मेकिंग इंडिया साप्ताहिकी

जीवन के सप्त रंग, मेकिंग इंडिया के संग
कहानी : सोलह साँसें, द्वार दूसरी दुनिया का

बिस्तर पर चढ़ने के बाद पहले चार साँसें चित्त अवस्था में लो, फिर आठ साँसें दाईं करवट से, फिर सोलह साँसें बाईं करवट से….

आपका यह सोलह साँसों वाला कंसेप्ट सुनकर तो मुझे वह गीत याद आता है…

एक सौ सोलह चाँद की रातें और एक तुम्हारे काँधे का तिल???

हाँ वही तो…

ठीक है आप सोलह सांसों के लिए बाईं करवट लीजिये तब तक मैं आपके काँधे पर तिल ढूंढता हूँ…

धत्त…

धत्त नहीं धुत्त… मुझे पता है आप सोलह सांस वाली बाईं करवट लेंगी और धुत्त होकर सो जाएँगी… जब मैं कहता हूँ तो क्या गलत कहता हूँ….

क्या?

कि सोने के मामले में आपका कोई सानी नहीं, आप पास में बैठी हों और मैं ज़रा सी कोहनी से धक्का भी दे दूं तो लुढ़ककर तुरंत खर्राटे मारने लग जाएँगी…

तो अच्छा है न आपकी तरह गाना तो नहीं गाती…

करवटें बदलते रहे सारी रात हम?

आपको तो मेरी हर करवट पर कोई न कोई गीत ज़रूर याद रहता है…

हर करवट पर नहीं मूर्खे, हर सांस पर… बस यह सोलह सांस वाली जगह मैंने खाली छोड़ रखी है…

वो क्यूं भला?

आप को नहीं पता?

नहीं तो?

तो ये कहानियां कहाँ से अवतरित होती हैं आपकी कलम में…?

कलम ना कहिये, की बोर्ड की ठक ठक कहिये…

जरा लीजिये तो सोलह साँसे देखें आज कौन सी कहानी ठकठकाती आ रही है…

आप रहने दीजिये कहानी सुनकर कहना तो आपको वही है… “हाँ ठीक ही है…”

अरे तो ठीक को ठीक न कहूं तो क्या बुरी कहूं?

कभी तारीफ भी कर लेना चाहिए भूले भटके…

है ना आपके पाठक आपकी हर वाहियात कविता पर वाह करने वाले, मुझे तो समझ ही नहीं आता आप ये कविता नुमा चिल बिलोटे बनाती ही क्यों हैं? ऊपर से आपके कहने का अंदाज़… बोलती कम हैं हंसती ज्यादा हैं…

तो जो प्रसन्नता का झरना जो अन्दर से फूट रहा हो उसे कौन रोकता है भला…

अरे क्या करें, हम तो आपके काँधे के तिल पर ही जीवन भर के लिए अटक गए हैं, और कहीं ध्यान ही नहीं जाता…

चलिए चलिए आप मेरे तिल को घूरना तो बंद कीजिये तब तो वहां का दरवाज़ा खोलूँगी….

तिल का दरवाज़ा??

क्यों तिल का ताड़ हो सकता है तो दरवाज़ा क्यों नहीं?

आपकी लीला आप ही जाने… चलिए हम नहीं देख रहे आप खोलिए दरवाज़ा….

आ रही हूँ बाबा… दरवाज़ा ही तोड़ दोगे क्या?

दरवाज़ा खुलता है और 30-35 वर्ष पुराना एक अजनबी चेहरा ऐसे हँसते हुए प्रकट होता है कि उसके पूरे बत्तीस दांत गिने जा सकते हैं…

32 नहीं 116…

क्या?

जी मैं आपके बाजू वाले कमरे में रुका हूँ 116 नंबर रूम में…

तो?

तो सुना है आपको कहानी लिखना है इस 116 पर?

आपको कैसे पता!!! मेरी आँखें आश्चर्य से अब उसकी आँखों में झाँक रही थी…

लो जी आपने ही तो फोन करके बुलाया था और कहा था कि कहानी के लिए एक नायक की ज़रूरत है…

ओह हाँ… वो मैं ज़रा किसी और से बात कर रही थी तो भूल गयी… आइये … अन्दर आ जाइये.. तो आप कहाँ रहते हैं वैसे?

कहानियों में…

मतलब?

मतलब मुसाफिर हूँ, न घर है ना ठिकाना… बस चलते जाना है…

अरे आप भी हर बात में कोई न कोई गाना खोज लाते हैं?

जी फिल्मों का शौक रहा है सदियों से….

सदियों से?? आपकी उम्र क्या है?

