मेकिंग इंडिया

जीवन के सप्त रंग, मेकिंग इंडिया के संग

ग्रामीण महिलाओं में माहवारी और स्वच्छता के प्रति जागरूकता का एक सार्थक प्रयास

नारीवादी स्त्रियों ने सोशल मीडिया पर पीरियड को लेकर तमाशा बनाया हुआ हैं। लेकिन उन्होंने क्या कभी महिलाओं को मासिक धर्म स्वच्छ्ता पर किसी को जागरूक किया है? शायद नहीं। टीवी से लेकर सोशल मीडिया तक पर माहवारी के समय पैड उपयोग करने की बाढ़ आ गयी हैं। लेकिन उस

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पुनीत उपमन्यु का पुनीत कार्य : Garden On Concrete, एक कदम हरियाली की ओर

अपने प्रियजनों को टूटे हुए फूलों के गुलदस्ते देने से बेहतर है कि एक ज़िंदा पौधा उपहार में दें Learn the art of gardening at GreenShala Garden On Concrete, एक कदम हरियाली की ओर दोस्तों, मैं समाज के लिए निःस्वार्थ कार्य करता आ रहा जिसको मैं दर्शाना उचित नहीं समझता.

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Start Up Stand Up : सोशल मीडिया पर स्वरोजगार से स्वावलंबी बनी स्त्रियाँ

मेकिंग इंडिया साप्ताहिकी मेरे लिए एक प्रयोगशाला है, जिसके माध्यम से मैं अपने अन्दर छुपी रचनात्मकता को हर बार नए रूप में प्रकट करती हूँ. कभी कुछ अच्छा बन जाता है, कभी बिगड़ भी जाता है, लेकिन मेरे लिए यह बिगड़ा हुआ रूप एक सबक होता है अगली बार और

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इस समय यही रंग और टी-शर्ट शुभ है देश के लिए

जनहित में, राष्ट्र प्रेम में और सिर्फ और सिर्फ प्रधानमंत्री मोदी के प्रेम में श्री देवराज सिंह बिना कोई लाभ कमाए यह टी शर्ट बेच रहे हैं. यदि आपको भी यह टी शर्ट चाहिए तो इस नंबर पर उनसे संपर्क करें – +91 73055 50646 Size 28, 30 for kids

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दिन के हिसाब से रंगों का महत्व और उसके पीछे के ज्ञात, अज्ञात कारण

सोमवार – सोमवार को हलके रंग के कपड़े पहनना चाहिए, सफ़ेद, आसमानी, हल्का गुलाबी. इसके पीछे जो कारण बताया जाता है वह यह कि सोमवार चन्द्र देव का दिन होता है जो शीतलता प्रदान करते हैं. मंगलवार – मंगलवार को भगवा, संतरा, संतरा-पीला, सिंदूरी-संतरा और लाल रंग पहनना शुभ और

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नवरात्रि : 9 दिन उपवास में ये 9 बातें बढ़ाएंगी आपकी ऊर्जा

दिनांक 6 अप्रेल 2019 से चैत्र नवरात्रि प्रारम्भ हो रही हैं, जो लोग नौ दिन का उपवास रखते हैं उनके लिए मैं अपने सीमित ज्ञान से मिले कुछ अनुभवों के बारे में विस्तार से बताना चाहूंगी ताकि आपके उपवास से आप अपनी शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक ऊर्जा को अधिक से

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नायिका – 23 : तीन शब्दों का जादू

उन तीन लफ़्ज़ों को लेकर घर लौटी… सिर दर्द का बहाना बनाकर औंधे मुंह लेटी रही… 2 घंटे निकल गये… शायद यकीन न आये तुमको लेकिन अपनी 33 साल की उम्र में हज़ारों बार ये शब्द कहे होंगे और सुने होंगे लेकिन ऐसा पहली बार हुअ कि मेरे कहने से

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अर्जुन – 3 : ख्यालों के पुलाव नहीं होते पात्र

और ये हर बार तुम अज्ञेय सी क्लिष्ट भाषा में बात क्यों करने लगते हो. क्यों उपन्यास की गुणवत्ता में भाषा का कोई सहयोग नहीं होता? तुम्हारा मतलब है प्रेमचंद और गुरुदत्त अच्छे उपन्यासकार नहीं थे? मैंने ये तो नहीं कहा… भाषा ऐसी हो जो सबको समझ आए… प्रेमचंद पढ़ने

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अपने जीवन का तो एक ही फंडा है जानम, हंसिबा खेलिबा धरिबा ध्यानं

जब संयम साधो तो साधते चले जाओ जब संसार साधो साधते चले जाओ यह मत देखो क्या साधा जा रहा है, देखो यह कि क्या तुम्हें साधना आ रहा है… कहते हैं न एक साधे सब सधे… इसलिए आप जब संन्यास को साध लेते हैं तो आपकी सारी बातें एक

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