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संता और बंता : एक आभा-सी संवाद

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मैं चुपचाप उनको सुनती जा रही थी… या कहूं पढ़ती जा रही थी तो बेहतर होगा, आखिर टेक्स्ट मैसेज था यह… प्रेम में देह की भूमिका पर बहुत स्वच्छंद विचार लिखे थे. सामान्यत: इस तरह स्वच्छंद होकर लिखनेवालों के लिए मन में एक ऐसी ही छवि बन जाती है कि जैसा इन्होंने लिखा है वही उनकी जीवन शैली भी होगी… मेरे साथ तो हमेशा से ही यही हुआ है, जब भी प्रेम में देह की भूमिका के स्वीकार्य पर लिखा है लोगों की भृकुटी तन जाती है, एक स्त्री होकर इतने स्वच्छंद विचार!!!

मुझे बुरा नहीं लगता क्योंकि मनुष्य का मस्तिष्क बना ही इस तरह से है कि वह सामने वालों की बातों से उसके व्यक्तित्व का निर्धारण शुरू कर देता है… मैं भी कोई अपवाद नहीं, परन्तु इस धारणा के साथ एक स्वीकार्य भाव भी होता है मेरे अन्दर, जो जैसा है अपने आप में सबसे सुन्दर है, वह उस तरह का नहीं होता तो वह कुछ और ही बन जाता…

तो प्रारम्भिक बातचीत के दौरान जब उन्होंने मुझसे कहा कि – When I have seen your pic first time, I was surprised and cheered as if I am meeting my very old friend … After a very long period… I was and am very happy ….So just putting my comments in fb very naturally…AAYINA…you said rightly .. आप वास्तव में एक आईना है….

आईना… कितना प्यारा शब्द है, आप जब आईना हो जाते हैं तो सामने वाला अपनी ही तरह का एक और प्रतिबिम्ब खोज लेता है आपके अन्दर… और ऐसा हरेक के साथ होता है… हम अपने अन्दर न जाने कितने चेहरे छुपाए रखते हैं… जो जैसा देखना चाहता है बस उसे वह ही दिखे… लेकिन आईना बनने के लिए एक कांच के टुकड़े को अपनी पीठ कर कौन सी पर्त डालना पड़ती है वह तो बस एक आईना ही समझ सकता है…

लेकिन उनको जो चेहरा दिखाई दे रहा था, वह उनका खुद का नहीं था… अपने पुराने प्रेम का चेहरा था… उनकी इसी बात से मैं उनके प्रेम की गहराई को समझ सकी कि उनको वह चेहरा इतने बरसों बाद भी याद है…

तो मैंने भी उनसे मज़ाक में पूछ लिया.. अच्छा कौन थी वह, जिसका चेहरा आपको मेरे अंदर दिखाई देता है…

उन्होंने अपनी कहानी कुछ यूं सुनाई…

वह मेरे साथ ही बचपन से खेलने वाली दूर की रिश्तेदार थी। कभी कभी मुलाकात होती थी। बड़े होने के साथ ही हम एक दूसरे को प्रेम करने लगे। उसने कभी मुखरता से ऐसा नहीं कहा। पर करीब 17 साल होश के मैं उसको अपना ही मानता रहा दिन रात।

उस समय की पारिवारिक बंदिशों के कारण कोई स्वतंत्रता नहीं ले सके। घर में बोला तो स्वीकार नहीं हुआ। फिर ज़िद कर सका। उसको बोला कि घर में बोलो, तो उसकी हिम्मत नहीं पड़ी। मैं गंभीर था, पर चाहता था कि वह भी हिम्मत करे। परिवारों में बचपन में कुछ अंडरस्टैंडिंग पहले थी।

आश्चर्य होगा जानकर कि मैंने उसको अपनी उम्र के पूरे दौर में कभी हाथ नहीं लगाया, जबकि हम शादियों में साथ सोए भी। मुझे विश्वास था कि शादी तो होगी ही क्योंकि परिवार राज़ी हैं ही, तो अगर मैंने कुछ स्वतंत्रता ली, तो वह बुरा न मान जाए।

फिर मेरे बैंक में जॉब में पोस्टिंग कहीं और हो गई। एक दिन मुझे सूचना दी गई, मेरी शादी कहीं और तय कर दी है, आके देख लो…

मैंने भी कहा जब तय ही कर दी है, तो देखना कैसा? मैं अपनी बीवी से भी फिर सीधे रस्म पर ही मिला। वह मेरी शादी में आयी। डांस भी किया। फिर साल भर बाद उसकी शादी हो गई। मैं गंभीर पीलिया से ग्रस्त था। पर गया, जयमाल देखी, और वापस आ गया…. विदा में अगले दिन नहीं गया, शायद सहन ना होता।

तो मेरा प्रेम अभिव्यक्ति की कमी, सामाजिक बंधन, उतावलेपन की कमी की वजह से दुखांत हो गया। जीवन कर्तव्य के रास्ते पर चला गया । निजता का पूर्ण हनन हुआ। आपकी पिक देख कर चौंका था, क्यूंकि चेहरा 90 फीसदी मिलता है। पहचाना सा, और आपने पूछ भी लिया, तो शेयर किया… 1990 के बाद…. थोड़ा सा लिखा, बहुत समझना… वैसे दिमाग़ से भी बहुत तेज़ हो आप… बोर तो नहीं हुई एक और प्रेम कथा पढ़कर….

