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लेखन का वरदान पाने के लिए आप उसे भोगने के लिए अभिशप्त हैं

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पता नहीं आजकल के गीतकार फ़िल्मी गाने कैसे लिखते हैं… एक काल्पनिक सीन पर लिखना मेरे लिए सबसे मुश्किल काम है. मुझे कभी कोई तस्वीर देकर उस पर लिखने के लिए कहता है, कभी कोई कहानी की मांग करता है, या फिर किसी विषय पर लेख लिखने की मजबूरी आ जाती है तो मेरा दिमाग़ बिलकुल शून्य हो जाता है.

ऐसे में समय सीमा हो तो मुझे कभी कभी कुछ ऐसा लिखकर थमा देना पड़ता है जिसको लिखने के बाद मुझे ही संतुष्टि नहीं हुई होती. लेकिन कभी कभी ऐसा भी होता है कि पूरी तरह शून्य में होती हूँ तो कलम उठा लेती हूँ, फिर कलम से जो भी अवतरित होता है उसकी मैं खुद भी पाठक होती हूँ. लेकिन ऐसा बहुत कम ही हो पाता है.

हाल ही में एक मित्र अपनी नई वेबसाइट के लिए हिंदुत्व और राजनीति पर लेख मांग रहे थे. कविता-कहानी तक लिखने के लिए मुझे उसकी भाव भूमि में उतरना होता है तो राजनीतिक लेख तो मेरे लिए और भी मुश्किल काम है.

क्योंकि मैं जब तक पीड़ा को भोग न रही हूँ तब तक पीड़ा पर कविता लिखना मेरे लिए मुश्किल है, प्रेम पर लिखने के लिए मुझे इश्क में होना होता है.. मेरे राजनीति के लेख अधिकतर किसी की बात की प्रतिक्रिया में होते हैं.

यूं तो मुझे किसी बात के लिए उकसाना या उत्तेजित करना मुश्किल है लेकिन बात जब मोदीजी या राष्ट्र की होती है तो मेरे लिए उनकी राष्ट्रनीति के विरुद्ध कुछ बर्दाश्त नहीं होता. ऐसे में आप मुझे आसानी से लिखने के लिए उकसा सकते हैं.

आध्यात्मिक लेख लिखना तो मेरे लिए सबसे मुश्किल होता है…. जब तक आध्यात्मिक अनुभवों से न गुज़रूँ तब तक उस पर लिखना मेरे लिए अपनी अज्ञानता दिखाने के अलावा कुछ नहीं..

कुछ आध्यात्मिक लेख मैंने बब्बा (ओशो) और ध्यान बाबा के साथ जम के नाराज़गी के बाद लिखे हैं. कुछ प्रेम पगी कवितायेँ मैंने प्रेम को परमात्मा तुल्य रखकर लिखी है तो कुछ बिलकुल दैहिक स्तर की लेकिन दोनों को मैंने उसी भावभूमि में जाकर लिखी है…

मीरा कैसे लिखती भजन यदि कृष्ण की दीवानी न हुई होती….

ऐसे ही आजकल मैं लेखन का श्राप भोगे हुए शब्दों का रेचन कर रही हूँ… ताकि शब्दों से मुक्त होकर मैं अर्थों में विलीन हो सकूं….

रेचन
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कहानी चाहे कितनी भी रोचक हो, जब उसमें एकरसता आ जाती है तो उसमें दिलचस्पी ख़त्म होने लगती है …. चाहे वो कहानी मेरे ही द्वारा क्यों न रची जा रही हो.

मेरे ही पात्र जो मुझे बहुत दिलचस्प लगा करते थे उनसे मुझे खीज होने लगती है, तो उन किरदारों पर मैं क्रोधित होने लगती हूँ… वो मेरे आगे पीछे मंडराने लगते हैं… यूं हमें अधर में न लटकाओ, कहीं तो पार लगा दो..

