मेकिंग इंडिया साप्ताहिकी

जीवन के सप्त रंग, मेकिंग इंडिया के संग
कान्हा के अंतिम दर्शन

अश्वत्थ वृक्ष के नीचे तने के साथ अपनी भुजा को सिर के पीछे लगाये पीठ के सहारे अर्धशयन मुद्रा में वे बैठे हुए थे, दाँया पैर बाँये घुटने पर रखे हुए अर्धनिमीलित नेत्रों से शून्य में देखते हुए से। बांया चरण घुटने पर होने के कारण हवा में था जिसका तलवा प्रातःकाल के उदित होते सूर्य की रश्मियों में अपनी रक्ताभ छटा बिखेर रहा था।

प्रातः कालीन समीर भी कुछ सहमा सहमा और उदास सा था और अश्वत्थ वृक्ष के तने के सहारे से बैठे उस मोहक व्यक्तित्व के सुहावने गात्र को सहलाता सा, उन्हें सांत्वना देता सा बह रहा था।

उन्होंने ऊपर अश्वत्थ की ओर देखा और क्षितिज की ओर देखकर एक गहरी उसांस भरी।

केवल कुछ दिवस पूर्व ही तो वे घिरे थे परिवार से, कुटुंब से, समाज से, पूरे गण से…..और अब?

अब पूर्णतः एकाकी।

“आपके साथ ऐसा कैसे हो सकता है?” रोते हुए दारुक ने पूछा था उस समय।

“धर्म पर चलने वाला अंततः एकाकी रह जाता है।” निर्विकार भाव से उन्होंने उत्तर दिया था।

वह सारे आर्यावर्त की राजनैतिक, सामाजिक व आध्यात्मिक गतिविधियों के केंद्र में रहकर भी असंपृक्त अनासक्त रहे पर चारों ओर घेरे खड़े कुटुंब व परिवारी जनों की अनंत स्वार्थकामनाओं की अपेक्षाओं में बाधक हो अकेले भी होते चले गये क्योंकि वे अधर्म का साथ नहीं दे सकते थे इसीलिये अपनी आंखों के सामने पुत्र, पौत्रादि की मृत्यु देखकर भी अविचलित रह सके।

परंतु फिर भी उनका निर्मोही मन अग्रज के महाप्रयाण को ना सह सका।

अपने इस अग्रज का स्नेह उन्हें मातृक्षीर की तरह ही शैशव से प्राप्त हुआ और वह जीवन भर अटूट गांठ की तरह रहा। इस हठी परंतु स्नेही अग्रज का क्रोध, क्षोभ, मदिरा, द्यूत आदि दुर्व्यसन भी उनके प्रति प्रेम को कम नहीं कर सका और आज जब वे भी मुँह मोड़कर सदैव के लिये इस मृत्य संसार को छोड़कर चले गये तो जाने यह कैसी जड़तापूर्ण स्तब्धता छा गयी है और रह रहकर उनका मन अतीत में लौट रहा था कि तभी…

सर्रर्रर्रर….

उनके योद्धा मस्तिष्क में एक महीन पर जानी पहचानी आवाज गूंजी और पीड़ा की एक तीखी रेखा पैरों के तलवे से मस्तिष्क तक खिंच गई।

उन्होंने पैर की ओर देखा। तलवे को फोड़ता हुए बाण का फलक पैर के दूसरी ओर निकल चुका था।

इस आकस्मिक शर प्रहार ने उन्हें भाव जगत से बाहर ला दिया।

“पीड़ा शरीर का सहज धर्म है पर आत्मा का नहीं।” उनके चेहरे पर एक स्मित उभरी। स्मित, जिसके सम्मोहन में रहा पूरा आर्यावर्त पूरे सौ वर्षों तक।

“मुझे क्षमा कर दें आर्य, आपके रक्तिम तलवे को वन्य पशु का मुख समझ बाण चला बैठा।” एक व्याध व्याकुल होकर घुटनों के बल बैठा गिड़गिड़ा रहा था।

“उठो, तुमने कोई अपराध नहीं किया, जो कुछ हुआ वह भ्रमवश हुआ”

“नहीं प्रभु अपने इस पातक के लिये स्वयं को कैसे क्षमा कर सकूँगा?”

