श्रद्धांजलि : अर्चना वर्मा

अर्चना दीदी अपने अंतिम सफर पर चली गईं। और लगा जैसे जीवन का एक कोना एकदम रिक्‍त हो गया। अर्चना जी, के नाम के आगे के जी कब हट गया और कब वह दीदी हो गईं पता नहीं चल पाया। आपके जीवन में कुछ ऐसे लोग आते हैं जाने जाने कब आपके अपनों से भी ज़्यादा नज़दीक हो जाते हैं।

अर्चना दीदी ऐसी ही थीं, साहित्‍य जगत से परिचय मेरा नहीं था, यहीं मिली थीं वह फेसबुक पर। मैनें 2015 के कथादेश में कहानी के साथ इस संसार में कदम रखा था। 2016 में उनके जन्‍मदिन पर उनके घर गई, तो वह मुझे दूसरी सोनाली समझीं। पर बातों बातों में उन्‍हें पता चल गया कि मैं नई वाली सोनाली हूं। उसके बाद न जाने कब वह इतनी अपनी हो गईं कि दो दिन में एक बार फोन न कर लेती थी तो चैन ही न पड़े।

खैर यह सभी बातें तो मैं अपने लिए रख रही हूं। अर्चना दीदी की जिन बातों से मैं प्रभावित हुई थी, उनमें सबसे मुख्‍य था खुल कर अपनी बात रखना और तर्क के साथ तथ्‍य रखना। हाल के दिनों में उनके ही कई लोग उनके विचारों के खिलाफ हो गए थे और इतने खिलाफ कि उन की पोस्‍ट पर यह भी कहने लगे थे कि आप कहीं साहित्‍य अकादमी लेने की फिराक में तो नहीं, एक महान विद्वान ने तो उन पर संघी होने का आरोप लगाते हुए बहुत ही अनर्गल भाषा का प्रय्रोग किया था, जब तक मैं स्‍क्रीन शॉट ले पाती तब तक उन्‍होनें वह डिलीट कर दिया।

14 फरवरी को भी मेरी जब दीदी से बात हुई तो भी वह इन सब बातों पर हंस रही थीं और वह मुझसे यही कहती थीं कि सोनाली मेरा बच्‍चा, इन सब बातों पर ध्‍यान नहीं देते। अगर मुझे कुछ लिखने का अधिकार है तो इन लोगों को भी असहमति का अधिकार है, ऐसे में कुछ लोग व्‍यक्‍तिगत भी कुछ बोल दें तो बुरा नहीं मानते।

उनका दिल बहुत बड़ा था। उन पर तर्कों के बजाय व्‍यक्‍तिगत प्रहार करने वाले प्रगतिशील अपने विचारों से आगे नहीं बढ पाए।

पर मेरा दिल कथित प्रगतिशीलों की हालत देखकर बहुत दुखी होता है। क्‍या प्रगतिशीलता यहीं तक है कि आपसे इतर किसी ने कुछ कहा नहीं कि आप लगे उनके खिलाफ आग उगलने, इतना अधिकार तो भई दीजिए कि लोग अपने मन का लिख सकें।

अर्चना जैसी महिला के साथ भी प्रगतिशील ट्रॉलिंग होने लगी थी। कहीं न कहीं कथित प्रगतिशील लेखकों को ठहर कर यह सोचने की ज़रूरत है कि वह विचारों का विरोध करते करते हुए व्यक्तिगत सीमा न लांघे।

मैं पिछले कई दिनों से उन लोगों की प्रतिमाओं को खंडित होते देख रही हूं, जो मैने अपने मन में बसा रखी थी।

दीदी के रहते प्रगतिशीलों की असहिष्‍णुता के बारे में लिखना चाहती थी, पर लिख न पाई। हमें अपने साथियों को यह स्‍पेस देना होगा जिसमें हम यह कह सकें कि कुछ भी हो, हम लेखक के रूप में एक साथ हैं। हमें एक दूसरे को भरोसा दिलाना ही होगा कि हम जब संवेदना को लिखते हैं तो वह वाकई दिल से होती हैं और हमें यह भरोसा दिलाना ही होगा कि हम प्रगतिशीलता की धारा में सहिष्‍णुता को थोड़ा सा स्‍थान दे पाएं।

चूंकि प्रगतिशीलता में केवल कुछ विचारों के अलावा किसी और के लिए स्‍थान नहीं है तभी प्रगतिशीलता सिमट रही है, प्रगतिशील सबसे असहिष्णु के रूप में उभरे हैं। और सच कहूं तो इस झूठी प्रगतिशीलता से चिढ़ हो रही है। हिंदी साहित्‍य सबसे असहिष्‍णु है और कुछ मुट्ठी भर लोगों के हाथों में है, वह अपने दायरे से परे देख ही नहीं पाते। मैं बार बार शर्मिंदा हो रही हूं कि कैसे प्रगतिशीलता के नाम पर टोलियां बना ली हैं।

दीदी को विदाई देते हुए जितनी आंखे नम थीं पर उनकी अंतिम विदाई में उमड़े रोते बिलखते लोगों को देखकर लग रहा था कि दीदी वाकई दीदी थीं।

विदा अर्चना दीदी, आज से आप हमेशा के लिए हमारे दिलों में समा गईं।

– सोनाली मिश्र

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