मेकिंग इंडिया साप्ताहिकी

जीवन के सप्त रंग, मेकिंग इंडिया के संग
तरानों से झांकते प्रेमप्रश्न

तरानों का संसार प्रेमियों का प्रकाश-लोक है. एक ऐसा लोक, जहाँ उनके सभी प्रश्नों के काव्यात्मक उत्तर रहते हैं.

मसलन, प्रेमिका को पूछना हो कि जब हमारा साहचर्य नहीं होता तो आप क्या करते हैं? तो बरबस ही, स्मरण के किसी कोने में एक तराना चहक जाता है : “क्या करते थे साजना, तुम हमसे दूर होकर?”

अवश्य ही, अतृप्त चक्षुओं से प्रेमी भी पूछता रहा होगा, कि आप क्या करते थे, अपना भी बताएं? तिस पर नायिका स्वयं कह देती है : “हम तो जुदाई में अकेले, छुप छुप के रोया करते थे!”

तथापि, अब न वो काल रहा, और न ही प्रेमियों में वो चाहनाएँ बची हैं. दशकों पूर्व, जब सूरज डूब जाता था, तो मनुष्य के पास स्वयं को व्यस्त करने का कोई विकल्प शेष न था.

सिवाय इसके कि वह खुले आसमाँ के नीचे बैठ जाए और आकाश में टिमटिमाती रौशनाइयों को निहारे. सबसे बड़े रुई के गोले से पूछे : “कि देखा है कहीं, मेरे यार-सा हसीं?”

इस तरह गुज़रने वाली शामों में, खूब सारा वक़्त इंसान के पास था. वो अकेले में विचार कर सकता था कि आज उसने किसका दिल दुखाया? उसकी आत्मा का स्वर क्या कहता है?

और दूजी सुबह, वो उन सभी गलतियों के प्रायश्चित् का निश्चय कर ही सोता था. रिश्ते टूटने से बचते थे. प्रेम सम्बन्ध में प्रगाढ़ता आती थी.

किन्तु आज ऐसा नहीं है. आज इंसान के पास इन सबको सोचने का वक्त नहीं है. रौशनी भी कृत्रिम हो गयी है. आसमाँ और टिमटिमाते तारों को देखने का वक़्त ही नहीं.

प्रेम संबंधों को टूटते वक़्त नहीं लगता. एक झटके में आप किसी को भी अपनी ज़िन्दगी से “ब्लॉक” कर सकते हैं. भले संसार एक ग्लोबल विलेज हो गया हो, किन्तु नज़दीकियों से ज्यादा दूरियां आसान हैं.

तो आजकल गीतों में प्रश्न छाए हैं : “क्या से क्या हो गए देखते देखते…”

गीतों में प्रश्नों की बात हो तो “रफ़ी” और “लता” का स्मरण होना “मंगलाचारण” जैसा है. उनके दो ऐसे यादगार गीत हैं जो पूरी तरह से प्रश्रोत्तरी से भरे हैं.

क्या शुरुआत, क्या अंत, क्या मुखड़ा और क्या छंद, सभी कुछ प्रश्न और उत्तर से आद्यन्त निबद्ध है.

पहला गाना “धर्मेंद्र” और “आशा पारेख” पर फिल्माया गया है. फिल्म का नाम है, “मेरा गांव मेरा देश”.

गांव की लहलहाती फसलों के खेत, दूर तक फैली हरियाली, बैलों द्वारा कुंए से जल सींचने का यन्त्र और उस यंत्र “पुर” पर बैठी नायिका!

कुलमिला कर, इस गीत में गंवई पृष्ठभूमि का पूरा बंदोबस्त किया गया है.

इतना ही नहीं, इस गीत के उठान का उफान कुछ यों है, मानो निराला की कविता का जीवंत उद्धरण देख रहे हों.

“पेट और पीठ दोनों मिल कर हैं एक” – ठीक वैसे ही, नायिका अपनी पीठ और नायक अपने सीने को इस तरह जोड़कर खड़े हैं, कि ग़र “आशा” के पार्श्व में कोई “तिल” होगा तो वो भी “धर्मेंद्र” को चुभेगा!

खैर, “आशा” के होंठ हिलते हैं : “कुछ कहता है ये सावन!”

उतनी देर तक “धर्मेंद्र” उनके कपोलों को चूमने में व्यस्त थे. किन्तु जब वे जान पाते हैं सावन कुछ कह रहा है, तो फिर पूछ बैठते हैं : “क्या कहता है?”

“शाम सवेरे दिल में मेरे तू रहता है!”

सुनकर “धर्मेंद्र” लजा जाते हैं. कहते हैं : “कुछ कहती है ये बदली.”

फिर “आशा” का प्रश्न : “क्या कहती है?”

“शाम सवेरे दिल में मेरे तू रहती है!”

यही शैली है इस गीत की. प्रेमीद्वय में से कोई एक वक्तव्य उचारता है, दूजा उसका कारण पूछ लेता है.

कुलजमा दस प्रश्नों और उनके उत्तरों के सिवा इस गीत में किसी भी व्याप्ति का कोई स्थान नहीं.

हालाँकि बैलों द्वारा कुंए से जल निकाल लेने वाला यन्त्र, “कल-कल” की ध्वनि करता है. किन्तु प्रेम में सब कुछ संभव है. इसी तर्ज पर “आशा” को ये ध्वनि “रिमझिम” सुनाई देती है!

और वे इस “रिमझिम” को प्रेम का “एंथम” कहकर पुकारती हैं.

इसी गीत में, कहीं किसी मोड़ पर “धर्मेंद्र” को लगता है कि पुरवाई उनकी प्रेमिका का संदेश लेकर आई है.

वे ही मनाते हैं कि जब जब वे अपनी प्रेमिका की आँखों को देखते हैं तब तब हर ओर कलियां खिल जाती हैं.

इस गीत का सबसे शानदार प्रश्न तब आता है, जब “आशा” कहती हैं : “भीगी भीगी रातों में…”

इसपर “धर्मेंद्र” ने गीत की धुन से अलग जाकर, बड़ी हसरतों भरी आवाज़ में कहा है : “क्या होता है?”

ये दृश्य और ये लिरिक्स, वर्णनातीत हैं. इन्हें आप देखकर ही जान सकते हैं. इनके बारे चाहे जितना लिखा जाए, कम ही होगा!

गीत के बोल “आनंद बक्षी” के हैं!

चाहे इस गीत की दृश्य-योजना देखें या केवल सुनें, “आनंद बक्षी” और उनका स्वप्नलोक पूरे गीत पर हावी रहते हैं. पूरा गीत ही इनके स्वप्नों की उड़ान मालूम होता है.

कोरियोग्राफर भी प्रेम के “संविधान” का पालन करते हैं. कुछ मिनटों के गीत में इतने ऋतु परिवर्तन दिखाये हैं कि सिल्वर स्क्रीन के सम्मुख बैठा दर्शक, समूचे इहलोक का दर्शन कर आता है.

और संगीत!

संगीत तो एज़ यूजुअल, “लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल” ने ही इसे कंपोज किया है.

“रफ़ी” और “लता” के दूजे प्रश्नगीत पर फिर कभी. तब तक के लिए आप सबको नमस्कार, ढ़ेर सारा प्यार.

अस्तु.

– योगी अनुराग

द क्वीन ऑफ़ चैस!

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