“कोई अपराधबोध अपने मन में मत रखो। तुम्हारे प्रति हुए मेरे किस जन्म के किस कर्म का यह परिणाम है तुम नहीं जानते हो।” –व्याध के कंधे को थपथपाते हुये उन्होंने उसे सांत्वना दी और साथ ही उनके चेहरे पर एक ‘रहस्यमय मुस्कुराहट’ खेल गई।

“अब तुम जाओ, तुम्हें शांति प्राप्त हो।”

व्याध बारंबार धरती पर सिर टेकता हुआ उठा और भारी कदमों से चल दिया। चलते चलते वह मुड़ मुड़कर पीछे देखता जाता था। पर अंततः व्याध परिदृश्य से ओझल हो ही गया।

अब वे पुनः अपनी स्मृतियों के साथ अकेले थे।

उनके स्मृति पटल पर दृश्य और ध्वनियाँ लहरों की तरह आ जा रहे थे और परस्पर टकराकर कोलाहल का एक भंवर बना रहे थे। धीरे धीरे वे स्वर स्पष्ट होने लगे।

— एक स्वर वेदनामय पुकार के रूप में प्रभास के रक्तप्लावित क्षेत्र से मृत्युमुख में जाते रक्तरंजित पुत्र की उठा–“पिताजी!”

–“तुम चाहते तो यह युद्ध रोक सकते थे अतः इस पाप के के भाग तुम भी हो।”–निर्मम आरोप की यह स्त्रीध्वनि उठी हस्तिनापुर के राजमहल से।

–“भैया, तुम्हारे होते भी मेरे निःशस्त्र पुत्र की हत्या इन अधर्मियों ने कैसे कर दी।” हिचकियों में डूबा उनकी लाडली बहन का रुदन वे स्पष्ट सुन रहे थे।

–फिर एक करुण पुकार उठी हस्तिनापुर से– “तुम जैसे सखा के होते हुए भी सार्वजनिक सभा में इस तरह मेरा अपमान हुआ। कैसे?”

–और……… फिर मथुरा से सुदूर कालखंड की यात्रा करते हुए एक प्रौढ़ पुरुष की भरे गले से निकली कातर आवाज गूंजी –“लल्ला, अपना ध्यान रखना।”

इस आवाज ने उन्हें हमेशा की तरह भावाकुल बना दिया। एक पिता की आवाज जो अपने पुत्र को सदैव के लिए स्वयं से दूर जाता देख रहा था।

शताब्दी भर के इस जीवनअंतराल में यह छोटा सा वाक्य उनके मन पर एक बोझ बनकर रहा और वे कभी उससे मुक्त ना हो सके और ना वह प्रौढ़ चेहरा जिसे वह ‘बाबा’ कहकर पुकारते थे।

उनके स्मृति मात्र से शरीर की रोमावलियाँ खड़ी हो गईं।

अभी वे संभल भी ना पाये थे कि तभी तुरंत ही गूंजी वात्सल्य में डूबी वह पुकार जिसकी उपेक्षा करने का सामर्थ्य उनके निर्मोही अनासक्त मन में भी नहीं था।

“तू कहाँ छुपा है रे? क्यों अपनी मैया को इतना तंग क्यों करता है??”

“मैं यहाँ हूँ मैया”, वे होंठों में ही बुदबुदा पड़े। साथ ही उनके अर्धनिमीलित नेत्रों पर पलकें ढल गयीं और बंद कमल नयनों से छलक पड़े दो अश्रुबिंदु।

साक्षात ईश्वर कहे जाने वाले इस दैवी व्यक्तित्व को भी माँ की स्मृति में विकल देखने के लिये समय जैसे उन अपूर्व क्षणों में रुक गया।

