मेकिंग इंडिया साप्ताहिकी

जीवन के सप्त रंग, मेकिंग इंडिया के संग
मैं हूँ, मैं हूँ मैं हूँ डॉन…

मेरे घर के पास बड़ा सा आँगन है, चूंकि वहां आवाजाही अधिक नहीं कर पाते इसलिए वह आँगन प्राकृतिक जंगल में परिवर्तित हो चुका है. तो वहां कुत्ते बिल्ली के अलावा सांप और नेवले भी उछलकूद मचाते रहते हैं, बारिश के दिनों में तो पानी इतना भर जाता है कि मछलियाँ तक तैरने लगती हैं. और चूंकि उस जंगल में और घर के आँगन में नीम, पीपल, आम, अमरुद के पेड़ के अलावा छोटा सा किचन गार्डन और तरह तरह के फूलों के पौधे हैं. इसलिए वहां दिन भर रंग बिरंगी तितलियाँ और पक्षी मंडराते रहते हैं.

बाजू वाले जंगल में तो न जाने कितने पशुओं की डिलेवरी हुई हैं, गायें तो अक्सर यहीं बियाने आती है. पिछले साल तीन पपीज़ का भी जन्म हुआ था. मेरे बच्चे दिन भर उनसे खेलते रहते, कभी कभी घर वाले आँगन में भी घुस आते. फिर एक दिन मोहल्ले के बाहर के कुत्तों ने उनमें से एक को काटकर ज़ख़्मी कर दिया. तो कुछ दिन वह बीमार रहा, खा पी नहीं पाता था, कुछ विक्षिप्त सा हो गया था, बच्चे दूर से रोटी बिस्किट डाल देते थे लेकिन वह खाता ही नहीं था. फिर एक दिन वह न जाने कहाँ गायब हो गया पता ही नहीं चला.

बच्चे कहते हैं वह Evil हो गया था इसलिए वह अपने आप गायब हो गया ताकि दूसरे कुत्तों को भी वह Evil न बना दें. बच्चे भी न जाने कहाँ कहाँ से क्या क्या देखकर किस्से कहानियां गढ़ लेते हैं.

फिर बाकी जो दो कुत्ते बचे थे वो दोनों मादा थीं, तो अभी कुछ दिनों पहले दोनों ने एक साथ चार चार बच्चों को जन्म दिया उसी जंगल में दो अलग अलग स्थान पर अपने लिए जगह को सुविधाजनक बनाकर.

अब बच्चे तो खुशी के मारे उछल पड़े, कहाँ तो दो कुत्तों के साथ खेलते थे और कहाँ अब आठ बच्चे … नए नए जन्मे थे तो आँख भी नहीं खुली थी… बच्चे रोज़ झाँकने जाते, उन पपीज़ की आँखें खुली या नहीं… उनकी माँ भी जगह नहीं छोड़ती थी तो दोनों को वहीं खाना पहुंचा दिया जाता. बाहर के कुत्ते आ जाते तो मोहल्ले के सारे बच्चे उनको मार भगा देते… इन आठ बच्चों की सुरक्षा का जिम्मा घर और कॉलोनी के बच्चों ने संभाल लिया.

पपीज़ ने आँखें खोल ली हैं, माँ को छोड़कर अब इधर उधर मंडराते दिख जाते हैं, शाम को ठण्ड बढ़ जाती और बच्चे इधर उधर घूमते दिखते तो कॉलोनी के सारे बच्चे एक-एक को उठाकर उनकी माँओं के पास उनके बनाए घर में बिठा देते… बच्चों ने कार्टन जमा करके उन सबके लिए एक डॉग हाउस जैसा भी बना लिया है.

