मेकिंग इंडिया साप्ताहिकी

जीवन के सप्त रंग, मेकिंग इंडिया के संग
जीवन-रेखा : धरती-सी का रहस्य

गुलाबी बातें गुलाबी गालों की विरासत होती हैं..

जिन गालों पर उदासी का पीलापन चढ़ जाता है उनके हिस्से में आती है दुनिया की रवायतें, ज़िंदगी की रुसवाइयां, इंतज़ार की पहाड़ियां और आंसुओं की नदियाँ…

लेकिन इन चार बातों को रुबाई बनाकर जब कोई दरवेश अपनी आवाज़ में उतारता है तो गुलाबी गालों पर भी एक पीली सी लकीर खिंच जाती है…

उसी पीली लकीर को पगडंडी बनाकर वो गुलाबी राजमार्ग के घने यातायात से उतर आई है- ये लोग कह रहे हैं… और ये ‘उतरना’ शब्द उसे समाज की चरित्र की भाषा के पैरों तले घसीट लाती है…

कभी कोई उन पगडंडियों पर दूर तक उसका पीछा करता है…

आख़िरी बार उसे किसी पहाड़ पर नंगे बदन चढ़ते देखा गया… लेकिन उसकी नग्नता में भी एक दिव्य अनुभूति थी… सफ़ेद झक्क बर्फीले पहाड़ों पर चढ़ते हुए जिसने उस झक्की को देखा वो उसे उस पहाड़ के श्वेत पैरहन से अलग नहीं कर सका….

हाँ वो नग्न है क्योंकि उसने समाज का चोला उतार दिया है… कहते हैं आसमान रोज़ दो बार उसके माथे पर चुनर ओढ़ाता है …

एक बार केसरिया चुनर में सूरज को टांक कर वो सबको आशीर्वाद देने पहाड़ों से नीचे उतरती है….
दूसरी बार काली चुनर में शक्ति कणों को समेटने पहाड़ों के रहस्यमयी अंधेरों में गुम हो जाती है…

वो कहाँ जाती है ये धरती का रहस्य है जिसे केवल वही जान सकता है जिसमें दिगम्बर (आसमान जिसका पैरहन हो) कहलवाने का साहस हो….

और इतना साहसी उसे आज तक नहीं मिला था कोई, जो इस रहस्य को जान सके कि प्रेम को सिर्फ प्रेम के रूप में देखने के लिए बहुत लम्बी यात्रा करना होती है, जहाँ प्रेम स्त्री पुरुष में भेद न जानता हो, जहाँ प्रेम को किसी सामाजिक संबंधों वाले पैरहन की आवश्यकता न हो… जो प्रेम को उसकी नग्नता के साथ स्वीकार कर सके…

हालांकि आती तो वह लबादे ओढ़कर ही है… कभी माँ बनकर, कभी पुत्री बनकर, कभी प्रिया बनकर, कभी सखी बनकर, लेकिन उसे जाते हुए देखने के लिए बहुत साहस चाहिए होता है… क्योंकि नग्नता को अश्लील कहनेवाली दुनिया देह पर पैरहन ही नहीं, चेहरे पर मुखौटे भी मांगती है वर्ना उनकी सामाजिक व्यवस्था में भूचाल आ जाएगा…

इसलिए कभी वह अपनी देह पर फसल ओढ़ लेती है, भूखे को पोषण देने के लिए, कभी नदी को पल्लू बना लेती है, ताकि उसके आँचल में छाया मिल सके प्यासों को, कभी फूल पत्तियों और फलों से कर लेती है श्रृंगार ताकि बनी रहे जीवन की निरंतरता, उसकी सुन्दरता…

यही धरती जब बंजर हो जाती है तो चेहरे पर पड़ी झुर्रियां लिए ले लेती है समाधि अपने मूल स्वरूप को वापस पाने के लिए…

इस बंजर भूमि पर मैंने उस बंजारे को नाचते देखा है, जिसका अपना कोई घर नहीं, सर पर छत नहीं… यह धरती ही उसका ठिकाना है… इस धरती का जाया अपना पूरा जीवन इस धरती पर गुज़ार लेता है… धरती ही उसकी माँ है और प्रेमिका भी… वही जन्मदात्री है और वही मुक्तिधाम भी… जो कहता है –

