मेकिंग इंडिया साप्ताहिकी

जीवन के सप्त रंग, मेकिंग इंडिया के संग
आज की नायिका : जोयिता मंडल, सिर्फ एक औरत या पुरुष नहीं, एक पूर्ण मनुष्य

दीपावली पर मिर्ज़ा ग़ालिब का एक वीडियो अक्सर वायरल होता है. जब कुछ हिन्दू दिवाली की मिठाई उनके घर पहुंचाते हैं तो उनके एक मुस्लिम मित्र उन पर प्रश्न उछालते हैं…
आप बर्फी खाएंगे?
हाँ क्यों?
आपको शर्म नहीं आती, एक मुस्लिम होकर हिन्दू बर्फी खाएंगे?
मिर्ज़ा हँसते हुए कहते हैं अच्छा! मिठाई भी हिन्दू मुस्लिम होने लगी… बर्फी हिन्दू है तो, जलेबी क्या है… खत्री?

ये है हमारे समाज की वास्तविक छवि, जहां मज़हब और कला तो दूर की बात है मिठाई तक हिन्दू मुस्लिम हो जाती है. ऐसे ही हमारे समाज में जब किसी के घर लड़की पैदा होती है तो जलेबी बांटी जाती है और लड़का पैदा होता है तो पेड़े…

हम किसी भी चीज़ को पूरी तरह से उसके स्वरूप के साथ स्वीकारने में कतराते हैं. उसे हमेशा दो में विभाजित कर देते हैं. दो विकल्प हमेशा मौजूद होते हैं हर बात को लेकर… या तो यह या वह…

लेकिन वो माता पिता क्या करेंगे जिनके घर में बच्चा तो पैदा होता है लेकिन न वो लड़का है न लड़की… जोयिता मंडल के साथ भी यही हुआ… जब वो पैदा हुई तो उसके माता पिता को समझ नहीं आया समाज में उन्हें क्या बांटना है बच्चा होने की खुशी या अपना वो दुःख जिसे वो किसी को बांटना तो दूर बता भी नहीं सकते थे.

फिर भी उन्होंने उस बच्चे को स्कूल भेजा, कॉलेज भेजा. लेकिन हमारा समाज अन्दर से खुद चाहे कितना ही अपूर्ण हो लेकिन बाहरी रूप से कोई अपूर्ण दिख जाए तो उस पर फब्तियां कसना नहीं भूलता.

जोयिता मंडल को उस समय अपना कॉलेज छोड़ना पड़ा जब उससे उसकी देह और आत्मा की बनावट को लेकर लोगों की हंसी और ताने बर्दाश्त नहीं हुए. समाज जब हिकारत की नज़र से देखने लगा तो उसने घर और समाज दोनों को ठुकरा दिया… इस बीच अपने ही जैसे लोगों ने उसे सम्भाला. जैसा कि अक्सर होता है ट्रेन में भीख मांगने से लेकर विवाह समारोह में नाच गाने तक जैसा काम करना पड़ा.

लेकिन जोयिता के अन्दर का आत्मसम्मान उसे हर बार संभालता रहा… खुली छत के नीचे भूखे पेट सोना मंज़ूर था लेकिन समाज द्वारा थोपा गया यह काम उसे मंज़ूर नहीं था. अपने बल पर पढ़ाई, नौकरी और उसी समाज की सेवा की जिसने उसे कभी स्वीकार नहीं किया….

इसे कहते हैं एक पूर्ण मनुष्य जो उसे भी स्वीकार करता है जिसने उसे अस्वीकार्यता के अलावा कुछ नहीं दिया. आज वह पश्चिम बंगाल के इस्लामपुर जिले के डिंजापुर के राष्ट्रीय लोक अदालत में बैंच जज के रूप में नियुक्त हैं. जीवन की दृष्टि से 30 वर्ष यूं तो बहुत कम होते हैं लेकिन संघर्ष की दृष्टि से इन 30 सालों का सफ़र बहुत लंबा है. क्योंकि इन 30 सालों में उस व्यक्ति ने हर पल अपमान का घूँट पीया लेकिन सर झुकाकर चलते हुए भी अपनी राह नहीं भूली.

आज जोयिता मंडल गर्व से सर उठाकर जब नीली बत्तीवाली गाड़ी से उतरती है तो वही फब्तियां खुद समाज के मुंह पर ज़ोरदार तमाचा बनकर उसके गालों पर ऐसे निशान छोड़ जाती है. जैसे उस नीली बत्ती वाली गाड़ी के गुजरने के बाद पहियों के निशान उस सड़क पर छूट जाते हैं.

ट्रांसजेंडर, किसी अपूर्ण मनुष्य के लिए संबोधन नहीं है. वो सिर्फ एक औरत या सिर्फ आदमी के संकुचित दायरे से बाहर आकर एक पूर्ण मनुष्य के अस्तित्व को गरिमा प्रदान करने वाला आत्मबल है.

वो सिर्फ ताली बजाकर आपका मनोरंजन करने के लिए नहीं है, कभी कभी कोई जोयिता मंडल की तरह भी होता है जो जब अपनी पूर्णता पर आता है तो लोग वाहवाही में ताली बजाकर स्वागत करते हैं.

– माँ जीवन शैफाली

बस एक दिन तुम लौट आना अपनी देह में…

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2 thoughts on “आज की नायिका : जोयिता मंडल, सिर्फ एक औरत या पुरुष नहीं, एक पूर्ण मनुष्य

  1. समाज का स्वार्थ होता है, अगर समाज को किसी वस्तु में कोई स्वार्थ नही दिखाई दे तो, उस वस्तु की परिहास या तुच्छ समझने लगता है, जब उसी के द्वारा ठुकराई या तिरस्कृत वस्तु या अन्य कोई भी जब एक ऊंचाइयों पर होता है तो समाज उसका तेल भरता है, ऐसा है हमारा समाज।

    समाज के गाल पर जोरदार तमाचा जड़ता ये लेख।

    जय हो जोयीता मंडल।

    सच मे तुम्ही नायिका हो।

    एक पथ प्रदर्शक हो।

    बिग सैल्युट। जय हिंद

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