इधर ठण्ड अपना कहर ढा रही थी, रात में ठण्ड के मारे पपीज़ के चिल्लाने की आवाज़ आने लगी थी… बच्चे ज़िद पर अड़ गए, उन कुत्ते के बच्चों के लिए कम्बल दे दो… मैंने बहुत समझाया, उनका शरीर ऐसा बना होता है उनको ठण्ड नहीं लगती…

नहीं… देखो मम्मा बच्चे कैसे कांप रहे हैं ठण्ड से…

ठीक है भैया … घर में एक पुराना शॉल पड़ा था वो कुत्ते के बच्चों को ओढ़ा दिया गया. एक बच्ची अपने घर से अपनी एक पुरानी गुड़िया ले आई और उन पपीज़ को खेलने के लिए दे दी. सब पपीज़ के नाम रख दिए गए, सारे बच्चे आठों को अलग अलग नाम से पहचानते हैं और पपीज़ भी उनका नाम पुकारने पर दौड़े चले आते हैं.

एक भरा पूरा परिवार बन गया है. कॉलोनी में कोई संदिग्ध व्यक्ति आ जाता है तो ये मोहल्ले के कुत्ते भौंक भौंक कर सबको सतर्क कर देते हैं.

कुत्ते के बच्चे अभी भी बहुत छोटे हैं, उनकी एक माँ उनको छोड़कर दूर निकल जाती है कभी दिखती है कभी नहीं दिखती… आठों बच्चे एक ही माँ के स्तनों से चिपके रहते हैं… बच्चे देखकर कुछ सीख भी रहे हैं.. प्रकृति उन्हें जीवन के सारे पाठ यहीं सड़क पर सिखा रही है… बच्चे यह दृश्य देखकर बोलते हैं देखो बच्चों की मौसी अपने बच्चों के साथ सब बच्चों को दूध पिला रही है… बच्चे ममता का भाव देख रहे हैं, बच्चे जानवरों की सेवा करना सीख रहे हैं, बच्चे एक जुट होकर काम करना सीख रहे हैं…

सबकुछ अच्छा चल रहा था कि एक दिन एक कार कुत्ते के एक बच्चे के पैरों को कुचलती हुई निकल गयी… वह चिल्लाता रह गया… शाम को सब बच्चे खेलने आये तो सबके चेहरे उदास हो गए…

Rocky

अब जब बाकी सात बच्चे अपना मुंह उठाए माँ का दूध पी रहे होते हैं, वह टूटे पैर वाला पपी कोने में पड़ा रहता है, वह अब चल नहीं पाता… बच्चे घर से दूध रोटी या दूध बिस्किट चूर कर ले जाते हैं और उसको खिलाते हैं ताकि वह जिंदा रह सके… अब वह लंगड़ाते हुए कुछ कुछ चलने लगा है लेकिन बहुत कमज़ोर हो गया है… मोहल्ले के सारे बच्चे उसे गोद में उठाये घूमते रहते हैं…

आठ बच्चों के आठ नाम रखे हैं तो मैं उनका नाम पुकारती हूँ तो सब बच्चे मुझ पर हँसते हैं… मम्मा यह रॉकी नहीं, डोरजी है… और यह डॉन है…और इसका नाम यह है उसका नाम वह… वे रोज़ बताते हैं, मैं उनके चेहरों से उन्हें पहचान ही नहीं पाती… और ये बच्चे आठों को उनके नाम से जानते हैं…

बच्चों की परीक्षाएं चल रही हैं, बच्चों को स्कूल लेने जाती हूँ तो टीचर शिकायत करती रह जाती हैं… बच्चों की हैण्ड राइटिंग अच्छी नहीं, इस विषय में बहुत कमज़ोर है… इस पेपर में यह सवाल छोड़ दिया… सारी माँएं वहीं बच्चों को चपत लगाती हुई दिखती हैं, कल कितना याद करवाया इतना सा लिखते नहीं बनता… जब उन बच्चों का मायूस चेहरा देखती हूँ तो सर पर हाथ फेर देती हूँ कोई बात नहीं, आपकी मम्मा छोटी थी तब वह भी सारे सवाल हल नहीं कर पाती थीं… और फिर उनकी माँओं की तरफ देखकर पूछती हूँ बचपन में क्या आपको सौ में सौ मार्क्स आते थे क्या?

