हाथ से बने सूती सैनेटरी पैड्स : लघु उद्योग का नया सफ़र आप सब के संग

मेरे लिए इससे अधिक प्रसन्नता का विषय नहीं हो सकता कि मेकिंग इंडिया साप्ताहिकी के ‘स्वरोज़गार अंक’ ने कुछ महिलाओं को स्वरोज़गार के लिए प्रेरित किया है. और वे मेरे साथ मिलकर एक ऐसा लघु उद्योग प्रारम्भ करना चाहती हैं, जिसमें शुरुआत में पैसा कम लगे, और एक बार उद्योग चल निकलने पर ही पैसा लगाना पड़े.

वस्तु ऐसी हो जो नियमित उपयोग की हो और जो समाज के लिए भी लाभकारी हो. और उत्पाद आर्डर मिलने पर ही हो.

तो पहला उत्पाद जो हम बनाना प्रारंभ करना चाहते हैं वह है सूती सैनिटरी पैड्स

यूं तो यह वस्तु सिर्फ महिलाओं के लिए हैं लेकिन पुरुष भी अपनी घर की महिलाओं के स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए खरीद सकते हैं.

हम प्रारम्भ करने जा रहे हैं सूती कपड़े के सेनेटरी पैड्स बनाना. आप पूछेंगे यह तो कई लोग कर रहे हैं, इसमें नया क्या है?

तो कई सूती सैनेटरी पैड्स देखने के बाद हम जिस नतीजे पर पहुंचे हैं कि ऐसे सैनेटरी पैड्स बनाए जाएं जिसको आप चाहें तो धोकर दोबारा उपयोग में ला सकते हैं, चाहे तो एक बार उपयोग करके जलाकर फेंक भी सकते हैं.

कंपनी के सिंथेटिक सैनेटरी पैड्स के नुकसान

क्या आप जानते हैं मुम्बई में आई बाढ़ का सबसे बड़ा कारण सैनेटरी पैड्स थे जो कचरे में और अतंत: नदी में फेंक दिए जाते थे.
और यह तो आप जानते ही हैं कि कचरे में फेंके जाने वाले पैड्स कई बार पशुओं द्वारा इधर उधर फेंक दिए जाते हैं.
और यह भी आप जानते हैं कि कंपनी के प्लास्टिक कोटेड पैड्स से त्वचा के रोग दिन ब दिन बढ़ रहे हैं. रेशेस की समस्या तो बहुत ही आम हो गयी हैं.

आप सबसे जो सहयोग चाहिए

मेरी महिला मित्रों से हमें यही सहयोग चाहिए कि वे हमें सुझाव दें कि यदि हम सूती कपड़ों के पैड्स बनाना शुरू करते हैं तो आप उसमें क्या क्या सुविधाएं चाहती हैं?
क्या हम इसे भी Use and burn (Not use and throw) बनाएं?
और कितने लोग खरीदने को तैयार हैं?

यदि आप खरीदने को तैयार है तो कृपया कमेन्ट में बस YES लिख दें. जिससे हम उसकी मात्रा का अंदाज़ा लगा सकें. हमारा प्रयास रहेगा कि यह अन्य सूती पैड्स से सस्ते और सुविधाजनक हों.

लाभ

इससे जो सबसे बड़ा लाभ होने जा रहा है वह मेरी लोकल सखियाँ हैं जो इन्टरनेट की दुनिया से दूर सिलाई का काम करके अपने परिवार का भरण पोषण करने के लिए सिलाई का काम करती हैं और उन गृहणियों की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं है. और वो चाहती हैं कि उन्हें ऐसा काम मिलें जिससे उनको नियमित कमाई मिलती रहें. और वो अपने बच्चों को पढ़ाने जितना अतिरिक्त पैसा कम सके.

हम शुरुआत में इसे No Profit, No Loss पर शुरू करेंगे (बस सिलाई करनेवाली महिलाओं को लाभ मिले). मांग बढ़ने पर ही इसकी कीमत बढ़ाई जाए. ताकि उन सखियों को भी लाभ मिले जो इस लघु उद्योग को शुरू करने के लिए अपनी बचत का पैसा लगा रही हैं.

यह एक पहल है समाज को माहवारी के टैबू से मुक्त करने के लिए.

हमेशा की तरह आपके सुझावों की प्रतीक्षा रहेगी.
कृपया कमेन्ट में खरीदारी के लिए हाँ और ना लिखकर वोट दें ताकि हम किसी निर्णय पर पहुँच सके.

  • माँ जीवन शैफाली
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