ची के एक डायलॉग ने एक पल में सारी गुत्थी सुलझा दी थी।

ये सब कितना अजीब सा है ना। ना जाने कौन सी अज्ञात शक्ति आप को संचालित करती है और समाधान की और खींच कर ले जाती है।

अपने चारों तरफ देखिये। आप को ऐसे अनेक मामले नजर आएंगे कि किसी ने अत्याचार किया पाप किये और अपने दम्भ में सबको कुचलता हुआ आगे बढ़ गया। उस समय लगा कि उसने सब कुछ जीत लिया है किन्तु नियति ने ना जाने किस मोड़ पर इसी जन्म में उसे सजा दी है।

हम कुछ नहीं जानते और शायद सब कुछ तो कोई नहीं जानता। इसलिए इन रहस्यों को हृदय में समेटे हुए अपनी पारी का इंतजार करो। बस।

– रविन्द्र कान्त त्यागी

मानो या ना मानो : रहस्यमयी रंगोली

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