छोड़िये ना उम्र बताऊँगा तो आपको यकीन नहीं आएगा… आप अपनी कहानी के हिसाब से उम्र तय कर लीजिये उस उम्र का हो जाऊंगा…

अरे वो.. मेरी कहानी का नायक तो 60 की उम्र के आसपास है… यह कहते हुए मैं अन्दर के कमरे में पानी लेने चली जाती हूँ, लौटकर एक 60 वर्ष के बुज़ुर्ग को अपने सामने खड़े वैसे ही हँसते हुए पाती हूँ…

देख लीजिये अभी भी पूरे 32 दांत है…

जी मुझे कोई टूथ पेस्ट का विज्ञापन नहीं बनाना, कहानी लिखना है आप ज़रा हँसना बंद कीजिये…

वो ज़रा मुश्किल है…

क्यों भला?

वो अन्दर जो प्रसन्नता का झरना है उसे रोक पाना मेरे लिए मुश्किल है…

अरे ये तो डायलॉग भी मेरे ही बोल रहा है… मैंने मन ही मन सोचा…

अब आपकी कहानी का नायक हूँ तो डायलॉग तो याद रखना ही पड़ेगा ना, वरना कहानी कैसे लिखेंगी आप…

आप मेरे मन की हर बात पढ़ लेते हैं? मैंने तनिक भौहें सिकुड़ते हुए पूछा…

जी वो… वाक्य पूरा किए बिना वो सर खुजाते हुए शर्माते हुए कुर्सी पर बैठ जाता है… आप तो यह बताइए कहानी कहाँ से शुरू करना है…

शुरू करने की कोई झंझट ही नहीं, मुझे दिक्कत होती है कहानी ख़त्म करने में.. जब लिखना शुरू करती हूँ तो समझ ही नहीं आता इसे ख़त्म कहाँ करूं…

इसमें क्या दिक्कत है सत्रहवीं सांस पर आँखें खोल लीजिये कहानी ख़त्म…

अरे ऐसे कैसे ख़त्म… कहानी पूरी किए बिना आँखें कैसे खोल दूं? वहीं तो दिक्कत है… कहानी शुरू तो कर दी है लेकिन अब ख़त्म नहीं हो रही….

नायक को 60 साल का बूढ़ा कर देंगी तो कहानी ख़त्म होने पर भी पसंद नहीं की जाएगी…

फिर क्या करूं?

अरे आप चिर यौवना है तो नायक को क्यों बेचारे को बूढ़ा करने पर तुली हैं…

अब आप तो रहने ही दीजिये… उम्र चेतना की होती है जिसे हमेशा युवा बनाए रखा जा सकता है लेकिन शरीर की तो सीमा होती है न, वह कब तक साथ देगा…

जब तक आप चाहेंगी.. साथ रहूँगा…. सशरीर… लेकिन बस उम्र थोड़ी कम…

अच्छा चलो थोड़ा छोटा कर लेती हूँ….

इतना छोटा? यह टी शर्ट मुझे नहीं आएगा बाबा!!

अरे मेरे प्यारे पतिदेव एक बार try तो करके देखो….

अरे हाँ यह तो आ गया… अब आप इस उम्र में मुझे छोकरों टाइप कपड़े पहनाएंगी?

तो मैं अकेले चिर यौवना बनकर घूमती रहूँ और आप सफ़ेद दाढ़ी वाले बाबा बनकर घूमो अच्छा लगेगा क्या?

अरे दाढ़ी सफ़ेद हो गयी तो क्या हुआ दिल तो आज भी काला है… अरे आप तो यह बताइये आपकी कहानी कहाँ तक पहुँची? उम्र तय हो पाई या नहीं आपके नायक की?

अरे वो? मैं चाहे कितनी भी बूढ़ी हो जाऊं मेरी कहानी के नायक हमेशा ऐसे रहते हैं कि…

कि उनका टी शर्ट आप मुझे पहना सकती हैं….. है ना? और कौन कहता है आप बूढ़ी हो गयीं मेरी ज़ोहरें ज़बीं?
आपके गानों की लिस्ट कभी ख़त्म होगी या नहीं?
अरे वो तो आख़री सांस तक भी गाती रहेंगी कि…

कि कल खेल में हम हो न हो गर्दिश में तारे रहेंगे सदा…

जी नहीं

फिर?

हम न रहेंगे, तुम न रहोगे, फिर भी रहेगी निशानियाँ… कहते हुए वो नायक की तरफ इशारा करते हैं जो अभी भी उस कुर्सी पर बैठा उम्र कम होने का इंतज़ार कर रहा होता है…

अरे आप अभी तक गए नहीं?

ऐसे कैसे चला जाता आपका उपन्यास पूरा ही नहीं हो रहा… देखिये मैडम बीस साल पहले 116 पर कहानी लिखने बुलाया था आपने, पूरा उपन्यास लिख डाला आपने लेकिन अब तक पूरा नहीं हुआ….

तो किसने कहा था डींगे हांकिये – जब तक आप चाहेंगी.. साथ रहूँगा…. सशरीर… लेकिन बस उम्र थोड़ी कम कर दीजिये.” अब उम्र कम करवाई तो उसके दोबारा बढ़ने तक तो ठहरना ही पड़ेगा ना आपको… मैंने तो पहले ही कहा था मेरा नायक 60 साल का है और वहीं पर कहानी ख़त्म होगी एकदम वीर ज़ारा टाइप… लेकिन बस कहानी है कि ख़त्म होने का नाम ही नहीं ले रही…

और तब से आप सोलह सांस में ही जी रही हैं? सत्रहवीं सांस लिए बिना अब तक कैसे ज़िंदा हैं आप?