वो बेचारे मेरे लिखे किसी पुराने रोचक किस्से पर आकर कमेन्ट कर जाते हैं… कभी मुझे किसी पन्ने पर टैग करके याद दिलाते हैं सबसे रोमांटिक किस्सा जो कभी उन पर लिखा था…

मैं उन किस्सों को देखती हूँ निर्निमेष होकर… हंसना तो दूर, कभी-कभी उन पर रोने का भी मन नहीं करता… कभी यूं ही भाव के अभाव को अनुभव करना ही ठीक होता है…..

पता नहीं इस लिखे को तुम समझ पाओगे या नहीं, लेकिन हर बार लिखा जाना रचनात्मक ही हो ज़रूरी नहीं, कभी कभी सिर्फ रेचन भी होता है…

मैं रेचन की उस अवस्था में हूँ जहाँ सारे भाव प्रस्थान कर रहे हैं अपने मूल में… उनकी यात्रा और कर्तव्य पूरे होने की कगार पर है… और अधिकार भाव जागृत करने से मुझ पर मनुष्य होने का इलज़ाम लग सकता है..

बात मैं देवत्व की नहीं कर रही बात सिर्फ चेतना के देह से भारमुक्त होने की है… यात्रा भी तो सिर्फ उसी की है.. देह तो बेचारी बस वाहन है… जैसे गणेश का वाहन चूहा और लक्ष्मी का उल्लू है… चेतना को यदि देवत्व का चोला पहना दें तो देह अपने आप पशु पक्षी के स्तर पर आ जाती है…

नर से नारायण होने की यात्रा में देह की भूमिका पर लिखा जाना अभी बचा है… अभी तो बस चेतना पर जन्मों से लिखी जा रही कहानियों को प्रकट कर उन्हें मुक्त करने का समय है..

तुम बस एक कहानी बनकर रह गए जिससे मुक्त होना मेरी नियति है… चाहा तो था मैंने मैं तुम्हें चेतना में ही विलीन कर दूं.. लेकिन ‘मैं-पने’ के साथ कैसे होगा… मेरा मैं तुम्हें अहम् लगता है…. और तुम्हारा ‘तुम’ मुझे तुम्हारी सीमित विचारधारा की मजबूरी… कभी कभी इस मजबूरी पर भी तरस आता है… कि अहम् ब्रह्मास्मी के सूत्र में भी अहम का अर्थ तुमने तुम्हारे तुम तक ही सीमित रखा… और मैं समर्पण के उस कगार पर हूँ जहाँ मेरी हर कहानी का किरदार तुममें प्रतिबिंबित होता है…

फिर कहती हूँ लिखा जाना हमेशा रचनात्मक नहीं होता. मेरे इस रेचन को पढ़कर भूला देना. इसमें रचनात्मक कुछ नहीं है… ये टूटन है… चेतना की उन ग्रंथियों की जो मेरे चक्रों पर विराजित होकर मुझे सुषुप्त करती है…

ऊब के इस दौर में मेरे सुषुप्त चक्रों पर बैठी ऊर्जाएं मुझे रिझाने नृत्य करती हैं और मैं उन्हें अधमूंदी आँखों से स्वप्न में आने का आदेश दे फिर सो जाती हूँ सूरज की सबसे तपती किरण की पट्टी आँखों पर रखकर… क्योंकि अब रात, अँधेरा और नींद जैसे शब्द से मेरा परिचय खो रहा है… मैं स्वप्न में भी इतनी जागृत रहती हूँ कि उसमें चल रही कहानी को अपने हिसाब से संचालित कर सकती हूँ…

बस तुम्हारी यात्रा को संचालित करने के लिए मुझे बार बार इश्क करना पड़ता है… इश्क का यूं बार बार होना बुरा नहीं… लेकिन एक ही व्यक्ति से बार बार होना भी ऊबा देता है…

मैं ऊब की उन गहराइयों में उतर गयी हूँ कि परमात्मा भी मुझे अब उबार नहीं सकता…

– माँ जीवन शैफाली

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