उधर से मेरे बच्चे दौड़ते हुए आते हैं… जल्दी चलो रॉकी का दूध रोटी का टाइम हो गया होगा उस बेचारे ने सुबह से कुछ नहीं खाया होगा… मैं बताती हूँ कि नहीं, हमने खिला दिया है, आज आप लोगों के लिए एक ज़्यादा इम्पोर्टेन्ट काम है, सुबह से तुम लोगों की छुट्टी होने का इंतजार कर रहे हैं… आशीष अंकल ने फिल्मोरा की लिंक भेजी है अब तुम लोगों को जो अपने टेबलेट से मेरा वीडियो एडिट करने में प्रॉब्लम आ रही थी, उसे कम्प्यूटर पर सोल्व कर सकते हैं…

और बड़ा बेटा खुशी से उछल पड़ा … अरे वह फिलमोरा G तो टेबलेट के लिए मैंने कब से डाउनलोड कर रखा है, आज तो बहुत मज़ा आने वाला है ये फिलमोरा का नया वर्जन है इसमें बहुत सारी नई चीज़ें है… मैं कबसे इसको डाउनलोड करना चाह रहा था…

और हाँ मकर संक्रांति के लिए तुम लोगों के लिए पतंगें लेने भी जाना है आज… चलो जल्दी चलो बहुत सारे काम हैं, आज और भी बहुत सारी हेल्प चाहिए हैं तुम दोनों की हमको..पापा सुबह से कोशिश कर रहे हैं उनको समझ ही नहीं आ रहा इस मुए फिलमोर को चलाते कैसे हैं… और बच्चों के पापा मेरी तरफ देखकर मुस्कुरा रहे होते हैं क्योंकि वे बच्चों के आने से पहले ही सबकुछ परफेक्टली चलाकर देख चुके होते हैं…

बाइक पर बैठते से ही सबसे पहला सवाल होता है हाँ भई टिफिन फिनिश हुआ या नहीं, आज क्या गुमाकर आये हो?

अरे मम्मा पता नहीं कैसे इरेज़र नीचे गिरता है और फिर दोबारा मिलता ही नहीं… और एक पेन्सिल मैंने अपने दोस्त को दे दी वह आज लाया नहीं था बदले में उसने मुझे एक चॉकलेट दी…

तभी दूसरा … आप टिफिन में मेरे पसंद की चीज़ क्यों नहीं भेजतीं, मुझे नहीं पसंद आया मेरे दोस्त को खूब पसंद आया तो मैंने उसे दे दिया और उसका टिफिन मैंने खा लिया…

अरे एक बात तो भूल ही गयी पूछना…

दोनों एक साथ मुंह बनाते हुए… अरे यार मम्मा को याद आ गया…

भाई परीक्षाएं चल रही हैं…. पेपर कैसा गया???

तब तक घर आ जाता है और बाइक घर के दरवाज़े पर पहुँचते ही सारे पपीज़ दौड़कर आ जाते हैं…
घर के अंदर कदम रखते ही बच्चों के पिताश्री के निर्देश जारी होते हैं, जूते उतारकर दोनों अपनी चरण पादुकाएं पहनिए और कोई भी शीतल जल नहीं पिएगा…
हां पापा पता है बाहर धूप में गगरी रखी है उसमें से हमको उष्ण जल पीना है… आप रोज़ रोज़ एक ही बात क्यों बार बार दोहराते हैं, विद्यालय में शिक्षिकाओं से भी मैं इसीलिए उकता जाता हूँ कि वो एक ही चीज़ रोज़ रोज़ पढ़ाकर बोर करती हैं.