वृक्ष, लताएं, प्रवृत्ति से विपरीत शांत बैठे शशक, बड़ी बड़ी भोली आंखों से उनके चेहरे की ओर अबूझ भाव से ताकते हिरण और व्याकुलता में गर्दन हिलाते मयूर, सभी शांत स्तब्ध थे।

अंततः उनके कानों में गूंजी एक चिर परिचित फुसफुसाहट जो उनके स्मृति में आज भी एक शताब्दी बाद भी ज्यों की त्यों सुरक्षित थी, सदैव उनकी शक्ति बनकर।

“तुम सिर्फ मेरे हो”

उनकी पीठ पर आरोहित एक गर्वीली गोपिका की धीमी सी अस्फुट ध्वनि।

स्मृतियों में रची बसीं तैर गयीं वे बड़ी बड़ी आंखें। उन आंखों में अश्रु नहीं थे, वहाँ तो थी एक अनंत प्रतीक्षा जो उनके बिछड़ने पर उपजी थी।

वे फिर कभी उन आंखों को देख नहीं सके जिसमें स्वयं के प्रतिबिंब को देखकर वे मुग्ध हो उठते थे।

विकल हो उनकी आंखें खुल गईं। वो उनके सामने खड़ी थी।

“तुम? यहाँ??”

“मुझे और कहाँ होना चाहिये? वह खिलखिलाकर हँस दी।

“कहाँ थीं अब तक? पूरे एक युग बाद देख सका हूँ तुम्हें, तुम्हारी हँसी को”

मुस्कुराती हुई वह उनके पास आई

“हम अलग थे ही कब? तुम्हें हुआ क्या है?? पहचानो स्वयं को” वह उनके कानों में फुसफुसाई और फिर खिलखिलाते हुए उनके मस्तक पर एक चुम्बन अंकित कर दिया।

उनके मस्तिष्क को जैसे झटका लगा और भ्रूमध्य में हलचल महसूस होने लगी। उनका ध्यान केंद्रित होना शुरू हो गया।

बंद नेत्रों में भ्रूमध्य पर प्रकाशबिंदु प्रतीत होने लगे जिनकी परिधि बढ़ाने लगी।

उनके चारों ओर प्रकाश ही प्रकाश था और वे स्वयं उस प्रकाश से अभिन्न होकर प्रकाश कणों में उर्मि रूप में थे।

अब वे समस्त सृष्टि का केंद्र थे और उसे गति प्रदान कर रहे थे।

न उनका कोई आदि था ना कोई अंत, वे अनंत थे जिसमें सिकताकणों की भांति अनंत ब्रह्मांड प्रतिक्षण बुलबुलों की भांति बन मिट रहे थे।

पर वह अभी भी उनके सामने थी, मुस्कुराती हुई।

उसने अपना हाथ आमंत्रण मुद्रा में बढ़ा दिया। वे उठ खड़े हुए और उस हाथ को थाम लिया। हाथों में कुछ छिपा हुआ था।

ओह यह तो उनकी वही बांसुरी थी जिसे वह अपनी स्मृति के रूप में छोड़ आये थे। उन्होंने प्रश्नवाचक दृष्टि से देखा और उसने मुस्कुराकर आंखों ही आंखों में मौन स्वीकृति दी।

पूरे सौ वर्ष पश्चात उन्होंने उस बिछुड़ी बाँसुरी को अपने अधरों से लगाया।

भुवनमोहिनी स्वर गूँज उठे।

उसने उनके कंधे पर सिर रख दिया और उस स्वर में डूब गई।

धुन की तीव्रता के साथ साथ प्रकाश की उर्मियाँ बढ़ने लगीं। दोंनों उस प्रकाश में विलीन होते जा रहे थे और एक रूप भी। अंततः दोनों अभिन्न हो गये और प्रकाश ने उन्हें स्वयं में विलीन कर लिया।

अश्वत्थ वृक्ष के तने से टिका सिर एक ओर कंधे पर ढुलक गया और ठीक उसी समय उधर सुदूर बरसाने में एक स्त्री की सांसें भी उसी पल थम गईं।

– देवेन्द्र सिकरवार

जय राधा माधव, जय कुंज बिहारी

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