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वो डोसा हट से बाहर निकली। वॉकर के साथ चल रही थी। बूढ़ी थी। अब बूढ़े होने की कोई परिभाषा तो है नहीं। कोई पचास पर भी बूढ़ा लग सकता है तो कोई सत्तर पर भी जवान। और अगर देह सही चल रही हो, सेहतमंद हो तो दिल तो हमेशा ही जवान महसूस करता है।

वो कहते हैं न देह दिमाग़ में रहती है, कहते तो हैं, देह माइंड में रहती है, जैसा माइंड वैसी देह। तो हम कह सकते हैं, देह मन में रहती है, मानस में रहती है। तो हो सकता है वो अंदर से जवान ही महसूस कर रही हो पर चेहरे पर थोड़ी उम्र थी।

मैं मुस्कुराई, वो भी मुझे देख कर मुस्कुराई। मैंने देखा उसके चेहरे पर एक नूर था, एक रोशनी थी, एक चमक थी। कोई और उस से हमदर्दी जता सकता था। अकेली थी, वॉकर की मदद से चल रही थी। पर न जाने क्यों, मुझे हमदर्दी जैसी कोई भावना नहीं आई। मुझे प्यार आया, मुझे गर्व आया।

उसकी आँखों में ऊर्जा थी। माथे पर चंदन का हल्का सा टीका। शायद मंदिर से हो कर आई थी। डोसा हट के बग़ल में ही मंदिर था। बारिश होने लगी थी और वो डोसा हट की awning के नीचे पनाह लेने को खड़ी हो गई। मैं भी वहीं खड़ी थी।

जैसे ही उसने अपना मुँह दूसरी तरफ़ फेरा, मैंने देखा उसका बहुत सुंदर जूड़ा था और उसमें दो फूल लगे थे, एक पीले रंग का, एक सफ़ेद रंग का। मेरी मुस्कुराहट और भी ज़्यादा गहरी हो गई, मेरा प्रेम भी। ऐसे भी कभी कभी रास्ते पर चलते चलते हम किसी से ख़ुशी ले लेते हैं, किसी को दे देते हैं। बेवजह तो कुछ भी नहीं। कोई तरंगें निकलती हैं अंदर से जो किसी और की तरंगों के साथ जुड़, हाथ में हाथ डाल नृत्य करने लगती हैं।

अचानक से उसने मुँह मेरी तरफ़ मोड़ा, मुझे मुस्कुराता हुआ देख, बोली –

अच्छे लग रहे हैं न ?

क्या, मैंने पूछा, अनजान बनते हुए?

फूल, उसने कहा

हाँ, मैं मुस्कुराई
वो भी।

उसके जूड़े के फूलों से एक ऊर्जा मेरी तरफ़ आ रही थी। कुछ बहुत ही जीवंत था।

वो प्रेम, वो गर्व, वो तरंगें, मेरे अंदर कहीं बहुत गहरे पैठ गईं, Wordsworth के daffodils की तरह। जब तब उसका चेहरा आँखों के सामने तैरने लगता है, वो चंदन का टीका, वो फूल, वो वॉकर, वो ज़िंदादिली, वो आँखों में चमक। और फिर से मुझे अपने आसपास एक ऊर्जा चक्र महसूस होता है। कुछ भी ख़ाली नहीं था। कुछ भी अधूरा नहीं था। कोई कोई परछाई ज़्यादा अपनी सी लगती है। भेद तो ब्रह्मांड ही जाने।

– राजेश जोशी

हे री सखी मंगल गावो री, धरती अम्बर सजावो री, आज उतरेगी पी की सवारी

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