और ऐसा पढ़ाने से क्या फायदा जिसमें रोज़ कुछ नया सीखने को ना मिले, अंग्रेज़ी हिन्दी की कहानियाँ और उसी में से प्रश्न… वो लोग कंप्यूटर में भी रोज़ सिर्फ पेंट ब्रश से ड्राइंग सिखाते हैं, आज मैंने टीचर को अपने यू ट्यूब चैनल के बारे में बताया और बताया कि मैं एथिकल हैकर बनना चाहता हूँ, मुझे वो सिखाइए तो वो किसी को वहां आता ही नहीं…. मैंने भी कह दिया रहने दीजिये मैं तो यू ट्यूब के ट्यूटोरियल से ही सब सीख लूँगा जैसे चिकी ने यू ट्यूब में देख देख कर खुद ही सिन्थेसाइज़र बजाना सीख लिया. स्कूल वालों को कुछ नहीं आता.

चलो चलो बहुत हुआ पहले खाना खाओ…

आज कॉलोनी के सारे बच्चे शाम को उदास बैठे मीटिंग कर रहे हैं… उन लोगों ने डॉन का नाम बदलकर क्या रखा होगा? उसका ख्याल रखेंगे कि नहीं, अब उसे अपनी मम्मा का दूध पीने को नहीं मिलेगा… वह बहुत अकेला हो जाएगा…

ठीक है … उसे एक नया घर मिलेगा, अब उसे सड़क पर कोई गाड़ी नहीं कुचलेगी, उसे समय पर खाना मिलेगा… अब वह घर के अन्दर रहेगा… हम सबने समझाया…

अब बच्चे खुश हैं…. चलो सड़क का कोई एक कुत्ता गोद ले लिया गया है…. एक करीबी मित्र आज उसे अपने साथ ले गए… जाने से पहले बच्चों ने पूरे इंस्ट्रक्शन दिए, आपको पता है ना अंकल, कुत्तों को मीठा दूध नहीं पिलाते उनके बाल झड़ते हैं, अभी यह बहुत छोटा है ठीक से दांत नहीं आये हैं आप रोटी बारीक चूर के खिलाइयेगा… नहलाने धुलाने और वैक्सीनेशन से लेकर और भी बहुत कुछ वो लोग कहते रहे, डॉन भी बैग में से मुंह निकालकर झांकता रहा, पता नहीं उसे समझ आ रहा था या नहीं लेकिन बच्चों का पशु से प्राकृतिक रिश्ता बन गया था…

बाद में अंकल ने घर पहुंचकर डॉन के फोटो भेजे… आज पहला दिन है तो डॉन थोड़ा उदास है… लेकिन कुछ दिन में वह भी मनुष्य से प्राकृतिक रिश्ता समझने लगेगा…

बातें और भी हैं… जिसके पीछे बहुत सारे सन्देश देना चाहती थी…. लेकिन फिर लगा नहीं, यह सारे किस्से अपने आप में इतना कुछ कह गयी कि मुझे अलग से कुछ कहने की आवश्यकता नहीं है… एक प्राकृतिक रिश्ता शब्दों का उस पर सवार ऊर्जा से भी तो होता है ना जो पाठक तक पहुँचती है.

बाकी यदि आप अपनी आधुनिक जीवन शैली और स्टैण्डर्ड के चलते बच्चों को घर के बाहर के पशु, पक्षी और प्रकृति से जुड़ने की अनुमति नहीं दे सकते तो घर में टीवी कम्यूटर पर ही कुछ पुरानी फ़िल्में दिखा दीजिये. क्योंकि आजकल तो ‘गाय और गौरी’, ‘तेरी मेहरबानियाँ’, ‘हाथी मेरे साथी’ जैसी फ़िल्में बनती नहीं. चलिए कम से का थोडा पूर्वाग्रह छोड़कर लगान और चक दे इंडिया जैसी फ़िल्में ही दिखा दीजिये.

और नहीं तो कम से कम मेरा यह लेख और साथ में संलग्न चित्र ही अपने बच्चों को दिखा दीजियेगा, मुझे यकीन है इस लेख के माध्यम से चाहे बड़े सन्देश ग्रहण न कर सके हों, लेकिन बच्चे बहुत मासूम और सरल स्वभाव के होते हैं, वे अवश्य इसमें से बहुत महत्वपूर्ण, गहरी और अपने मन की बात ढूंढ निकालेंगे.

– माँ जीवन शैफाली

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