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‘Zombie Boy’ Rick Genest की आत्महत्या : बालकनी से नहीं, जीवन से कूद गया है युवा वर्ग

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बीती 1 अगस्त को खबर पढ़ी कि Rick Genest जो Zombie Boy के नाम से प्रसिद्ध था, ने सिर्फ़ 32 वर्ष की उम्र में बालकनी से कूदकर आत्महत्या कर ली।

Zombie Boy के बारे में बहुत अधिक नहीं जानती, बस इतना कि Lady Gaga के किसी म्यूज़िक एल्बम में काम किया था, एक मॉडल, संगीतकार और अच्छा एक्टर था। उसने अपने पूरे शरीर पर Zombie स्टाइल के टैटू बनवाये और बन गया Zombie Boy।

जब Zombie Boy बने इस युवा को देखा तो सबसे पहला विचार यही आया कि यह किसी एक युवा ने बालकनी से कूदकर आत्महत्या नहीं की, बल्कि पाश्चात्य संस्कृति में पल रहा पूरा युवा वर्ग जीवन से कूद चुका है। जिस तरह का जीवन ये लोग जी रहे हैं, ये सिर्फ चलती फिरती लाशें हैं, ठीक ऐसी ही Zombie Boy की तरह।

बहुत पहले Zombie Land की पृष्ठभूमि पर बनी एक-दो अंग्रेज़ी फ़िल्में देखी थीं। नरभक्षी लोगों पर जुगुप्सा जगा देने वाली हद तक घृणित कहानियों वाली फ़िल्में। जिस सभ्यता में कुछ नया रचने के चक्कर में जब नरभक्षी और इस तरह की भुतहा फ़िल्में बनती हैं, तो कहीं न कहीं इनके अवचेतन मन में यह कुसंस्कार जमा हुआ रहता है जो इस तरह की फिल्मों के माध्यम से सतह पर उभर कर आता है। या इसके उलट यह कहा जाए तो भी गलत नहीं होगा कि इस तरह की फ़िल्में और कल्चर युवा को उस स्तर तक ला कर खड़ा कर देता है कि इसका बीज उसके अवचेतन मन में पड़ने लगता है। और यह कहीं न कहीं उसके वास्तविक जीवन को भी प्रभावित करता है।

मुझे याद है जिन दिनों हैरी पॉटर की फ़िल्में आई थीं, उन दिनों मैं चित्रकारी में हाथ आज़मा रही थी, कुछ बहुत ही सुंदर पेंटिंग्स मैंने बनाई थी, प्रकृति के दृश्य, अभिनेत्री रेखा का तैलीय चित्र और कुछ कपड़ों पर डिज़ाइन उकेरा करती थीं। एक दिन घर के किशोरवय बच्चों के कहने पर उनके साथ बैठकर हैरी पॉटर श्रृंखला की कुछ दो तीन फ़िल्में एक साथ देख डाली। उसके बाद जब चित्रकारी के लिए ब्रश उठाया तो अपने ही चित्र देखकर अचंभित हुई। कुछ अजीब-ओ-गरीब आकृतियाँ कल्पनाओं से निकलकर कागज़ पर उतर आई थीं। रंगों के सुन्दर संयोजन के बावजूद वह बहुत वीभत्स थी, लगभग भुतहा.

आज सोचती हूँ तो इस निर्णय पर पहुँचने में मुझे तनिक भी देर नहीं लगती कि मेरी उम्र उस समय यही तीस और पैंतीस के बीच की थी, जब उस परिपक्व उम्र में भी फिल्मों का प्रभाव मेरे मानस पटल पर ऐसे उभर कर आया, तो ये Zombie कल्चर को जीने वाले युवा वर्ग का जीवन कैसे तहस नहस हो रहा होगा, जिन्होंने इसे फैशन के रूप में अपना रखा है.

परालौकिक अनुभव, आध्यात्मिक अनुभव और नकारात्मक शक्तियों के आक्रमण की वास्तविक कहानियां हम भी पढ़ते-लिखते और अनुभव करते आए हैं. लेकिन ईसाई मान्यतों में जिस तरह से भूत उतारने के नकली वीडियो वायरल होते हैं, उनको देखकर लगता है कुछ इस तरह की निम्न स्तर की चेतनाओं को इनके अवचेतन मन में घर बनाने के लिए सबसे उपयुक्त जगह मिल रही है. प्रकट रूप से वे भले सामान्य दिखें लेकिन कहीं न कहीं ये Zombie Culture को न्यौता दे रहे हैं।

आप जैसा जीवन जीते हैं, जैसा काम करते हैं आपके अवचेतन मन में आप वैसे ही होते चले जाते हैं। चाहे मॉडलिंग के लिए ही सही लेकिन Rick ने Zombie Boy की अपनी इमेज से जो ख्याति पाई, उसने उसे वास्तविक रूप से घेर लिया। वरना एक इंसान जो पहले से ही कैंसर से पीड़ित हो और मरने की कगार पर हो वह भला आत्महत्या क्यों करेगा?

