Menu

आरक्षण के बहाने : बबूल बोनेवाले आम की फसल नहीं उगने पर बंद करें मातम करना

0 Comments


मेरी पुत्री ने स्नातक परीक्षा पास करने के बाद स्नातकोत्तर कक्षा में प्रवेश लिया ही था कि उसके द्वारा दी गयी बैंक की क्लैरिकल और प्रोबेशनरी ऑफिसर की परीक्षा के परिणाम आ गए थे। उसका दोनों में चयन हो गया था।

प्रोबेशनरी ऑफिसर पद के साक्षात्कार में मिले अंकों में कुछ कमी के कारण अन्तिम चयन नहीं हो सका था। मैंने उसे ढांढ़स बंधाते हुए कहा था कि क्लैरिकल में तो तुम्हारा चयन हो ही गया है। इसलिए 2-3 वर्ष बाद विभागीय परीक्षा देकर तुम प्रोबेशनरी ऑफिसर तो बन ही जाओगी।

मेरी बात पर उसने आत्मविश्वास के साथ मुस्कुराते हुए जवाब दिया था कि नहीं पापा अगली बार मेरा डायरेक्ट सलेक्शन ही होगा। हुआ भी यही था। साल भर बाद हुई परीक्षा में वह पुनः चयनित हुई। इसबार चयनित लगभग 3500 बच्चों में वो टॉप 100 में थी। अतः सीमित अंकों वाले साक्षात्कार में कम या ज्यादा अंकों का मिलना अन्तिम चयन के लिए अप्रासंगिक हो गया था।

मेरे पुत्र के स्नातक के रिजल्ट से कुछ दिनों पूर्व ही उसके द्वारा दी गयी डाकतार विभाग की परीक्षा का परिणाम निकल गया था। उसका नाम मेरिट लिस्ट में शीर्ष पर था। किन्तु वह नौकरी उसको रास नहीं आयी। दो वर्ष बाद SSC की परीक्षा दी। इसबार देशव्यापी मेरिट लिस्ट में उसका नाम पहले स्थान पर था।

लेकिन जीवन में ऐसी सफलताएं यूं ही नहीं मिलती। दोनों बच्चों ने जबतक स्नातक परीक्षा पास नहीं कर ली थी तबतक मेरे घर में मनोरंजन का माध्यम केवल दूरदर्शन ही था। केबल कनेक्शन उसके बाद लिया। स्नातक परीक्षा पास करने के बाद नौकरी शुरू करने के पश्चात ही बेटे ने बाइक या स्कूटी चलाना सीखा था। सिनेमा हॉल या शॉपिंग मॉल में मौज मस्ती का उनका सिलसिला स्नातक की शिक्षा के पश्चात ही शुरू हो सका था। रात 2 बजे सोने के अपने नियमित क्रम के कारण मुझे पुत्री को हमेशा टोकना पड़ता था कि अब 2 बज चुके हैं, सो जाओ।

मेरे एक अभिन्न बाल सखा (वो भी ब्राह्मण ही हैं) के दो बड़े भाइयों की आर्थिक स्थिति ऐसी थी कि अक्सर हम मित्रों में यह चर्चा होती थी कि उनका जीवनयापन कैसे हो रहा है। पिता के बनवाये घर तथा निकट सम्बन्धियों/परिजनों की सहायता से जीवन जैसे तैसे गुजर रहा था। उनके कुछ मित्रों की सहायता/सहयोग से सम्भव हुए बैंक ऋण के फलस्वरूप उन दोनों के पुत्रों ने इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूर्ण की और पढ़ाई खत्म होने के बाद वर्ष भर की अवधि में ही दोनों बच्चों ने केंद्र सरकार के दो अलग अलग विभागों की परीक्षा पास की और आज AE पद पर कार्यरत हैं।

ऊपर जिस आर्थिक स्थिति का वर्णन किया है उसके चलते यह स्पष्ट हो जाना चाहिए कि नौकरी लगने तक दोनों बच्चों के जीवन में मौज मस्ती का कोई नामो निशान नहीं था। उनका एक ही उद्देश्य, एक ही ध्येय था कि जीवन में कुछ बनना है। इसका एकमात्र सहारा पढ़ाई और बहुत परिश्रम से पढ़ाई ही है।

तीसरा और अन्तिम उदाहरण: अत्यन्त साधन संपन्न मेरे एक अन्य ब्राह्मण बालसखा की पुत्री को MBA की पढ़ाई पूरी करने के पश्चात निजी क्षेत्र से मिले नौकरियों के प्रस्ताव उसने अस्वीकार दिए थे। उसे जिद्द थी कि मुझे बैंक अधिकारी ही बनना है। MBA करने के बाद लगभग एक डेढ़ वर्ष की कड़ी मेहनत के पश्चात उसका चयन हुआ। आज वह राष्ट्रीयकृत बैंक में अधिकारी है। घर में उपलब्ध हर सुख सुविधा के बावजूद उस बच्ची को मैंने हमेशा भौतिक रागरंग से कोसों दूर, अपनी पढ़ाई और कैरियर की ही चिंता में व्यस्त देखा था।

ऐसे कई और उदाहरण हैं मेरे स्मृतिकोष में जो यह बताते हैं कि बच्चों का भविष्य उनका परिश्रम तय करता है, आरक्षण नहीं।

आज आरक्षण की आड़ लेकर जातीय ज़हर उगलते प्रायोजित संदेशों की बाढ़ के खिलाफ आवाज़ उठाने के लिए स्व रामधारी सिंह दिनकर की इन पंक्तियों ने मुझे विवश कर दिया कि…

समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याघ्र,
जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनका भी अपराध।

स्पष्ट कर दूं कि मेरा यह लेख तीन भागों में है। दूसरा भाग आरक्षण पा रहे वर्ग की चौंका देनेवाली उसी सच्चाई से सम्बन्धित है जो यह सिद्ध करती है कि बच्चों का भविष्य उनका परिश्रम तय करता है, आरक्षण नहीं।

लेख का तीसरा और अन्तिम भाग आरक्षण विरोध के बहाने छाती पीटने वाले उस वर्ग से सम्बन्धित है जिन पर यह कहावत शत प्रतिशत चरितार्थ होती है कि…

बोया पेड़ बबूल का, आम कहां से होय।

– सतीशचंद्र मिश्रा (वरिष्ठ पत्रकार)

‘Zombie Boy’ Rick Genest की आत्महत्या : बालकनी से नहीं, जीवन से कूद गया है युवा वर्ग

Facebook Comments
Tags: , ,

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!