बंजारों की भाषा
मुझे नहीं आती
लेकिन मैं चाहता हूँ
तुम्हारी देह के किनारों पर
बंजारों की तरह घूमना
बंजारों की ही तरह गीत गाना
मंजीरे बजाना
घुमावदार पगड़ी
और मूंछों के ताव के साथ
मैं उनके कपड़ों के
इन्द्रधनुषी रंगों को
पिरो देना चाहता हूँ
अपनी उन बातों में
जो मुझे सभ्य समाज का होने के कारण
व्यक्त नहीं करने देती
तुम्हारे यौवन के प्रति मेरे आकर्षण को
और मैं उसे प्रेम के लबादे में ओढ़कर
उसका दम घोंट देता हूँ

मैं लथपथ हो जाना चाहता हूँ
अपनी आदिम और बीहड़ इच्छाओं के साथ
तुम्हारी देह की गीली सौंधी मिट्टी में
और सुनों, सिर्फ किनारों पर खड़े होकर
तुम्हारे स्पर्श की मछलियों को
अपनी बलिष्ठ भुजाओं के जाल में नहीं फांसना मुझे
मैं कूद जाना चाहता हूँ तुम्हारे देह के उस झरने के साथ
जो पर्वतों और कंदराओं से निकलकर
न जाने किस समंदर में घुल जाने को आतुर है…

मैं जानता हूँ
मैं वो समंदर नहीं जिसे तुम अपने सात्विक प्रेम को
अंजुली में भरकर अर्पण कर कोई मंजिल पाना चाहती हो

मैं तो बस वो पगडंडी हूँ
जिसके किनारे पर
रात बंजारे ईंट का चूल्हा जलाकर
पेट की अगन का निराकरण करते हैं
और निकल जाते हैं अगली सुबह
अपनी चहकती लहकती टोली बनाकर
धरती के किसी और टुकड़े के पास…

क्योंकि मैं जानता हूँ…
मैं जहाँ जाऊंगा मेरे पैरों तले यह धरती होगी ही…
और मैं आसमान बनकर सदैव तुम्हारी तरफ मुंह किये रहूँगा…

न जाने इस गीत में कौन सा जादू था कि उस धरती-सी का रहस्य उजागर होकर पूरे ब्रह्माण्ड को आलौकित कर जाता है… और दे जाता है जीवन का सूत्र कि प्रकृति के रहस्यों को जानने के लिए हमेशा आध्यात्मिक होना ही ज़रूरी नहीं, प्राकृतिक हो जाना भी काफी है…

और वह जब भी काली चुनर में शक्ति कणों को समेटने पहाड़ों के रहस्यमयी अंधेरों में गुम हो जाती है… तो उन पहाड़ों से किसी दरवेश के गाने की आवाज़ आती है…

“नदी है जाई जमीं की, नदी को बहने दो…
जमीं को फूलों के पेड़ों के सब्ज़ गहने दो……………………. ”

जय जय नाथ जय नवनाथ, नाथ अनाथ के कनीफ़नाथ
जल के नाथ थल के नाथ, नाथ अनाथ के कनीफ़नाथ

नदी है जाई जमीं की, नदी को बहने दो…
जमीं को फूलों के पेड़ों के सब्ज़ गहने दो

पशु बनूँ मैं, पखेरू हवा में उड़ते रहें
पहाड़ी रास्ते जाकर घरों को मुड़ते रहें
जमीं गरजती रहे बिजलियों की गोली से
भरा रहे ये गगन बादलों की होली से

तुम्हारा न्याय हमेशा जहां में जारी रहे
सुनहरी खेतों की माटी उपज से भारी रहे…

– माँ जीवन शैफाली

नदी है जाई जमीं की, नदी को बहने दो… (गुलज़ार रचित, फिल्म आस्था का गीत)

जीवन-रेखा : पहुंचेली

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