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ओ साथी रे दिन डूबे ना : प्रणय का मनुहार गीत

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जब भी तुझे आँख भर देखता हूँ एक बात भेजे में कौंधती है…

क्या?

ये के या तो तू बहुत बड़ी लुल्ल है या बहुत बड़ी चुड़ैल….

उत्तर प्रदेश की पृष्ठभूमि पर राजस्थान की महक वाले मिट्टी के सौंधे से घर के आँगन में दौड़ती दो देहों का यह गीत मुझे तब से बहुत आकर्षित करता है जब से फिल्म ओंकारा रिलीज़ हुई…

दो प्रेमियों की ज़िद का यह गीत, जब गुलज़ार के शब्दों पर चढ़ता है तो श्रेया की मखमली और विशाल की शहद सी मीठी आवाज़ के जादू के साथ परदे पर करीना और अजय की देह में उतरता अनुभव होता है…

प्रेम के गीतों के दैहिक प्रकटन में बहुत कम लोग कामयाब हो पाते हैं, सामान्यत: वह अंग प्रदर्शन के निम्न स्तरीय दृश्यों के साथ भूला दिए जाते हैं… क्योंकि ऐसे गीतों में, कभी कलाकार नहीं उतर पाते तो कभी निर्देशक… लेकिन जब निर्देशक स्वयं उस गीत को गा रहा हो तो उसे पता होता है गीत को कहाँ पहुँचाना है…

आवश्यक नहीं कि हर गीत को उस ऊंचाई पर ले जाकर सुना जाए जहाँ तक के लिए वह बना ही नहीं, यदि आप एक शुद्ध दैहिक गीत को रूह में उतारने की कोशिश करेंगे तो उसका जादू परवान चढ़ने से पहले ही दम तोड़ देगा…

और बात जब गुलज़ार के लिखे गीत की हो तो वह गीत दैहिक होते हुए भी प्रकृति हो जाता है… आखिर ब्रह्माण्ड का प्रकटन यह संसार ही तो है… तो विशाल भारद्वाज को गाते हुए और अपने ही गाये गीत का निर्देशन करते हुए यह पता है कि सूरज को आकाशगंगा के असंख्य तारों की भीड़ से निकालकर कैसे उसकी धूप की किरण को पृथ्वी की नाभि पर ऊंगली के समान दर्शाना है…

इसलिए जब नायिका नायक के साथ झूठमूठ की अटखेलियाँ करने उसके पीछे भागती है तो वह सूरज ढलने की प्रतीक्षा में उसकी किरणों से जल रही देह का निमंत्रण होता है… इसलिए वह चाहती है कि सूरज जल्दी से ढल जाए, लेकिन चूंकि नायिका नायक से झूठमूठ के लड़ाई कर रही है तो ज़िद पर अड़ी है कि आज सूरज को डूबने न देंगे… और कहती है…

ओ साथी रे दिन डूबे ना
आ चल दिन को रोके
धूप के पीछे दौड़ें, छाँव छुए ना
ओ साथी रे…

और नायक उसकी लड़ाई में शामिल होकर यूं तो आगे भाग रहा है लेकिन यह नायिका से दूर भागने का नहीं, उसके करीब आने की दौड़ है… फिर भी उसको खुश करने के लिए कहता है….

थका-थका सूरज जब नदी से होकर निकलेगा
नायिका उसके सुर में सुर मिलते हुए कहती है…
हरी-हरी काई पे, पाँव पड़ा तो फिसलेगा

नायक कहता है – तुम रोक के रखना, मैं जाल गिराऊँ
नायिका कहती है – तुम पीठ पे लेना, मैं हाथ लगाऊँ
दिन डूबे ना हाँ
तेरी मेरी अट्टी-बट्टी
दांत से काटी कट्टी
रे जईयो ना
ओ पीहू रे
ओ पीहू रे, ना जईयो ना

प्रणय पूर्व क्रिया की प्रतिक्रिया में डूबकर नायिका नायक के सीने पर बन्दूक तान कर पूछती है…

बताओ मुझे लुल्ल क्यों कहा?
इतनी खबसूरत होकर मुझ जैसे से प्यार जो करने लगी…
और चुड़ैल??
इस ख़ूबसूरती में कहीं कोई तंतर मंतर तो नहीं साला……

मखमली गीत में प्रणय के आक्रमक पलों की फिसलन और नायक के बेबाक चुम्बन, गीत को जितना कामुक बनाता है उतना ही मखमली आवाज़ का जादू परवान चढ़ता है…

यूं तो किसी भी गीत की रिकॉर्डिंग में यह ध्यान रखा जाता है कि गायक की साँसों की आवाज़ रिकॉर्ड न होने पाए लेकिन इस गीत में हर पंक्ति के शुरू होने से पहले गायकों के सांस भरने की आवाज़ मुझे लगता है जानबूझकर ली गयी है… जो गीत के दृश्यांकन को रूमानी एहसास देता है…

जो गीत के दूसरे अंतरे में अपना कमाल बखूबी दिखाता है जब नायिका कहती है…
कभी-कभी यूँ करना, मैं डांटूं और तुम डरना
उबल पड़े आँखों से मीठे पानी का झरना
तेरे दोहरे बदन में, सिल जाऊँगी रे
जब करवट लेगा, छिल जाऊँगी रे…

गीत की शुरुआत नायिका के नायक के पीछे की दौड़ से होती है, जब मैंने कहा था यह गीत एक दूसरे के करीब आने की दौड़ है… जो प्रणय के दृश्यों के पीछे गूंजती नायक की इन पंक्तियों के साथ रुकती है कि –

संग ले जाऊँगा
तेरी मेरी अंगनी-मंगनी, अंग संग लागी संगनी
संग ले जाऊँ, ओ पीहू रे
ओ साथी रे…

– माँ जीवन शैफाली

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