अरे ये जीना भी कोई जीना है लल्लू… आयं …

हाहाहा आप भी???

अब संगीत प्रेमियों के साथ जीते हुए इतना भी नहीं सीखूंगी क्या?

तो और क्या सीख हम संगीत प्रेमियों के साथ?

यह कि कुछ कहानियाँ कभी ख़त्म नहीं होती… बस घटनाएं कहानियों के रूप में जीवन में इधर उधर बिखरी पड़ी रहती है… उन घटनाओं को समेटते चले जाओ… पाठकों को सुनाओ और कुछ सूत्र उनको पकड़ाते चले जाओ… जीवन के इन छोटे छोटे सूत्रों में ही बहुत बड़े और गहरे रहस्य छुपे होते हैं… जिनको उजागर किये बिना बस उसमें प्रवेश कर खुद भी रहस्यमयी होते चले जाना है… जितने लोग इस रहस्यमय दुनिया में प्रवेश करते जाएंगे… हमारा सनातन रहस्य समृद्ध होता जाएगा… और फिर लोग इसी रहस्य की तलाश की प्यास लिए दूर देश से आएंगे और भारत फिर से अपने पुराने गौरव को प्राप्त कर सकेगा जब हम कह सकेंगे कि अज्ञात को ज्ञात शब्दों में पिरोने के बाद भी जो अज्ञेय है उस तक पहुँचने की यात्रा हमेशा बनी रहेगी…

ठीक आपके इस उपन्यास की तरह? जिसका नायक बेचारा आपसे किसी रोमांटिक कहानी की प्रतीक्षा में बूढ़ा हो गया और आप उसे अपनी आध्यात्मिक लफ्फाज़ियों से बोर कर रही हैं?

अरे तो क्या करूं अब उसके साथ रोमांस करने की तो उम्र रही नहीं, इन बीस सालों में आपके दाढ़ी के बाल भी पूरे सफ़ेद हो चुके हैं, वर्ना आपके साथ ही कोई रोमांटिक गाना कर लेती… और मेरा नायक भी 60 वर्ष का बूढ़ा….

यह कहते कहते अचानक से मुझे ख़याल आता है … अरे आप भी तो इन बीस सालों में 60 साल के ऊपर हो गए हैं…

तो मूर्खे, अब समझ आया आपको कि क्यों आपकी कहानी 60 साल के नायक पर ख़त्म हो रही थी?

एक बात कहूं… इन बीस सालों में कहानी चाहे कितनी भी आगे बढ़ गयी हो, आपका यह मूर्खे कहना मुझे फिर से चिरयौवना वाली फीलिंग दे जाता है…

आपकी कहानी ख़त्म हो गयी हो तो अपना तिल का दरवाज़ा तो बंद कीजिये ताकि मैं भी आपकी इजाज़त से लौट आऊँ आपके तिल पर फिर से…

धत्त…

धत्त नहीं धुत्त… कुम्भकरणा…. सो गईं… ??? मूर्खे….

– माँ जीवन शैफाली

खुदा की क़िताब

वो दोनों चादर पर
सोये थे कुछ इस तरह
जैसे मुसल्ले पर
कोई पाक़ क़िताब खुली पड़ी हो
और खुदा अपनी ही लिखी
किसी आयत को उसमें पढ़ रहा हो|

वक्त दोपहर का
खत्म हो चला था,
डूबते सूरज का बुकमार्क लगाकर
ख़ुदा चाँद को जगाने चला गया|

उन्हीं दिनों की बात है ये
जब दोनों सूरज के साथ
सोते थे एक साथ
और चाँद के साथ
जागते थे जुदा होकर|
दोनों दिनभर न जाने कितनी ही आयतें लिखते रहते
एक की ज़ुबां से अक्षरों के सितारे निकलते
और दूजे की रूह में टंक जाते
एक की कलम से अक्षर उतरते
दूजे के अर्थों में चढ़ जाते|

दुनियावी हलचल हो
या कायनाती तवाज़न
हसद का भरम हो
या नजरें सानी का आलम
अदीबों के किस्से हो
या मौसीकी का चलन
बात कभी ख़ला तक गूंज जाती
तो कभी खामोशी अरहत हो जाती|

देखने वालों को लगता दोनों आसपास सोये हैं
लेकिन सिर्फ खुदा जानता है
कि वो उसकी किताब के वो खुले पन्ने हैं
जिन्हें वही पढ़ सकता है
जिसकी आँखों में मोहब्बत का दीया रोशन हो|

तवाज़न- संतुलन
नजरें सानी- अंतः अवलोकन
अदीबों – साहित्यकारों
अरहत – समाधि

अँगरेज़ की कहानी : जादूगरनी

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