मेकिंग इंडिया साप्ताहिकी

जीवन के सप्त रंग, मेकिंग इंडिया के संग
मित्रों! झोला उठाने का वक्त आ गया है

यूपी के बाज़ार से पॉलीथीन बेदख़ल हो गई। ठीक हुआ! जब किसी के जीवन में कोई दखलअंदाजी की बेइंतहा कर जायेगा तो उसे बेदखल होना ही पड़ेगा.. सौदा कैसा भी हो… कच्चा, पक्का, सूखा-गीला, ठन्डा-गरम हर एक सौदे के लिये मुंह बाये तैयार रहती थी ये।

सबके उंगलियों में लिपटने और लटकने का जो नशा इनमें था वो कम लोगों के भीतर रहता है। बेपर्दगी की तो हद पार कर दिया था इन्होंने। वैसे किसी को इतना भी हल्का और पारदर्शी नहीं होना चाहिए कि लोगबाग आपकी पूरी औकात नाप लें।

आदमी बड़ी मेहनत और जुगाड़ से इज्जत कमाता है.. इज्ज़त कमाने के लिए न जाने कितने तिकड़म करने पड़ते हैं…छोटी-मोटी उपलब्धियों को फैलाना पड़ता है। बड़ी-बड़ी कमियों पर पर्दा डालना पड़ता है.. महंगाई के दिनों में सौ रूपये किलो वाले टमाटर को डरते सहमते डेढ़ सौ ग्राम खरीद कर दुनिया के सामने साढ़े सात सौ ग्राम की खरीदारी बताकर अपनी शेखी बघारने के साथ सरकार पर निशाना साधना पड़ता है।

इन सब कारसाजी के लिये आवश्यक है ऐसा मित्र जो आपकी कमियों को अपनी पेट में छिपाकर चले। ऐसा नहीं कि आपका शिमला मिर्च खाने का मन हो लेकिन बारह रूपये का सौ ग्राम की कीमत सुनकर आप तीन बार ठेले पर अपनी हिम्मत तोड़कर बैठ जायें… बार- बार आपका हाथ टिन्डे पर लपके।

तभी आपकी हिम्मत और हालत देखकर सब्जी वाला कहे कि चलिए साहब आपके लिए पच्चीस रुपये पाव लगा दूंगा. अब आप करेंगे क्या? धीरे से दस की दो नोट दस की बढ़ाकर बोलेंगे “दे दो भैया दो सौ ग्राम!” सब्जी वाले ने एक नन्हा सा बटखरा पल्ली तरफ़ फेंका और उल्ली तरफ रख दिया दो शिमला मिर्च..

ऐसा ही दुर्घटना सेब की दुकान पर घटी

“सेब कैस कैसे दिये भैया?”
“200 रू किलो” फल वाले ने लापरवाही से बोला..

आपने फल के लिए पचास का बजट बनाया है। लेकिन पचास में चढ़ेंगे कितने? बड़ा- छोटा मिलाकर कुल दो अदद..

दुकानदार का क्या! बोरा उठाकर एक भारहीन और रंगहीन पन्नी उठाया और डाल दिया दो शिमला या दो सेब। अब परेशानी यह कि अपने चौराहे के जिस पान की दुकान पर आप क्रेटा और क्रिस्टा के फीचर बता रहे थे उसी चौराहे पर से एक उंगली में दो शिमला और दो सेब फंसाकर कैसे पार करेंगे.. आपकी पूरी हैसियत का फालूदा चवन्नी की पन्नी ने बिगाड़ दिया..

घर में मेहमान आये लेकिन चायपत्ती खत्म.. आप ने लड़के को तेज़ी से चायपत्ती, बिस्कुट और नमकीन लाने के लिये दुकान पर भेजा। उधर पांच मिनट में आपका लड़का पन्नी में चायपत्ती और नमकीन झूलाते मेहमान के सामने से पार हो गया।

मेहमान न चाहते हुए भी पारदर्शी पन्नी में अपनी आवभगत की सामग्री झांक लिया। ऐसा नहीं कि सामान्यतः किसी के घर चायपत्ती उगायी जाती हो या बिस्कुट बेक किया जाता हो फिर भी मेहमान के दिमाग में खुदबखुद यह विचार पनपेगा कि खामखाँ मेरी वजह से आप डेढ़ सौ के खर्चे में पड़े। दरअसल सारा खेल यह पन्नी खराब करता है। बिना नुमाइश लगाये इसको चैन नहीं पड़ता।

आपने आफिस से लौटते वक्त सोचा कि तीन किलो आम खरीद लें। बताइए! पैसा आप खर्च करेंगे आम आप चूसेंगे लेकिन आपका पड़ोसी बिलावजह आपको बताने चला आयेगा.. भैया! दशहरी मे अब वो बात नहीं जो चौसा और कपूरी में है.. अबकी मंडी में बढ़िया माल उतरा है चौसा और कपूरी का। लो साहब! चले आये राय देने.. ये जो पॉलीथीन है न! बड़ी चुगलखोर .. कोई बात पचाना, इसके बस में तो जैसा था ही नहीं। एक वो काली वाली थी वही एक गंभीर थी और सब के सब पेट की कच्ची, बिल्कुल लाऊडस्पीकर..

वैसे अब सराफत का जमाना रहा कहाँ? अपने झोला बाबू अपनी मजबूती और आयतन पर इतराते रहे उधर पॉलीथीन ने अपने नुमाइशी एवं स्लिम बदन के बल पर इनके साम्राज्य पर चाबुक चला दिया।

झोला बाबू वजन तो बहुत थाम लेते हैं लेकिन पानी वाला मामला इनसे नहीं सम्हलता, उधर पॉलिथीन का मामला कुछ ऐसा है कि इसमें दिखता तो सब है लेकिन द्रव और गैस तक को अपनी पकड़ और जकड़ कर रखती हैं इसलिए बड़ी प्रिय सखी बनी रहीं सबकी। वैसे उत्तर प्रदेश से पहले भी इनके रहने और घूमने पर प्रतिबन्ध लग चुका है लेकिन ये कोर्ट-कचहरी से लड़कर दुबारा चलीं आती हैं इसलिए कब ये दुबारा लौट आवें कोई भरोसा नहीं।

मित्रों! झोला उठाकर चलने का समय आ गया है। वैसे झोला उठाकर चलने में कोई बुराई नहीं.. बस हिमालय मत जाइएगा। बाज़ार से सब्जी-भाजी तेल नमक लेकर घर लौट आइएगा। कुछ दिन पॉलिथीन की कमी ज़रूर खलेगी लेकिन यकीन मानिए कुछ दिन बात बहुत सुकून भी मिलेगा.. तो उठाइए झोला और निकल पड़िए।

– रिवेश प्रताप सिंह

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