मेकिंग इंडिया

जीवन के सप्त रंग, मेकिंग इंडिया के संग

5 Minutes Craft : छोटे परिवर्तन जो लाते हैं बड़े बदलाव

मैंने अक्सर गृहणियों को रोज़-रोज़ एक ही तरह के काम से उकताते हुए देखा है. एक ही ढर्रे पर काम करते हुए वो उसकी इतनी अभ्यस्त हो जाती है कि उनको नींद में से उठाकर भी कुछ पूछ लो तो किसी भी वस्तु के बारे में बिलकुल सही-सही जानकारी दे

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हम तो ऐसे हैं भैया

ज्ञान और शिक्षा में अंतर उतना ही है जैसे आत्मा और शरीर में है. आत्मा अपने पूर्व जन्मों से कुछ ज्ञान लेकर आती है जैसे एक बना बनाया घर हो और जन्म के बाद शिक्षा का अर्थ कुछ यूं है जैसे उस घर को सुन्दर बनाने के लिए सजावट का

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कालबेलिया : नागलोक की परियों का धरती पर नृत्य

काला रंग मुझे हमेशा से आकर्षित करता है. कहते हैं काला रंग काला इसलिए है क्योंकि वो सारे रंगों को सोख लेता है, परावर्तित नहीं करता… तो इन नागलोक की परियों ने भी जैसे जीवन के सारे रंग सोख लिए हैं, और फिर इनको लिए जब गोल घूमती हैं तो

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गाड़ी बुला रही है, सीटी बजा रही है…

क्या आपने कभी ऐसा सफर किया है जिसमें मंज़िल से बहुत अधिक मतलब नहीं होता? जहाँ सफर करने का उद्देश्य सिर्फ सफर ही हो? अगर किया हो या कभी करेंगे तो आप देखेंगे कि जब किसी मंज़िल पर जाना हो तो हम तीव्रतम साधन चुनते हैं, जैसे हवाई जहाज़, ट्रेन,

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वो दुनिया मेरे बाबुल का घर … ‘ये’ दुनिया ससुराल…

पिछले हफ्ते लगातार एक सवाल मुझसे अलग-अलग लोगों द्वारा पूछा गया, मेकिंग इंडिया का उद्देश्य क्या है? सबको अलग-अलग जवाब दिए हैं, राष्ट्रवादियों को राष्ट्र सेवा, आध्यात्मिक लोगों को आध्यात्मिक सन्देश, जीवन को भरपूर जीने वालों को जीवन के सारे रंग उड़ेलते हुए सकारात्मक उद्देश्य…. अलग-अलग लोगों के लिए मेकिंग

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सामाजिक व्यवस्था और विवाहेतर सम्बन्ध, ब्रह्माण्डीय व्यवस्था और जीवनोत्तर यात्रा

विवाह को लेकर हमारे यहाँ जहां सात जन्मों की कसमें खाई जाती हैं, उसके पीछे क्या भाव होते हैं? आज के आधुनिक समाज में क्या रिश्ते वास्तव में इतने टिकाऊ और विश्वासपूर्ण रह गए हैं? यदि वास्तव में ऐसा है तो विवाहेतर सबंधों की अचानक से बाढ़ क्यों आ गयी

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प्रेम : कपूर टिकिया सा, जो ख़ुद अपनी गन्ध बिसरा के स्वयं बिसर जाए

प्रेम कोई कथ्य नहीं कोई विचार नहीं जिसे साझा किया जाए शब्दों में कभी कभी लगता है कि प्रेम अहसास भी नहीं. क्योंकि कैसे ही इसे महसूस करना शुरू करो यह खत्म होना शुरू हो जाता है. इसलिये इसे महसूस भी मत करना चाहिए. बस जी लेना चाहिए. प्रेम कोई

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आत्मा चाहे जितनी पुरानी हो, देह की चाहे जितनी उम्र हो, आप फिर भी बने रहें चिरयुवा

चिरयुवा बने रहने के लिए मनुष्य को कुछ विशेष बातों का ध्यान रखना चाहिए. समय निरन्तर प्रवाहमान है. अतः आयु को बढ़ने से कोई रोक नहीं सकता. आयु के हर पड़ाव में मनुष्य कुछ विशेष सावधानियाँ बरतकर स्वस्थ और प्रसन्न रह सकता है. अपनी वृद्धावस्था में जब शरीर अशक्त होने

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जो तुरंत संतुष्ट हो जाये वही ‘आशुतोष’ है

सेन्स/ न्युसेंस सेन्स और न्युसेंस में अंतर होता है. जिज्ञासा वश पूछे गए प्रश्न सेन्स की श्रेणी में आते हैं और ध्यानाकर्षण के लिए उछाला गया प्रश्न न्युसेंस की श्रेणी में आता है. जिज्ञासा हमें सेन्सिबल व्यक्ति की श्रेणी में रखती है. तो ध्यानाकर्षण हमें नॉन्सेन्सिकल व्यक्ति के रूप में

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टेलिफ़ोन धुन में हँसने वाली मनीषा : ‘सौदागर’ से ‘डियर माया’ का सफ़र कैंसर की राह से गुज़रकर

मनीषा, मुझे पसंद है सिर्फ उसकी सुन्दरता के कारण नहीं, उसकी प्यारी मुस्कान के कारण नहीं, उसके सहज अभिनय के कारण नहीं, बल्कि उसकी जिजीविषा के कारण जिसकी वजह से वो खुद को मौत के मुंह से खींचकर ले आई… अपनी आधुनिक जीवन शैली के लिए हमेशा चर्चा में रही

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