मेकिंग इंडिया साप्ताहिकी

जीवन के सप्त रंग, मेकिंग इंडिया के संग
जापान लव इन टोक्यो : ओनसेन में डुबकी लगाने के बाद हुआ जैसे पुनर्जन्म

किनोसाकी में जब हम युकाता और लकड़ी की सैंडल “गेता” पहनकर घूमने निकले तो एक बार लगा कि पूरा शहर ही रयोकान का कॉरिडोर है. दोनों तरफ पारंपरिक दुकाने, सड़क पर हर व्यक्ति – पुरुष, महिला, और बच्चे – युकाता, किमोनो (पारंपरिक परिधान जिन्हें महिलाएं विशेष अवसरों पर पहनती हैं) और गेता में मिले.

गेता का वर्णन मैं ऐसे कर सकता हूं कि इसमें लकड़ी की खड़ाऊ के नीचे लकड़ी के दो चौड़े फट्टे लगे होते है, जिनमे पहला फट्टा अंगूठे से दो इंच पीछे और दूसरा एड़ी के नीचे. शुरू के कुछ कदमों में ऐसा लगा कि हम सामने मुंह के बल गिर जाएंगे, क्योंकि लकड़ी का फट्टा अंगूठे के बहुत पीछे लगे होने से पंजों के नीचे कोई सपोर्ट नहीं था. लेकिन कुछ देर में चलने की ट्रिक समझ ली और पैरों का जोर एड़ियों पर डालने लगे.

शहर के बीचोबीच ओतानी नदी बहती है जिसके दोनों तरफ़ कागज की लालटेने बंधी हुई थी जो रात के समय जलती है. पूरा शहर ऐसा लग रहा था जैसे सभी लोग कोई त्योहार मना रहे हो. गेता पहनकर चलती हुई जापानी महिलाएं किसी हिरणी की तरह लग रही थी – एक-एक कदम साधा हुआ जमीन पर पड़ रहा था.

रयोकान में हमारा निजी ओनसेन

ओनसेन या प्राकृतिक रूप से गरम पानी के झरनों या स्रोतो का आनंद लेने के लिए रयोकान ने हमें टोकरी दी जिसमें नहाने के लिए तौलिये, कॉस्मेटिक्स इत्यादि थे. हम तीनों किनोसाकी के सबसे प्रसिद्ध गोशो-नो-यू ओनसेन गए. अंदर से गोशो-नो-यू किसी जापानी राजमहल की तरह सजा हुआ था.

ओनसेन में नहाने के कठोर नियम या अनुष्ठान है. इसमें आप नहाते नहीं हैं बल्कि गर्म पानी में बैठकर आनंद लेते हैं. ओनसेन में सामान्यतः पुरुषों और महिलाओं के नहाने के कुंड अलग अलग होते हैं.

प्रवेश करने के बाद आप अपने सारे कपड़े उतारते हैं और उसे एक लॉकर में रख देते हैं. उसके बाद वहां लगे पानी के नल या फव्वारे से पूरे बदन को साबुन से रगड़-रगड़ के साफ करते हैं. कुछ लोग वहां रखी बाल्टी को उठाते हैं और कुंड से पानी भरकर अपने शरीर पर उड़ेल लेते हैं. 3-4 बाल्टी से स्नान करने के बाद फिर वह कुंड में उतरते हैं. यह ध्यान रखा जाता है कि नहाने वाला पानी कुंड में ना गिरने पाए. कुछ दुष्ट प्रवत्ति के लोग शरीर के संवेदनशील स्थान पर ही पानी छिड़ककर कुंड में उतर जाते हैं.

ओनसेन में दिया जाने वाला तौलिया इतना छोटा होता है कि उसे शरीर पे बांधना बहुत ही मुश्किल है. लेकिन जिन पुरुषों ने गंगा जी, यमुना जी या किसी भी भारतीय नदी में पूजा अर्चना के लिए स्नान किया है उनके लिए उस तौलिए से निपटना कोई असंभव काम नहीं था. अतः किसी तरह अपनी इज्जत बचाते हुए मैं कुंड में उतर गया और तौलिया हाथ में आ गयी.

चूंकि पुत्र झिझक रहा था, मैंने उसे ऑनसेन में पहले भेज दिया और स्वयं दस मिनट बाद प्रवेश किया. हम दोनों ने अलग-अलग कुंड में बैठने का निर्णय लिया.

पुरुषों की तरफ सिर्फ पांच-छह नहाने वाले दिखे जबकि पत्नी ने बतलाया कि महिलाओं के कुंड में कई लोग पानी में बैठे दिखाई दिए. उन्होंने तीन पीढ़ियों की महिलाओं को एक साथ ओनसेन में डुबकी लगाते देखा. दादी/नानी, बहू/बेटी, नातिन/पोतियां/बहने एक साथ पानी में बैठी हुई थी. उन तीनों पीढ़ियों के मध्य किसी प्रकार की कोई झिझक नहीं थी और बहुत ही आराम से ऐसे गप्पे मार रही थी जैसे परिवार के सदस्य बैठकर एक साथ भोजन कर रहे हो.

इंडोर और आउटडोर कुंड में लगभग डेढ़-दो घंटे तक बैठे रहे. पहाड़ों से आता हुआ गरम पानी बहुत ही राहत दे रहा था. पहले से तय समयानुसार जब हम बाहर आए तो ऐसी ताजगी का अहसास हो रहा था कि जैसे पुनर्जन्म हुआ हो.

“कायसेकी” डिनर

किनोसाकी में दो दिन ओनसेन में डुबकी लगाकर, “कायसेकी” भोजन का आनंद लेकर हम चल पड़े क्योटो की तरफ.

– अमित सिंघल

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