दिमाग़ की तेज़?? मुझे पढ़कर हंसी आ गयी…. लेकिन दिल जैसे चाहकर भी हंस न पाया… काश दिल की भी इतनी ही तेज़ होती… और काश शब्दों से भी तेज़ होती…

जब मुझे कोई अपनी कहानी सुनाता है तो मैं अपने भाव, विचार, शब्दों और दृश्यों से बिलकुल गायब हो जाती हूँ… फिर मेरा प्रयास रहता है कि जो अपनी व्यथा सुना रहा है बस उसके शब्दों को छूकर टटोलकर उसके भाव को पढ़ सकूं… अक्सर कामयाब भी हो जाती हूँ… तो इस बार भी मन पीड़ा से भीग गया… और फिर बस इतना ही कहा –

मैंने आपकी कहानी को बिलकुल ऐसे ही पढ़ा जैसे आपने उसे अनुभव किया होगा… और पढ़ते हुए सच में मन भारी हो गया…

वे हंसकर कहने लगे – आईने के सामने दिल जो खोल कर रखा…

इस आभासी पटल को लोग पता नहीं कैसे इतना सतही तौर पर लेते हैं… मेरी इस “आभा-सी” दुनिया के दूसरी छोर पर बैठे किसी व्यक्ति के हंसी की इमोजी के साथ भीगे मन का पता मुझे चल जाता है… उसी भीगे मन से उन्होंने कहा.. पता है मैं अपनी ही बारात में रोया था… इससे बड़ी दुःख की बात क्या हो सकती है भला…

कहने लगे… बिना मिले ही कब्र से निकाल लिया है आपने, मिलकर न जाने किस काल में ले जाओगी … “बिनु हरि कृपा मिले नहीं संता” इसमें संता तो आप हो।

“….और आप बंता”…. मैंने हँसते हुए कहा… चाह रही थी दो भीगे मन हंसी की फुहार से सूख जाए तो ह्रदय में दलदल न बने… जिसमें आदमी एक बार गिर जाए तो धंसता ही चला जाता है…

उस दिन के बाद से वह मुझे संता कहने लगे और मैं उन्हें बंता… बस ऐसे ही हम एक दूसरे के भीगे मन को हवा देते रहते हैं… बातों के फूल से किसी के जीवन की बगिया महकती रहे तो ऐसी बातें करते रहना चाहिए… ईश्वर ने हमें बोलने का गुण दिया है तो उसका कोई विशेष प्रयोजन ही होगा….

और एक बात यह भी समझ आई कि इंसान के शब्दों और विचारों से उसके व्यक्तित्व का निर्धारण तुरंत नहीं करना चाहिए… जिस व्यक्ति ने प्रेम में देह की भूमिका पर इतना स्वच्छंद लिख कर दिया उन्होंने अपने यौवन के दिनों के प्रेम में भी देह को अपनी भूमिका नहीं निभाने दी…

एक अच्छे दोस्त की तरह वे मुझे समय समय पर सलाह देते रहते हैं… मुझे बरसों से जानने वाले भी अभी मुझे पूरी तरह नहीं जानते… यह तो अभी अभी हुई मुलाकात थी तो उनके मनमें कई सवाल उमड़ते हैं…..

मैं जवाब में बस मुस्कुरा देती हूँ…. व्यस्तता के कारण अधिक समय नहीं दे पाती, कभी-कभी जवाब नहीं दे पाती तो एक दिन कहने लगे – मैं तुम्हारे बारे में कुछ भी नहीं जानता, इसलिए जितना कम्युनिकेट करोगी सिर्फ उतना ही समझ सकता हूं…

मैंने बस इतना ही कहा – मुझे जान तो न सकेंगे, हाँ कुछ दिनों में समझने लगेंगे तो आपके सवाल बदल जाएंगे…

मैं नहीं जानती उनके सवाल बदलेंगे या नहीं, मुलाक़ात होगी या नहीं कुछ रिश्ते आभासी ही रहे तो उनकी आभा बनी रहती है… शायद मेरे मन की बात उन तक पहुँच गयी थी तो एक दिन उनका सन्देश मिला…

खटखटाते रहिए दरवाजा
एक दूसरे के मन का…
मुलाकातें ना सही,
आहटें आती रहनी चाहिए

– माँ जीवन शैफाली

गाइड : एक आभा-सी संवाद

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1 thought on “संता और बंता : एक आभा-सी संवाद”

  1. D.k.verma says:

    कुछ कुछ खुद के जीवन से मिलती हुई कहानी लगी । उम्र के कच्चे दौर में किसी के प्रति आकर्षण हुआ था पर पहल उधर से ही हुई थी .. दूर की रिश्तेदार थी.. मैं उस समय 10 वीं में पढ़ता था..मैं भी कभी हिम्मत नहीं कर पाया,वो भी नहीं …नियति एक बार फिर उसी के शहर में ले आई पर 10 वर्ष गुज़र गए,एक ही शहर में रहते हुए आज तक नहीं मिला..इन सम्बन्धों में देह की कभी कोई भूमिका भी नहीं रही..उसकी शादी भी बेहद उम्रदराज व्यक्ति से हो गई थी..नतीजा ये हुआ कि क़दम लड़खड़ा गए और समाज में प्रतिष्ठा खत्म हो गई .. एक निश्छल प्रेम इस तरह दुखांत को प्राप्त हुआ ।

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