अपनी खुद की हत्या (आत्म+हत्या) के लिए प्रकट रूप से कारण भले सामाजिक और सांसारिक हो लेकिन अवचेतन में कहीं न कहीं यह प्रदूषित विचारधारा काम कर रही होती है, जो उनकी जिजीविषा और जीवनी शक्ति पर अपने वर्चस्व को बनाए रखने के लिए हमलावर हो जाती है।

हमारी संस्कृति में भी टैटू का प्राचीन इतिहास है, जिसे गोदना कहा जाता है. लेकिन वो शरीर पर सुन्दर रूप में उकेरा जाता था. पाश्चात्य संस्कृति से प्रभावित भारत का युवा वर्ग जिस तरह के टैटू बनवा रहा है, वह दिन दूर नहीं जब वह भी इस Zombie Boy की कुसंस्कृति के समकक्ष आकर खड़ा हो जाएगा।

इसके पहले कि पश्चिम में डूबते सूर्य के साथ अवसाद में डूबे युवा वर्ग की तरह, पूर्व का युवा वर्ग उगते सूरज के साथ उगने की अस्तित्व की स्वाभाविक प्रक्रिया को नकारकर जीवन से कूद जाए… हमें उन्हें बताना होगा कि हमें Zombie Boy नहीं, हमें तपस्वी और योगी बनना है, जो हमारी संस्कृति का वास्तविक स्वरूप है।

यहाँ की धरती पर मनीषा कोईराला और अमित वैद्य जैसे युवा रहते हैं, जो ध्यान और प्राकृतिक चिकित्सा द्वारा कैंसर से लड़कर जीवन को जीत लाते हैं।

और अंत में पद्मभूषण Dr BM Hegde जो खुद को डॉक्टर नहीं, शिक्षक कहलवाना पसंद करते हैं, की बात… उन्होंने एक कार्यक्रम के दौरान बहुत सुन्दर बात कही कि यदि आप को सकारात्मक जीवन जीना है, रोगों से मुक्त होना है तो राग की शरण में जाइए। जब आप कोई मधुर संगीत या भारतीय शास्त्रीय संगीत पर आधारित राग और आलाप सुनते हैं तो आपका ब्लड प्रेशर कम होता है, इसलिए हाई ब्लड प्रेशर वालों को भारतीय संगीत सुनना चाहिए।

डॉ साहब बताते हैं कि हमारे प्राचीन आयुर्वेद में संगीत आधारित उपचार को गन्धर्व आयुर्वेद कहते हैं, जिसमें प्रत्येक रोग को दूर करने के लिए विशेष राग का उपयोग किया जाता है। इसलिए अच्छा संगीत आपके स्वास्थ्य के लिए बहुत लाभकारी है. वे चेतावनी देते हुए कहते हैं… लेकिन रॉक म्यूज़िक नहीं!!

Allan Bloom की पुस्तक The Closing of the American Mind का सन्दर्भ देते हुए डॉ हेगड़े बताते हैं कि पश्चिम में सबंधों की गुणवत्ता को गिराने में सबसे बड़ा हाथ इस ROCK MUSIC का है।

पाश्चात्य रॉक म्यूज़िक के बारे में बताते हुए डॉ हेगड़े श्रोताओं से पूछते हैं कि रॉक का मतलब किसी को पता है? फिर वे बताते हैं कि अफ्रीकन भाषा में इसका अर्थ होता है Sexual Intercourse (संभोग), आगे वे रॉक म्यूज़िक की ताल (beats) की समानता इस शारीरिक गतिविधि के साथ बताते हुए कहते हैं इस तरह का संगीत सुनने वालों में आगे चलकर संवेदना और भावनात्मक स्तर पर कमी आ जाती है, और वही कारण बनता है तलाक का। ना सिर्फ संबंध विच्छेद बल्कि यह संगीत आपके मस्तिष्क और ह्रदय की कोशिकाओं को इतना दूषित कर देता है कि आगे जाकर आप गंभीर बीमारियों के शिकार हो जाते हैं। यहाँ तक कि आत्महत्या भी कर सकते हैं।

हम एक बार फिर Zombie Boy पर आते हैं, और उसकी जीवन शैली का उपरोक्त बातों के आधार पर विश्लेषण करते हैं तो पाते हैं कि यह लड़का कहीं न कहीं अपनी ही जीवन शैली के कारण जीवन से हाथ धो बैठा है। हमारे ऋषि मुनियों और तपस्वियों ने हमारे लिए वर्षों की खोज और प्रयोग के बाद जो ज्ञान रूपी धरोहर छोड़ रखी है उसे सच में सहज लेने और पुन: उसे जीवन शैली में अपनाने का समय आ गया है।

एक डॉक्टर होने के बावजूद वे सलाह देते हैं कि जब बहुत अधिक आवश्यकता हो तभी मेडिसिन लेना चाहिए, वर्ना प्रकृति ने इतने उपाय बना रखे हैं कि आप किसी भी रास्ते से जाकर अपनी हर तरह की समस्या हल कर सकते हैं। उनका अध्ययन और तप इतना गहन और विस्तृत हैं कि उन्हें किताबों के नाम, उनके लेखक और कई बार कोई सुन्दर और काम की बात किस पेज पर लिखी है यह भी याद रहता है।

किताबें सभी पढ़ते हैं लेकिन कुछ लोगों को मैंने किताबों को पढ़कर सिर्फ उसको रटते देखा है, जिसका उपयोग पढ़े हुए को अपने लेखन में सुन्दर तरीके से अपने शब्दों में दोबारा लिखकर लोगों का दिल जीतते देखा है, और वास्तविक जीवन में किताबों के इस ज्ञान से बिलकुल अछूते हैं.

लेकिन डॉ हेगड़े को जब मैंने पहली बार सुना तो लगा यह डॉक्टर तो एक संत और योगी होने की कगार पर हैं। उन्होंने जो पढ़ा उसे अपने जीवन में जज़्ब भी किया। वे खुद को शिक्षक कहते हैं तो सही ही कहते हैं। हमें अपनी आने वाली पीढ़ी के लिए ऐसे ही शिक्षकों की आवश्यकता है।

उनके नाम से सर्च करने पर यू ट्यूब पर उनके ढेरों स्पीच आप सुन सकते हैं, जिन्हें स्पीच नहीं जीवन मंत्र कहूंगी.

– माँ जीवन शैफाली

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