मेकिंग इंडिया साप्ताहिकी

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बाल साहित्य : चीकू की बुद्धिमानी

नीकू चीकू चंपकवन के बहुत प्यारे खरगोश थे। दोनों एक दूसरे के लंगोटिया यार थे और एक दूसरे पर जान छिड़कते थे। पूरे चंपक वन में वो कभी किसी को अकेले नहीं दिखते थे। जहाँ भी जाते एक दूसरे के गले में हाथ डाले पंहुच जाते।

नीकू थोड़ा गंभीर और बेहद सीधा सादा और कुछ डरपोक सा था लेकिन चीकू एकदम मस्त मौला था। पूरे समय हंसते खिलखिलाते रहता था। लेकिन दोनों हर समय किसी भी जानवर के सुख दुख में आगे से आगे खड़े रहते थे। पूरा चंपकवन उनको बहुत प्यार करता था।
चीकू मस्त मौला जरूर था लेकिन बुद्धिमान बहुत था। नीकू चीकू मिलकर चंपकवन के जानवरों की कैसी भी समस्या का हल खोज निकालते थे।

एक बार चंपकवन में भूले भटके एक शिकारी आ गया। सारे छोटे जानवर उसके हाथ में बंदूक देखकर डर गये और इधर उधर छिप गये। नीकू घबरा गया उसने चीकू को अपनी सुरंग में छिप जाने को कहा। लेकिन चीकू तो किसी से नहीं डरता था। उसने मीकू बंदर से बात की और चीकू मीकू ने मिलकर उस शिकारी को इतना छकाया कि बेचारे शिकारी ने कान पकड़ लिए कि अब वो कभी चंपकवन में नहीं आएगा।

चंपकवन के सारे जानवरों ने चीकू और मीकू को सिर आँखों पर बैठा लिया। अब तो नीकू चीकू के साथ मीकू भी आ गया। तीनों की तिगड़ी पूरे चंपकवन में फेमस हो गयी। हर जगह अब तीनों साथ दिखने लगे।

लेकिन उनकी तिगड़ी को पता नहीं किसकी नजर लग गयी। एक दिन चीकू अचानक रात में कहीं गायब हो गया। सुबह सबसे पहले नीकू को इस बात का पता चला। उसने रो रो कर पूरा चंपक वन सिर पर उठा लिया। मीकू और सारे बंदर उसे समझाते रहे कि रोने से कुछ नहीं होगा हमें मिलकर चीकू को ढूँढना होगा। मीकू ने खूब ऊंचे ऊंचे पेड़ों पर चढ़कर चारों तरफ नजर दौड़ाई। लेकिन उसे चीकू कहीं नजर नहीं आया।

चंपकवन के सारे जानवर उदास हो गये। सभी चीकू के लिए परेशान थे। चारों ओर सन्नाटा पसरा हुआ था। सुबह से किसी ने कुछ भी नहीं खाया था। दोपहर होते होते चीकू के गायब होने की खबर चंपकवन के राजा शेरसिंह के पास पंहुची। उसे भी चीकू के गायब होने का बहुत दुख हुआ। तुरंत एक मीटिंग बुलाई गयी। शेरसिंह ने डुगडुग डाॅगी को चीकू को ढूँढनें का काम सौंपा। डुगडुग ने नीकू चीकू की गुफा के पास जाकर सूंघना शुरू किया। उसे चीकू के साथ किसी आदमी के होने की गंध महसूस हुई। वो उसी गंध के सहारे आगे बढ़ता चला गया। चलते चलते वो चंपकवन से बाहर आ गया। अब उसके लिए चीकू की गंध को पहचान पाना थोड़ा मुश्किल हो रहा था क्योंकि यहाँ कंकरीट के जंगल थे पेड़ों का नामों निशान नहीं था। आगे चलते चलते वो एक खंडहर के पास पंहुचा। वहाँ एक कमरा बंद था। डुगडुग को लगा वहाँ शायद चीकू हो। उसने धीरे से फुसफुसाते हुए चीकू को आवाज दी। चीकू ने डुगडुग की आवाज को पहचान लिया। वो दरवाजे के पास आया और धीरे से बोला,

“डुगडुग भैया! मुझे यहाँ से निकालो। मुझे दो लोग रात को चंपकवन से पकड़ लाए हैं और कल सुबह यहाँ से कहीं दूर ले जाएँगे। हमारे पास बस आज रात तक का समय है।”

डुगडुग ने उसे सांत्वना देते हुए कहा,

“तुम चिंता न करो। मैं अभी चंपकवन जाकर सभी जानवरों को लेकर आता हूँ।”

“अरे नहीं हमें सबकुछ चुपचाप करना है। जो लोग मुझे पकड़कर लाए हैं उनके पास बड़ी बड़ी बंदूकें हैं।”

“तो क्या करें हम?”

डुगडुग उदास हो गया।

थोड़ी देर चीकू कुछ सोचता रहा। फिर धीरे से डुगडुग को कुछ समझाता रहा। डुगडुग को सब समझ आ गया उसने फुसफुसाते हुए कहा,

“चीकू तुम अपना काम शुरू करो, मैं तब तक नीकू और मीकू को लेकर आता हूँ।”

डुगडुगु तेजी से भाग कर चंपकवन पंहुचा और नीकू और मीकू को अपने साथ लेकर दुबारा उसी खंडहर में पंहुच गया। चीकू ने नीकू और मीकू की आवाज सुनी तो बह बहुत खुश हुआ उसने जल्दी से नीकू को सब समझाया कि उसे क्या करना है। नीकू ने खंडहर के बाहर से दीवार के नीचे से जमीन में सुरंग खोदना चालू कर दिया। उधर अंदर चीकू अब तक लगभग एक फीट की खुदाई कर चुका था। मीकू छत पर चढ़कर बैठ गया ताकि दूर से आते हुए लोगों को देख सके। डुगडुग ने दरवाजे के पास पहरा देना शुरू कर दिया। रात होने तक दोनों तरफ से काफी खुदाई हो चुकी थी। लेकिन काम अभी भी बाकी था। चारों मिलकर मुस्तैदी से अपनी अपनी ड्यूटी निभा रहे थे।

सुबह सूरज की पहली किरण फूटते ही अंदर से बाहर तक सुरंग पूरी खुद गयी। नीकू चीकू अंदर ही एक दूसरे से गले मिले। तभी मीकू छत पर से चिल्लाया,

“जल्दी करो कुछ लोग इधर ही आ रहे हैं।”

नीकू चीकू बाहर की ओर भागे। बाहर आकर चीकू ने मीकू और डुगडुग का धन्यवाद दिया और चारों ने चंपकवन की ओर दौड़ लगा दी।

चीकू की सूझबूझ और नीकू मीकू डुगडुग के प्रयास से एक बार फिर चंपकवन में खुशियाँ लौट आईं..

– अलका श्रीवास्तव

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