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जब सब सोते हैं, तब योगी जागे हुए रहते हैं

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योग में तीन अवस्थाओं का वर्णन है. जागृत, स्वप्न, सुषुप्ति. मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि मन के तीन भाग हैं. चेतन, अवचेतन, अचेतन.
यानी जागृतावस्था में चेतन, स्वप्नावस्था में अवचेतन, सुषुप्ति में अचेतन मन विशेष सक्रिय होता है.

मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि मनुष्य अपनी मानसिक क्षमता का न्यूनतम उपयोग कर पाता है. सुपर जीनियस माने जाने वाले लोगों के बारे में कहा जाता है कि वे भी मानसिक क्षमता का 15% ही उपयोग कर पाये. हम कल्पना ही कर सकते हैं कि 100% उपयोग में समर्थ मनुष्य कैसा होगा?? यह कल्पना भी हमें चमत्कृत कर देती है.

चेतन की सक्रियता के समय हमें पूर्ण रूप से जागृत होना चाहिए, पर ऐसा होता नहीं. क्योंकि जब चेतन सक्रिय रहता है तब आंशिक रूप से अवचेतन और अचेतन भी सक्रिय रहते हैं.

मन का कोई भी हिस्सा कभी भी पूर्णतः निष्क्रिय नहीं रहता है. जब कोई हिस्सा विशेष सक्रिय होता है तब अन्य हिस्से आंशिक रूप से सक्रिय रहते हैं.

चेतनावस्था में हमारा मन पर सीमित नियंत्रण होता है. अवचेतन अचेतन अवस्था में हमारा मन पर नियंत्रण नहीं रहता. मन पर नियंत्रण न होने के कारण हमारा स्वयं पर स्वामित्व नहीं होता. यही हमारी विवशता दीनता का कारण है.

मन पर नियंत्रण के लिए ऋषियों ने कई विधियाँ बताई. भगवान श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं कि अभ्यास से मन पर नियंत्रण पाया जा सकता है.

श्वांस की साधना विपश्यना आदि, अंतर ध्वनि सुनना नाद साधना आदि, मंत्र जाप नाम सुमिरन आदि से खंडित मन एकाग्र होता है. तथा सजगता से साधना करने से मन पर नियंत्रण प्राप्त हो जाता. मन पर नियंत्रण प्राप्त होने पर व्यक्ति वास्तव में स्वामी कहे जाने योग्य हो जाता है.

अनियंत्रित मन बंदर की तरह व्यवहार करता है. वह उछल कूद करता रहता है. जब भी हम किसी साधना विधि का उपयोग करते हैं. थोड़े ही समय में मन विषय बदलने लगता है. मन में भटकाव साफ अनुभव में आ जाता है.

इस भटकाव के क्षण में सजग रहना होता है. क्योंकि मन चेतन से अवचेतन और अचेतन के बीच भाग दौड़ करता रहता है.

अतः साधना काल में विशेष रूप से सजग होश पूर्ण रह कर भीतर होने वाली घटनाओं को देखना होता है.

जैसे हम मंत्र जाप कर रहे हैं तो मंत्र के सहारे मन के तीनों स्तरों को सजगता से समझ रहे होते हैं. यदि साधना में सजगता नहीं रही, जरा सा भी प्रमाद चूक हुई. तो चेतन अवचेतन के घालमेल से प्राप्त अनुभव झंझट पैदा कर देते हैं.

स्वप्न और यथार्थ में अंतर कर पाना कठिन हो जाता है. ऐसे दृश्य दिखने लगते हैं जो औरों को नहीं दिखते पर साधक को दिखने लगते हैं. साधक सजग न रहें तो इस अवस्था में विक्षिप्त हो जाने का भय रहता है.

आध्यात्मिक साधना की जितनी विधियाँ पूजा पाठ जप तप योग की हैं उनका उद्देश्य साधक की मानसिक आत्मिक क्षमताओं में वृद्धि है.

परमेश्वर को प्रसन्न करने का तो बहाना होता है. वास्तव में स्वयं की प्रसन्नता के लिए प्रयास होता है पूजा पाठ ध्यान साधना आदि. जब हम दुखी होते हैं तब प्रार्थना करते हैं, पूजा पाठ करते हैं, और यह मानते है कि हम परमेश्वर को प्रसन्न करना चाहते हैं. जबकि प्रसन्नता की खुशी की जरूरत हमें होती है, परमेश्वर को नहीं. दुःखों से मुक्त होना हम चाहते हैं परमेश्वर नहीं.

आध्यात्मिक साधना विधियों के साथ जो समस्या उत्पन्न हुई उसका कारण व्यक्ति का ध्यान स्वयं से हटाकर सुदूर बैठे परमेश्वर की तरफ कर दिया गया. स्वयं पर ध्यान नहीं और साधना विधियों का उपयोग कर रहे हैं. स्वयं के साथ घट रही घटनाओं से बेखबर बेहोश होकर विधियाँ का प्रयोग करना, सार्थक परिणाम तो देता ही नहीं है, साथ ही विक्षिप्तता वरदान में और मिलने की संभावना हो जाती है.

अतः विधि कोई भी हो ध्यान स्वयं पर होना चाहिए. स्वयं के साथ घट रही हर छोटी से छोटी घटना, परिवर्तन पर हमारी दृष्टि बनी रहना चाहिए. सतत सजगता सतर्कता से ही वास्तविक सफलता प्राप्त होती है.

जागृत अवस्था में चेतन की सक्रियता के समय जो होश हमें रहता है. उसमें वृद्धि हो, और होश पूर्वक हम स्वप्नावस्था में प्रवेश कर सकें तो स्वप्न पर हमारा नियंत्रण हो जाता है. अपनी इच्छानुसार स्वप्न देख पाने की क्षमता प्राप्त हो जाती है. निरन्तर प्रयास से सुषुप्ति में भी होश पूर्वक प्रवेश संभव है. तब साधक सुषुप्ति को भी साक्षी भाव से देख पाता है.

ऐसी ही स्थिति के लिए कहा गया कि जब सब सोते हैं तब योगी जागे हुए रहते हैं.

– शत्रुघ्न सिंह

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